आपातकाल की आपबीती:छात्र संघ अध्यक्ष को मीसा बंदी बना दिया

आपातकाल की आपबीती:छात्र संघ अध्यक्ष को मीसा बंदी बना दिया
X
विनोद दुबे

आपातकाल के दौर में सत्ता से असहमति केवल विचार नहीं, बल्कि अपराध बन गई थी। जो सवाल करता था, वही संदेह के घेरे में आ जाता था। छात्र राजनीति से जुड़े युवाओं के लिए यह समय और भी कठिन था। भोपाल के ईदगाह हिल्स निवासी सुरेश नारायण दुबे की आपबीती उस दमनकारी दौर की सच्ची तस्वीर पेश करती है, जब सरकार के खिलाफ अंदरूनी बगावत की कीमत उन्हें मीसा की जेल में चार माह बिताकर चुकानी पड़ी।

पढ़ाई से कहीं अधिक मुझे छात्र राजनीति में रुचि थी। 21 जून 1975 को जब देश में आपातकाल लगा, उस समय मैं हमीदिया कॉलेज में एमकॉम प्रथम वर्ष का छात्र था और महाविद्यालय का छात्र संघ अध्यक्ष भी। कॉलेज परिसर में आपातकाल के खिलाफ आक्रोश धीरे-धीरे आंदोलन का रूप ले रहा था। लोग गिरफ्तारी देकर जेल जा रहे थे। छात्र संघ अध्यक्ष होने के कारण खुलकर सड़कों पर उतरना संभव नहीं था, लेकिन भीतर ही भीतर सरकार की नीतियों के खिलाफ विरोध लगातार चलता रहा।

सरकार के खिलाफ इस बगावत की भनक पुलिस को लग चुकी थी। परिणामस्वरूप, कॉलेज जाने वाला छात्र संघ अध्यक्ष सीधे कारागार पहुंचा दिया गया। यह आपबीती है आपातकाल के दौरान चार महीने मीसा की जेल काटने वाले 68 वर्षीय सुरेश नारायण दुबे की।

श्री दुबे बताते हैं कि छात्र संघ अध्यक्ष होने के कारण एसपी सहित कई पुलिस अधिकारियों से परिचय था। खुफिया पुलिस का एक जवान अक्सर मिलता था। वह मित्रवत व्यवहार करता, घर-परिवार और कॉलेज की गतिविधियों पर चर्चा करता था। कभी यह अहसास नहीं हुआ कि वही व्यक्ति हमारी गतिविधियों पर इतनी बारीकी से नजर रखे हुए है। उसी ने सरकार के खिलाफ हमारे अंदरूनी अभियान, जनसंघ के पदाधिकारियों से संपर्क और बैठकों की जानकारी पुलिस अधिकारियों तक पहुंचाई। इसके बाद हमें सरकार विरोधी मानकर गिरफ्तार करने का फैसला लिया गया।

आपातकाल लगे करीब दो महीने बीत चुके थे। सितंबर की एक रात मैं घर पर सो रहा था। तड़के करीब चार बजे पुलिसकर्मियों ने घर की कुंडी खटखटाई। परिजनों ने मुझे जगाया। पुलिस ने कहा कि एसपी साहब बुला रहे हैं। जब पूछा कि सुबह चार बजे क्यों, तो जवाब मिला- पता नहीं, अभी चलना होगा। पुलिसकर्मी एसपी के पास नहीं, बल्कि सीधे जहांगीराबाद थाने ले गए। वहां पूरे दिन बैठाए रखा गया। शाम को वारंट लाए गए और मीसा की धाराएं लगाकर जेल भेज दिया गया।

जेल पहुंचने पर वहां जनसंघ के कई वरिष्ठ नेता मिले। प्यारेलाल खंडेलवाल, रामनारायण जी, बाबूलाल गौर, कैलाश नारायण सारंग जैसे अनुभवी नेता पहले से बंद थे। हमारे जैसे 23–24 साल के युवा साथी कुल तीन-चार ही थे। इसलिए जेल में भी आपसी हंसी-मजाक चलता रहता था। कोई परेशानी होती तो वरिष्ठ नेताओं को बता देते। घर में परिजनों से ज्यादा संरक्षण जेल में इन नेताओं से मिला। जेल की दिनचर्या भी धीरे-धीरे व्यवस्थित हो गई।

इस बीच परिजन भी मिलने आए। डांट भी पड़ी, लेकिन जेल में मौजूद लोगों ने उन्हें समझा दिया था कि मीसा में जमानत का कोई प्रावधान नहीं है। धीरे-धीरे रिश्तेदारों और परिचितों ने परिजनों से दूरी बनानी शुरू कर दी। आपातकाल खत्म होते ही वही लोग फिर से आने-जाने लगे। उस दौर में यह भी समझ आया कि डर और स्वार्थ किस तरह रिश्तों को बदल देता है।

सितंबर में मीसा की धाराओं के तहत जेल भेजा गया और चार महीने बाद दिसंबर में कलेक्टर ने स्वतः रिहाई के आदेश दे दिए। हमने न कोई माफी मांगी थी और न ही कोई समझौता किया था। जेल से बाहर निकलकर यह अहसास हुआ कि केवल राजनीति के सहारे भविष्य की राह नहीं बन सकती।

उसी समय बैंक से 29 हजार रुपये का ऋण लेकर प्रेमपुरा में टेलरिंग सामान की छोटी-सी दुकान खोली। बाद में इसे कपड़ों की दुकान में बदल दिया गया। आज भी वही दुकान चल रही है और उसी से परिवार की आजीविका चल रही है।

सुरेश नारायण दुबे की यह आपबीती बताती है कि आपातकाल केवल राजनीतिक नेताओं की कहानी नहीं था। छात्र, युवा और आम नागरिक भी इसकी मार झेल रहे थे। यह दौर सिखा गया कि जब सत्ता निरंकुश होती है, तो सबसे पहले सवाल पूछने वालों को निशाना बनाती है, लेकिन वही सवाल आगे चलकर लोकतंत्र की असली ताकत बनते हैं।

Next Story