आपातकाल की आपबीती:मीसा की सजा, मासूमों की परीक्षा

आपातकाल केवल गिरफ्तारियों और जेल की सलाखों तक सीमित नहीं था। उसकी सबसे गहरी मार उन परिवारों पर पड़ी, जिनके घरों के कमाने वाले अचानक उठा लिए गए। सरकारी नौकरी, सामाजिक सम्मान और सामान्य जीवन एक झटके में बिखर गया। भोपाल के लोकतंत्र सेनानी स्व. हरिप्रसाद गंगेले का परिवार भी इसी त्रासदी से गुजरा, जहां पिता की गिरफ्तारी ने बच्चों का बचपन, मां की सुरक्षा और पूरे घर की स्थिरता छीन ली।
भोपाल। पेशे से रेलवे कर्मचारी, लेकिन विचार से राष्ट्रनिष्ठ स्वयंसेवक। स्व. हरिप्रसाद गंगेले का जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा, सामाजिक कार्य और अनुशासित दिनचर्या के इर्द-गिर्द घूमता था। प्रतिदिन शाखा जाना, संघ के कार्यक्रमों में भाग लेना और समाज के लिए कार्य करना उनकी पहचान थी।
आपातकाल के दौरान स्वयंसेवक परिवारों की चिंता, सरकार के खिलाफ जनजागरण और चोरी-छिपे पर्चे बांटने जैसी गतिविधियों की भनक पुलिस को लग गई। दिसंबर 1976 में कार्तिक पूर्णिमा की रात पुलिस ने उन्हें घर से उठा लिया। उस रात के साथ ही पूरे परिवार का जीवन बदल गया। आपातकाल समाप्त होने के बाद ही उनकी रिहाई हो सकी, लेकिन इस बीच परिवार पर जो संकटों का पहाड़ टूटा, उसे शब्दों में समेटना कठिन है।
आपातकाल के दौरान मीसा के तहत छह महीने का कारावास झेलने वाले स्व. हरिप्रसाद गंगेले की 70 वर्षीय पुत्री श्रीमती शशिबाई उन दिनों को याद करते हुए आज भी भर्राए स्वर में बोलती हैं। वह बताती हैं कि उस समय परिवार की तीन बेटियों की शादी हो चुकी थी। घर में छह छोटे भाई-बहिन थे। पिता के जेल जाते ही घर की आर्थिक रीढ़ टूट गई। रेलवे की नौकरी होने के बावजूद वेतन मिलना बंद हो गया। हालात ऐसे बने कि घर में भोजन की व्यवस्था तक मुश्किल हो गई।
मजबूरी में मां सभी बच्चों को लेकर नाना के घर चली गईं। नाना टिमरनी के पास स्थित एक गांव में रहते थे। वह पुजारी थे और थोड़ी जमीन भी थी। उसी सहारे परिवार का जीवन चलता रहा। पिता के जेल में रहते हुए मां और बच्चे नाना के घर ही रहे। इस दौरान बड़े पापा श्रीराम महाराज ने भोपाल स्थित घर की देखरेख की।
श्रीमती शशिबाई बताती हैं कि उस समय उनकी उम्र लगभग 20 वर्ष थी। दो बड़ी बहिनों के साथ उनकी भी शादी हो चुकी थी। पिता जब जेल से लौटे, तो वे अक्सर पुलिस और जेल के अनुभव साझा करते थे। उन्होंने बताया था कि गिरफ्तारी के बाद थाने में उनसे सख्ती से पूछताछ की गई। उन्हें डराया और धमकाया गया। सरकारी नौकरी में होने के बावजूद उन्हें आपातकाल समाप्त होने तक जेल में ही रखा गया।
इस गिरफ्तारी का सबसे गहरा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ा। तीन बहिनों की शादी के बाद घर में तीन भाई और दो बहिनें स्कूल जाते थे। सबसे छोटा भाई कमलेश गंगेले उस समय मात्र एक वर्ष का था। पिता के जेल जाने के बाद जब मां बच्चों को नाना के घर लेकर गईं, तो उनकी पढ़ाई पूरी तरह ठप हो गई। गांव में संसाधन नहीं थे और हालात भी अनुकूल नहीं थे।
पिता के जेल से लौटने के बाद ही परिवार वापस भोपाल आया और बच्चों ने दोबारा स्कूल जाना शुरू किया। समय के साथ जीवन की गाड़ी फिर पटरी पर लौटी, लेकिन जो छिन गया था, वह कभी लौट नहीं सका। आज छोटे भाई कमलेश गंगेले भाजपा में मंडल उपाध्यक्ष हैं। स्व. हरिप्रसाद गंगेले का वर्ष 2007 में निधन हो चुका है। उनकी पत्नी श्रीमती लक्ष्मीबाई की उम्र अब लगभग सौ वर्ष के करीब है। उनकी जन्मतिथि का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है। वृद्धावस्था में वे घर पर ही हैं और परिजन उनकी सेवा कर रहे हैं।
यह कहानी केवल एक परिवार की नहीं है। यह उस पीढ़ी की गवाही है, जिसने लोकतंत्र बचाने की कीमत अपने बच्चों की पढ़ाई, घर की स्थिरता और जीवन की सहजता से चुकाई। आपातकाल की सबसे बड़ी पीड़ा यही थी कि उसकी सजा केवल जेल में बंद व्यक्ति ने नहीं, बल्कि पूरा परिवार भुगता।
