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सशक्त भारत के चिरनायक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम

आध्या दिक्षित

सशक्त भारत के चिरनायक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम
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अगर मैं कहूं कि स्वतंत्रता के पश्चात और विशेषकर आज की युवा पीढ़ी के लिए कोई बेहद चर्चित राष्ट्राध्यक्ष रहा हो, कोई बेहद लोकप्रिय या कहें कि जनता का वैज्ञानिक रहा हो तो नाम आता है कलाम का। इनके कमाल क्या रहे थे यदि गिनवाने बैठा जाए तो शायद कई हफ्तों तक सारे समाचार पत्रों के पृष्ठ इसी से भर जाएंगे और तिथि अनुसार या परीक्षा उपयोगी जानकारी भी आज गूगल बाबा सबको दे ही देते हैं। इसलिए मुझे नहीं लगा कि आपको वही बताऊं। मैं यह बता सकती हूं कि वो जो विराट व्यक्तित्व या उनका आज आपसे मिलना क्यूं आवश्यक है। अभी दो वर्ष पहले की ही बात है मेरे महाविद्यालय में मौखिक प्रश्नोत्तरी चल रही थी तभी किसी ने वर्तमान राष्ट्रपति का नाम पूछा तो लगातार तीन लोगों ने जवाब दिया डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम। हालांकि उन उत्तरों का प्रतिउत्तर समझाइश मिश्रित डांट था परंतु विचारणीय यह भी था कि ऐसे लोग जो अपने देशकाल परिस्थिति के प्रति इतने उदासीन हैं उन्हें भी यह नाम आज तक कैसे याद है? सोचने वाली बात एक और है, वह मेरा निजी सर्वे है जिसमें जुकरबर्ग की फेसबुक ने मेरा बड़ा साथ दिया, चाहे किसी भी मत, विचार धारा, समाज, संगठन, शिक्षण, भाषा या भाव का व्यक्ति हो उसकी रीडिंग बुक लिस्ट में 'विंग्स ऑफ फायरÓ अवश्य देखने को मिलेगी, तो आखिर क्या है उस आत्म कथा में जो कथानक के किरदार को सहज ही सर्वस्वीकार बना देता है। कभी चलने वाली मीम पर गौर किया हो तो देखना है कि सदी के महामानव स्वामी विवेकानंद जी के साथ इस व्यक्तित्व का चित्र लगाया जाता है क्या वाकई ये इतने चमत्कारी थे या फिर ऐसा क्या है जो विवेकानंद की भांति आज कलाम के पुनर्जन्म को अश्वयंभावी बना देता है।

कभी फुर्सत निकाल कर मिलना अपने कलाम चचा से, बातें करना तो पाओगे कर्म और भाग्य का अद्भुत सम्मेल, आशा और जिज्ञासा से हर पल होती जंग, उत्तरदायित्वों का आभास और संसाधनों का अभाव, पारिवारिक और नैतिक मूल्य, धर्म के गूढ़ सिद्धांत और विज्ञान के अबूझ तथ्य, त्याग की पराकाष्ठा परंतु पद की गमिमा प्रेम का अथाह सागर और सागर सी ही धीर गंभीरता, कर्तव्यनिष्ठा और आत्माभिलाषा का अद्भुत संयोजन और भी बहुत कुछ जो तुम्हें तुम्हारा सा लगेगा। चाहे उनका अभावों से संघर्ष कर प्रभावों में आना हो, या अपने दोस्त की खातिर खुद मार

