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गड़बड़ी ईवीएम में या राजनीतिक दलों की सोच में ?

गड़बड़ी ईवीएम में या राजनीतिक दलों की सोच में ?
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- योगेश कुमार गोयल

विधानसभा चुनावों तथा अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में ईवीएम के बजाय मतपत्रों के इस्तेमाल सम्बंधी 17 राजनीतिक दलों की दलील को आधार बनाते हुए एक जनहित याचिका को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट स्पष्ट कर दिया कि ये धारणा गलत है कि ईवीम के बजाय मतपत्रों के जरिये चुनाव ज्यादा विश्वसनीय है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने स्पष्ट किया कि हर मशीन के ठीक या गलत होने की संभावना रहती है और यह उपयोग करने वालों पर निर्भर करता है कि वे उसका कैसे इस्तेमाल करते हैं। अदालत की इस टिप्पणी के बाद ईवीएम के सही इस्तेमाल की जिम्मेदारी और जवाबदेही अब पूरी तरह चुनाव आयोग तथा संबंधित अधिकारियों की है। इसके पहले तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त ओमप्रकाश रावत सितम्बर माह में ही बैलेट पेपर से मतदान कराए जाने की मांग खारिज कर चुके हैं।

उल्लेखनीय है कि 27 अगस्त को चुनाव सुधार के मद्देनजर बुलाई गई मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की बैठक में सभी राष्ट्रीय व 51 राज्यस्तरीय राजनीतिक दलों ने हिस्सा लिया था। बैठक मेें आयोग द्वारा ईवीएम तथा वीवीपैट से जुड़ी समस्याओं का संज्ञान लेकर शंकाओं के संतोषजनक समाधान का आश्वासन देते हुए सकारात्मक संकेत दिया गया था। आयोग के इस तर्क को अब सुप्रीम कोर्ट ने भी पुख्ता कर दिया है कि कुछ दलों के विरोध के चलते मतपत्रों पर वापस लौटना सही नहीं होगा। दरअसल आयोग नहीं चाहता कि बूथ कैप्चरिंग का दौर वापस आए। मुख्य चुनाव आयुक्त रावत कह चुके हैं कि आयोग ने

सभी राजनीतिक दलों और लोगों को खुली चुनौती दी थी कि वे ईवीएम हैक करके दिखाएं किन्तु कोई आगे नहीं आया।

क्यों निकला ईवीएम का जिन्न?

दरअसल विधानसभा चुनावों के बाद अब लोकसभा चुनाव का समय भी नजदीक है। वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव जीतने के बाद से पूरे देश में भाजपा का प्रभाव क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है। इसके पहले लगभग सभी छोटे-बड़े विपक्षी दल एकजुट होकर महागठबंधन की कोशिशों में जुटे हैं। तमाम विपक्षी दलों ने ईवीएम के खिलाफ एक स्वर में आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी है। शिवसेना तो बाल ठाकरे के समय से ही ईवीएम का विरोध करती रही है। चुनाव आयोग के आश्वासनों के बावजूद अगर कई राजनीतिक दल ईवीएम का प्रबल विरोध कर रहे हैं तो इसके पीछे उनकी राजनीतिक मंशा को देखा जाना बेहद जरूरी है।

क्या है ईवीएम?

ईवीएम यानी 'इलैक्ट्रानिक वोटिंग मशीन' की खोज एम. वी. हनीफा द्वारा 1980 में की गई थी। इसे 15 अक्तूबर 1990 को पंजीकृत किया गया था। भारत में सबसे पहले इसका प्रयोग 1998 में केरल के नॉर्थ पारावूर विधानसभा क्षेत्र के कुछ बूथों पर किया गया। प्रयोग सफल रहने के बाद लोकसभा व विधानसभा चुनाव ईवीएम से ही कराए जाने लगे। दरअसल इस मशीन के जरिये चुनाव कराने पर परिणाम चंद घंटों में ही उपलब्ध हो जाते हैं, साथ ही बूथ कैप्चरिंग की घटनाओं पर भी लगाम लगी है। ईवीएम पर वोट डालने का सिस्टम भी ऐसा है कि लोग चाहकर भी कैप्चरिंग नहीं कर सकते। ईवीएम के इस्तेमाल से निरस्त होने वाले मतों की संख्या में भारी कमी आई है। जब बैलेट पेपर के जरिये मतदान होता था, तब प्रायः रद्द होने वाले मतों की संख्या हार के अंतर से भी ज्यादा होती थी। ईवीएम वास्तव में दो अलग-अलग मशीनें होती हैं, जिसकी कंट्रोल यूनिट मतदान अधिकारी के पास होती है जबकि बैलेट यूनिट का प्रयोग मतदाता करते हैं। जब तक मतदान अधिकारी कंट्रोल यूनिट से बैलेट का बटन नहीं दबाता, बैलेट यूनिट से वोट नहीं डाले जा सकते।

कई बार ईवीएम धोखा भी दे जाती हैं लेकिन उस स्थिति के लिए हर सेक्टर मजिस्ट्रेट को कुछ अतिरिक्त ईवीएम दी जाती हैं तथा मशीन खराब होने पर पांच मिनट में इसे बदला जा सकता है। हालांकि

ईवीएम को लेकर हमेशा संदेह व्यक्त किया जाता रहा है लेकिन कोई भी राजनीतिक दल चुनाव आयोग की खुली चुनौती के बावजूद ईवीएम में धांधली साबित करने में नाकाम रहा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद जब ईवीएम पर गंभीर सवाल उठे थे तो चुनाव आयोग द्वारा व्यवस्था को ज्यादा पारदर्शी बनाने के लिए वीवीपैट मशीनों का प्रयोग शुरू किया गया।

क्या है वीवीपैट?

