आपातकाल की आपबीती:जब जेल की सलाखों के पीछे लिखा गया भविष्य

आपातकाल की आपबीती:जब जेल की सलाखों के पीछे लिखा गया भविष्य
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आपातकाल केवल राजनीतिक दमन का दौर नहीं था, वह युवाओं के सपनों, पढ़ाई और भविष्य की भी कठोर परीक्षा था। उस समय कई ऐसे छात्र थे, जिन्होंने किताबों के साथ-साथ जेल की सलाखों के बीच भी संघर्ष किया। भोपाल के दिलीप गणेश गोलवलकर का यह संस्मरण बताता है कि जब विचार स्पष्ट हों, तो जेल भी जीवन की दिशा तय करने से रोक नहीं सकती।

भोपाल। 25 जून 1975 को देश में आपातकाल की घोषणा के साथ ही शासन-प्रशासन का चेहरा बदल गया। सरकार के इशारे पर पुलिस के अत्याचार बढ़ने लगे। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों और स्वयंसेवकों की भी अकारण गिरफ्तारियां होने लगीं। संघ की ओर से सरकार के विरोध में आंदोलन का आह्वान होते ही देशभर में लाखों स्वयंसेवक सड़कों पर उतर आए। कहीं नारे लगे, कहीं पर्चे बांटे गए और अनेक युवाओं ने स्वेच्छा से गिरफ्तारियां दीं।

आपातकाल के जोश और कष्टों के मिले-जुले संस्मरण सुनाते हुए भोपाल के कोलार रोड क्षेत्र स्थित यशोदा परिसर में निवास कर रहे 72 वर्षीय दिलीप गणेश गोलवलकर बताते हैं कि 12 दिसंबर 1975 को वे विदिशा से भोपाल पहुंचे थे। उनके साथ अरुण पालनीकर, गोविंद दादवानी और दो अन्य साथी थे। उसी दिन तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सेठी के पुल उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान उन्होंने सरकार विरोधी नारे लगाए और पर्चे उछाले। पुलिस ने तत्काल उन्हें गिरफ्तार कर लिया और मीसा की धाराएं लगाकर जेल भेज दिया।

गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने शारीरिक मारपीट तो नहीं की, लेकिन रातभर की पूछताछ के दौरान भयभीत करने की कोशिश जरूर की गई। पुलिस उनसे संगठन और साथियों की जानकारी चाहती थी, लेकिन अपने पते के अलावा उन्होंने कुछ नहीं बताया।

गोलवलकर बताते हैं कि जिस दिन वे आंदोलन में शामिल हुए, उस दिन उनके माता-पिता घर पर नहीं थे। वे तीर्थ यात्रा पर गए हुए थे और घर में छोटे भाई-बहन थे। आंदोलन में शामिल होने से पहले उन्होंने घर पर भी कुछ नहीं बताया था। गिरफ्तारी की सूचना विदिशा पुलिस ने परिजनों को दी। माता-पिता के लौटने के बाद इस घटना की जानकारी मिली। परिवार संघ विचारों से जुड़ा हुआ था, इसलिए आंदोलन और गिरफ्तारी को लेकर किसी ने आपत्ति नहीं की, बल्कि इसे कर्तव्य के रूप में स्वीकार किया।

उस समय दिलीप गोलवलकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। वे बीई अंतिम वर्ष के छात्र थे और उनका अंतिम पेपर बाकी था। मीसा में जेल जाने के बावजूद उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी। जेल प्रशासन की अनुमति से उन्होंने जेल से ही बीई का अंतिम पेपर और वायवा दिया। परिणाम आया तो वे प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। वे बताते हैं कि जेल में संघ और जनसंघ के कई वरिष्ठ पदाधिकारी और कार्यकर्ता पहले से मौजूद थे, जिससे मानसिक संबल मिला और किसी तरह की परेशानी महसूस नहीं हुई।

21 मार्च 1977 को आपातकाल की समाप्ति के साथ ही वे जेल से रिहा हुए। जेल से छूटने के बाद संघ और भाजपा की ओर से उनसे अधिक समय देने का आग्रह किया गया, लेकिन घर के बड़े बेटे होने के नाते परिवार की जिम्मेदारियां उनके सामने थीं। विवाह के बाद उन्होंने मध्यप्रदेश विद्युत मंडल में सेवा ग्रहण की और 37 वर्षों की सेवा के बाद सेवानिवृत्त हुए।

दिलीप गणेश गोलवलकर का यह संस्मरण उस पीढ़ी का प्रतीक है, जिसने पढ़ाई, भविष्य और व्यक्तिगत सुखों से ऊपर उठकर लोकतंत्र और विचारों के लिए संघर्ष किया और यह साबित किया कि जेल भी संकल्प को कमजोर नहीं कर सकती।

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