ऋतु परिवर्तन का लोक उत्सव: लोहड़ी और नई ऋतु की दस्तक

ऋतु परिवर्तन का लोक उत्सव: लोहड़ी और नई ऋतु की दस्तक
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डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत की लोकपरंपराएं समाज की सामूहिक स्मृति, प्रकृति-बोध और जीवन-दर्शन की जीवित अभिव्यक्तियां होती हैं। ये परंपराएं समय के साथ बदलती जरूर हैं, लेकिन अपने मूल में ये मनुष्य और प्रकृति के रिश्ते को सहेज कर रखती हैं। उत्तर भारत में मनाया जाने वाला लोहड़ी ऐसा ही एक लोक पर्व है, जो सर्दियों की विदाई और बसंत के स्वागत का प्रतीक बनकर सामने आता है। यह पर्व केवल मौसम के बदलने की सूचना नहीं देता, बल्कि जीवन-दृष्टि के बदलते अध्याय की घोषणा करता है जहां ठिठुरन के बाद ऊष्मा, अंधकार के बाद प्रकाश और ठहराव के बाद नई ऊर्जा का आगमन होता है।

लोहड़ी का उत्सव प्रकृति के उस चक्र का प्रतीक है, जिसमें हर ठहराव के बाद गति और हर कठिनाई के बाद संभावना जन्म लेती है। यह पर्व याद दिलाता है कि जीवन केवल संघर्ष नहीं है, बल्कि संघर्ष के बाद आने वाली राहत और उम्मीद भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। लोकसमाज ने इसे केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि सामूहिक भावबोध का पर्व बनाया।

लोहड़ी का मूल कृषि-जीवन से गहरा संबंध है। उत्तर भारत का किसान रबी की फसलों की बुआई के बाद जब खेतों में हरियाली देखता है, तब उसके भीतर आशा का संचार होता है। गेहूं, सरसों और चने की लहलहाती फसलें आने वाले समय की समृद्धि का संकेत देती हैं। लोहड़ी उसी आशा का उत्सव है। यह पर्व किसान की मेहनत, धैर्य और प्रकृति पर विश्वास का सम्मान करता है।

आग के चारों ओर एकत्र होकर तिल, गुड़, मूंगफली और रेवड़ी अर्पित करना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का सामूहिक भाव है। आग यहां शुद्धि का प्रतीक है बीते दिनों की ठंड, कष्ट, निराशा और असफलताओं को भस्म कर आगे बढ़ने का संकल्प। लोकजीवन में आग केवल ताप नहीं देती, बल्कि एकजुटता भी प्रदान करती है। ठंडी रात में आग के चारों ओर खड़े लोग केवल शरीर ही नहीं, मन भी गरम करते हैं।

लोहड़ी की परंपरा में लोक कथाओं और लोकगीतों की विशेष भूमिका है। दुल्ला भट्टी की कथा लोहड़ी को केवल मौसमी पर्व नहीं रहने देती, बल्कि सामाजिक चेतना का प्रतीक बना देती है। दुल्ला भट्टी अन्याय के विरुद्ध खड़े होने, कमजोर की रक्षा करने और स्त्री सम्मान के मूल्य को रेखांकित करता है। यह लोकगाथा दिखाती है कि लोक संस्कृति केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि नैतिक शिक्षा का भी माध्यम है।

गांव समाज में लोहड़ी का उत्सव सामूहिकता का पाठ पढ़ाता है। अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, स्त्री-पुरुष सभी आग के चारों ओर समान रूप से खड़े होते हैं। यह बराबरी का वह क्षण है, जहां सामाजिक भेदभाव कुछ समय के लिए पिघल जाते हैं। लोकगीतों में सामूहिक स्वर होता है नायक अकेला नहीं होता, पूरा समाज उसका सहभागी बनता है।

लोहड़ी बच्चों के लिए भी एक संस्कारात्मक अवसर है। जब बच्चे बुजुर्गों से लोकगीत सुनते हैं, कथाएं जानते हैं और परंपराओं में भाग लेते हैं, तब वे केवल उत्सव नहीं मनाते, बल्कि अपनी जड़ों से भी जुड़ते हैं। यही लोक परंपराओं की सबसे बड़ी ताकत है वे पीढ़ियों के बीच संवाद कायम रखती हैं।

लेकिन समय के साथ पर्वों का स्वरूप बदल रहा है। शहरीकरण, उपभोक्तावाद और दिखावे की संस्कृति ने लोकपर्वों को भी प्रभावित किया है। आज कई जगह लोहड़ी सामूहिक सहभागिता की बजाय व्यक्तिगत प्रदर्शन बनती जा रही है। पारंपरिक लोकगीतों की जगह तेज संगीत, सादगी की जगह दिखावा और प्रकृति-सम्मत उत्सव की जगह अनावश्यक खर्च दिखाई देता है. इससे पर्व का मूल भाव कहीं न कहीं कमजोर पड़ता है.

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