आपातकाल की आपबीती: पिता की आज्ञा, पुत्र का त्याग और लोकतंत्र की लड़ाई

भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक और वर्ष 1940 में भोपाल जिले के पहले संघचालक रहे उद्धवदास मेहता का पूरा परिवार ही राष्ट्र को समर्पित था। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर मीसा विरोध तक, मेहता परिवार संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में रहा। आपातकाल के दौरान परिवार ने यह निर्णय लिया कि आंदोलन में भाग लेने की जिम्मेदारी दूसरे नंबर के पुत्र ओम प्रकाश मेहता निभाएंगे। उस समय पिता कैंसर से पीड़ित थे, फिर भी पिता की आज्ञा से ओम प्रकाश मेहता ने राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना।
80 वर्षीय लोकतंत्र सेनानी ओम प्रकाश मेहता के छोटे भाई पं. गोपाल मेहता बताते हैं कि आपातकाल की घोषणा के बाद जनसंघ के कई नेता ई-3 अरेरा कॉलोनी स्थित उनके निवास पर छिपे थे। पुलिस को इसकी भनक लग चुकी थी। संघ के आह्वान पर कैलाश नारायण सारंग और रामदेव मांझे के साथ उस समय जनता युवा मोर्चा के जिलाध्यक्ष रहे ओम प्रकाश मेहता ने चौक बाजार में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। नारेबाजी के दौरान पुलिस ने तीनों को गिरफ्तार कर मीसा में जेल भेज दिया।
पुलिस ने बड़े भाई त्रिभुवनदास मेहता को भी पकड़ लिया था, लेकिन पिता की सेवा और कारोबार की जिम्मेदारी को देखते हुए उन्हें हबीबगंज थाने से छुड़वा लिया गया। एक दिन उद्धवदास मेहता कार से न्यू मार्केट गए थे। पेट्रोल भरवाते समय उनके ही एक मित्र डीएसपी ने धोखे से उन्हें गिरफ्तार कर लिया। वे कैंसर से पीड़ित थे और अगले ही दिन टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में उपचार के लिए जाना था। वरिष्ठ नेताओं ने तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश चन्द्र सेठी से संपर्क कर उन्हें रिहा कराया।
उद्धवदास मेहता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे। गांधी हत्याकांड के बाद उन्हें जेल जाना पड़ा था और उन्होंने अपनी बेटी का कन्यादान हथकड़ी में किया था। भोपाल गैस त्रासदी के दो वर्ष बाद, 20 फरवरी 1986 को उनका निधन हो गया। उद्धवदास मेहता पेशे से आयुर्वेदिक चिकित्सक थे। बड़े पुत्र त्रिभुवनदास के अलावा उनके पांच छोटे पुत्र पढ़ाई के साथ दवा निर्माण में सहयोग करते थे। आपातकाल के कारण चिकित्सा और वकालत दोनों ही प्रभावित हुईं। जेल जाने से पहले ओम प्रकाश मेहता की वकालत अच्छी चल रही थी, लेकिन 18 माह की जेल ने सब कुछ चौपट कर दिया। अदालत में पेशी न हो पाने के कारण मुवक्किल अपनी फाइलें लेकर दूसरे वकीलों के पास चले गए। जेल से लौटने के बाद वकालत को दोबारा खड़ा करना आसान नहीं रहा।
आपातकाल के बाद भी ओमजी का सामाजिक संघर्ष जारी रहा। मोतीलाल वोरा सरकार के समय मंदिरों के रखरखाव में हो रहे भेदभाव के खिलाफ उन्होंने बड़ा आंदोलन किया। हिन्दू एकता मंच के बैनर तले हुए इस आंदोलन के बाद मंदिर और मस्जिद दोनों के लिए मिलने वाली शासकीय राशि को समान कर दिया गया। ओम प्रकाश मेहता के जेल जाने से उनकी पत्नी अत्यंत व्यथित हो गई थीं। छोटी बच्ची के साथ वे लगातार रोती रहती थीं। परिजनों ने राजनीतिक गिरफ्तारी का अर्थ समझाकर उन्हें सांत्वना दी। यह परिवार आज भी उस दौर को याद करता है, जब राष्ट्रसेवा के लिए मौन रहकर निजी पीड़ा सहनी पड़ी।
आपातकाल की त्रासदी केवल जेलों में बंद नेताओं की कहानी नहीं है। यह उन परिवारों का भी इतिहास है, जिन्होंने राष्ट्रसेवा के लिए निजी सुख, आजीविका और पारिवारिक जिम्मेदारियों का त्याग किया। भोपाल के ओम प्रकाश मेहता ऐसे ही लोकतंत्र सेनानी हैं, जिन्होंने कैंसर पीड़ित पिता की सेवा से वंचित रहकर भी आपातकाल के विरोध में राष्ट्रसेवा का कठिन मार्ग चुना।