वीवीपैट अर्थात् 'वोटर वैरीफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल' दरअसल एक ऐसी मशीन है, जिसे ईवीएम के साथ जोड़ा जाता है। जब भी कोई व्यक्ति ईवीएम का उपयोग कर अपना वोट देता है तो वह इस मशीन में उस प्रत्याशी का नाम और चुनाव चिह्न अपनी चुनी गई भाषा में देख सकता है। इस मशीन के तहत मतदाता सात सैकेंड तक विजुअली यह देख सकता है कि उसने जो वोट दिया है, वह उसी के प्रत्याशी को मिला है अथवा नहीं।वीवीपैट मशीन को ईवीएम के साथ जोड़ा जाता है, जिससे मतदाता की जानकारी प्रिंट कर मशीन में स्टोर कर ली जाती है और विवाद की स्थिति उत्पन्न होने पर सुरक्षित जानकारी के जरिये समस्या का समाधान किया जाता है। कुछ माह पूर्व कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत के बाद विरोधी पार्टियों ने ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप लगाते हुए मांग की थी कि आगामी चुनावों में वीवीपैट का इस्तेमाल किया जाए, उसी के बाद अब लोकसभा चुनावों में वीवीपैट इस्तेमाल करने की तैयारियां की जा रही हैं।

मतदान प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव

बूथ कैप्चरिंग और फर्जी मतदान की शिकायतों के बाद करीब दो दशक पहले शुरू हुए ईवीएम के प्रयोग पर मतदाताओं की ओर से कभी गंभीर आपत्तियां सामने नहीं आई। 1990 में वी.पी. सिंह की सरकार के समय एक सर्वदलीय समिति ने ईवीएम की जांच की थी और इसे लेकर संतुष्टि जताई थी। इसके प्रयोग से जहां देश के हर क्षेत्र में और यहां तक कि आतंकवाद प्रभावित इलाकों में भी मतदान प्रतिशत बढ़ता गया, मतों की गिनती में लगने वाला कई-कई दिनों का समय चंद घंटों में सिमट गया।

स्मरण रहे कि जब 2009 के आम चुनाव में भाजपा चुनाव हार गई थी, तब भी भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने ईवीएम पर सवाल उठाए थे और पार्टी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इन चुनावों को 'ईवीएम से हुए हॉलसेल फ्रॉड' की संज्ञा दी थी। उसके अगले ही वर्ष वरिष्ठ भाजपा नेता जीवीएल नरसिम्हा ने ईवीएम पर गंभीर सवाल उठाते हुए एक किताब 'डेमोक्रसी एट रिस्क! कैन वी ट्रस्ट ऑवर इलैक्ट्रॉनिक मशीन?' लिख डाली थी।

राजनीतिक दलों की सुविधा वाला विवाद

2014 में भाजपा के सत्तासीन होने के बाद से उसे सत्ता से बेदखल करने के ख्वाब संजोये विपक्ष ईवीएम का

पुरजोर विरोध कर रहा है। 2014 के बाद जितने भी चुनाव हुए हैं, लगभग सभी में कई पार्टियों ने ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप लगाते हुए अपनी हार का सारा ठीकरा चुनाव आयोग और केन्द्र पर फोड़ा। 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की धमाकेदार जीत हो या कुछ अन्य राज्यों के चुनावों में पार्टी की सरकार बनने का मामला, हर मौके पर ईवीएम पर संशय की उंगलियां उठाई गई। इसके विपरीत यही आवाजें उस वक्त खामोश रही, जब इन्हीं ईवीएम की बदौलत कुछ उपचुनावों में विपक्षी दलों ने प्रचण्ड जीत हासिल की।

जब अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीत लीं तो ईवीएम अच्छी थी। जैसे ही पंजाब व गोवा में बुरी तरह शिकस्त हुई और दिल्ली एमसीडी व विधानसभा उपचुनाव में उनके प्रत्याशी हारे तो उनको लगने लगा कि इससे छेड़छाड़ की गई है।

चुनाव आयोग पर हो भरोसा

हालांकि कुछ अवसर ऐसे आए हैं, जब ईवीएम के पूरी तरह सुरक्षित होने के दावों पर सवालिया निशान लगे थे। अब चुनाव आयोग द्वारा दिए जा रहे इस भरोसे पर तो यकीन करना ही चाहिए कि ईवीएम को इस तरह बनाया गया है कि उसमें गड़बड़ी नहीं हो सकती। अब आयोग ऐसी मशीनें भी तैयार करा रहा है, जो छेड़छाड़ होते ही स्वतः बंद हो जाएंगी। साथ ही वीवीपैट के जरिये मतदाता को उसके मत की जानकारी

देने वाली पर्ची मुद्रित करने की भी व्यवस्था की जा रही है। ईवीएम को लेकर चुनाव आयोग द्वारा यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि ईवीएम के फेल होने का प्रतिशत मात्र 0.6 फीसदी ही है। ऐसे में हम इस तथ्य को भी कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं कि चुनाव आयोग विभिन्न अवसरों पर तमाम राजनीतिक दलों के साथ-साथ अन्य लोगों को भी ईवीएम हैक करने की चुनौती दे चुका है। ऐसे में ईवीएम की साख पर इस प्रकार के सवाल बार-बार उढाये जाने का आखिर औचित्य क्या है?

Updated : 2018-12-12T21:35:22+05:30
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Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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