खाना हो। परिवार के सुख दु:ख में साथ निभाना हो मां-बाप से जुड़ाव हो, भाई-बहन का समर्पण सुदृढ़ स्नेह या प्यार हो, अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु उत्कृष्ट अभिलाषा हो, पूरे प्राण पण से किए जा रहे प्रयास हों, या जीवन में मिली असफलताएं हों, जिनके बाद जीेने का ही मन न करे, या अचानक बड़े नाटकीय ढंंग से सब कुछ सही लगने लगे, सही होने लगे, फिर अचानक अपने छूटने लगे सपने टूटने लगें, सबकी उम्मीदों का सिरा बस आप पर आकर थमे ठीक वैसे जैसे परमाणु परीक्षणों व मिसाइली प्रक्षेपणों के उस आरंभिक दौर में कलाम साहब पर थमा था। जब वैश्विक शक्तियों ने भारत को तकनीकी ज्ञान से वंचित रखने का निश्चय किया तब हमारे वैज्ञानिक दलों ने स्वस्फूर्त ज्ञान को संचित करने का संकल्प लिया सोनिक, सबसोनिक, सुपरसोनिक से अब हायपरसोनिक तक की यात्रा जिस यात्री के दिखाए मार्ग पर हो ही है वही पथिक थे डॉ. कलाम। जितना ज्ञान पृथ्वी के इन तकनीकी क्षेत्रों में है उतना ही लगाव प्रकृति के कोमल तत्वों में चाहे फिर वह उनका पशु-पक्षी, पर्यावरण प्रेम हो या बच्चों से अगाध अपनत्व व मानवता में दृढ़ आस्था, बेक बेंचरर्स के लिए वे कहा करते थे कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क कक्षाओं की अंतिम पंक्तियों में मिला करते है। हां कक्षाएं, विद्यार्थी की पंक्तियां, जिज्ञासाएं, नए विषय ये सब उनके जीवन का अभिन्न अंग या आजीवन उन्हें पढऩा और पढ़ाना व स्वयं को एक शिक्षक कहलाना कभी-कभी सर्वपल्ली राधाकृष्णन की स्मृति को ताजा कर देता है। उनका वीणा बजाते हुए जो चित्र अक्सर देखा जाता है, उनकी संपत्ति का जो फकीराना ब्योरा दिया जाता है मेरे समक्ष अष्टावक्र की गीता जीवंत होकर घूमती दिखती है। हां ये गौर करने वाली बात होगी कि इतना शीर्ष स्तरीय व्यक्ति और वैज्ञानिक मस्तिष्क जब भारत के गांव, देहात, शहरों और आम नागरिकों के बारे में सोचता है तो वह चिंतन कागजी नहीं होता, वो होता पीयूआरए जैसी संकल्पना जो बिल्कुल धरती से जुड़ी है जिसका लक्ष्य उन्होंने 2020 ही दिया था विजन 2020 के नाम से मगर नियति तो वही होगी शायद जिसने 2020 को विजन नहीं रहने दिया बल्कि मिशन बना दिया। मिशन द अलाइक मिशन टू सर्वाइव और कलाम साहब का तिलिस्म जिसके पास हर समस्या का समाधान था।

गरीबी, बेरोजगारी, पलायन, पर्यावरण, प्रौद्योगिकी, आणविकी, परमाणविकी, मानविकी, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक उन्माद, राजनैतिक कदाचार, सवैधानिक उपचार, परोपकार और जो कुछ भी शेष हो, हर विषय पर उनका बताया मार्ग ही सब कुछ साध कर चल सकता है, अन्यथा वर्तमान में जैसी विखण्डन की स्थितियां उत्पन्न हो रही हैं वह भयावह हैं ऐसे में कोई शांतिदूत ही जिसके मुख से आत्मीयता करुणा, व सद्भावना झलकती हो भारत को पुन: बांध सकता है, जगा सकता है वह विश्वास कि सब ठीक हो जाएगा, भारत फिर एक बार अग्नि के पंखों को लगाकर आकाश में ऊंची उड़ानें भर जाएगा। मुझे मिलने का सौभाग्य तो कभी नहीं मिला परंतु हां, पत्राचार में बहुत सी बातें की थी हमने और आज भी जब कभी मैं अनौपचारिक परिधान में कहीं चली जाऊं और लोग टोकने लगें तो मैं कलाम साहब का ही उदाहरण देती हूं कि उनसे भी औपचारिक नहीं रहा जाता था। धरती से उठा धरती का पुत्र, जिसने धरती के शृंगार का स्वप्न देखा, मातृभूमि को सर्वस्व समझ, देशप्रेम के नए पक्ष को सामने रखा। हर उम्र हर तबके को खुद से जोड़े रखा जो सदियों के लिए अमर हो गया आज उनके जन्मदिन पर मैं प्रार्थना करती हूं परमेश्वर से कि यदि पुनर्जन्म होते हैं तो अभी सैकड़ों कलामों का पुनर्जन्म अवश्यंभावी है। और उससे भी आवश्यक है उनको पढऩा, समझना, जानना , जीवन में उतारना अच्छे दोस्त बनाना और किताबों से दोस्ती करना, सूर्य सा दमकने को पहले सूर्य का तपना।

Updated : 12 Oct 2020 1:13 PM GMT
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