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सांसारिक दुःख और लोक कल्याण के युग्म से उपजी बुद्ध वाणी

लेखक : शिवकुमार शर्मा, सचिव मप्र महिला आयोग भोपाल

सांसारिक दुःख और लोक कल्याण के युग्म से उपजी बुद्ध वाणी
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भारतीय दर्शन को विद्वानों के मध्य सामान्यतः दो भागों में विभाजित करके देखा जाता है ।दर्शन की वे शाखाएं जो वेदों को प्रमाण मानती हैं आस्तिक और जो वेदों के प्रमाण अर्थात श्रुति प्रमाण को नहीं मानती हैं वह शाखाएं नास्तिक की श्रेणी में गिनी जाती है। आस्तिक श्रेणी में षड्दर्शन- मीमांसा ,वेदांत, सांख्य ,योग ,न्याय और वैशेषिक सम्मिलित हैं, दूसरे नास्तिक वर्ग की शाखाओं में चार्वाक, जैन और बौद्ध दर्शन शामिल है। भारतीय वांग्मय में विभिन्न विचारधाराओं का समामेलन और अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है, जो ईश्वर को नहीं मानते ,जो वेदों को नहीं मानते, बे भी हमारी संस्कृति का अभिन्न भाग है ।यह भारतीय संस्कृति की अद्भुत विशेषता है। महात्मा गौतम बुद्ध भारतीय दर्शन की दूसरी शाखा अंतर्गत बौद्ध दर्शन के प्रणेता थे ।प्रसंग वश बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर महात्मा बुद्ध द्वारा बताए गए मार्ग की चर्चा की जाना समीचीन होगा।

उत्तर प्रदेश के कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी नामक गांव में महाराज शुद्धोधन और माता माया देवी के यहां 563 ईसवी पूर्व में वैशाख पूर्णिमा को बालक सिद्धार्थ का अवतरण हुआ जो आगे चलकर बौद्ध दर्शन के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध कहलाए। इनके जन्म के 7 दिन बाद ही मां का निधन होने से इनका पालन-पोषण इनकी विमाता गौतमी ने किया।16 वर्ष की आयु में ही क्षत्रिय राजकुमारी यशोधरा से उनका विवाह हुआ जिससे उनके एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम राहुल रखा गया। संसार के रोग ,जरा, मृत्यु आदि दुखों को दूर करने के उपायों के अन्वेषण के निमित्त घरवार छोड़कर उरुवेला के जंगलों में 5 वर्ष तक तपस्या की तथा संतोष न मिलने पर बोधगया के पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या करने लगे यहीं पर उनको बोधिसत्व प्राप्त हुआ और बुद्ध कहलाए।

अपने चार आर्य सत्य "सर्वदुखम्" "दुःख समुदाय"

" दुःख निरोध" तथा "दुख निरोधगामिनी प्रतिपाद"

और अष्टांग पथ -सम्मादिट्ठि(सम्यक दृष्टि), सम्मासंकप्प(सम्यक संकल्प), सम्मा्वाचा(सम्यक वाक्),

सम्माकम्मन्त(सम्यक कर्मान्त), सम्मा-आजीव(सम्यक आजीविका),सम्मा-वायाम(सम्यक व्यायाम), सम्मासति(सम्यक स्मृति)तथा सम्मा समाधि( सम्यक समाधि) का प्रचार प्रसार लोक कल्याण की दृष्टि से किया अष्टांग मार्ग के तीन प्रधान अंग उनके द्वारा बताए गए -शील समाधि और प्रज्ञा ।उन्होनेअपने शिष्यों को एकत्रित कर पाँच सौ साधकों का एक संघ बनाया तथा उसके रहन-सहन के नियम बनाए, जिनका पालन करना सबके लिए अनिवार्य किया गया ।गौतम बुद्ध के तीन शिष्यों उपाली ,आनंद और महाकश्यप ने उनके उपदेशों को याद रखा तथा अपने शिष्यों को बताया। सम्राट अशोक के समय में 247 ईसवी पूर्व में पाटलिपुत्र की तीसरी बौद्ध सभा में गौतम बुद्ध के उपदेश एकत्रित किए गए ।बुद्व के शिष्यों ने इन उपदेशों को तीन भागों में विभक्त किया ,जो कि विनय पिटक ,सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक कहलाए। महात्मा बुद्ध के दर्शन में निर्वाण ,अनात्मवाद और क्षणिकवाद तथा प्रतीत्यसमुत्पाद की अवधारणाएं प्रमुख हैं।

प्रतीत्यसमुत्पाद का अर्थ है एक वस्तु के प्राप्त होने पर दूसरी वस्तु की उत्पत्ति अथवा एक कारण के आधार पर एक कार्य की उत्पत्ति। उसका सूत्र है कि "यह होने पर यह होता है " (अस्मिन् सति इदं भवति) पाली में इसको 'पाटिच्च' समुत्पाद कहते हैं। प्रतीत्यसमुत्पाद सापेक्ष भी है और निरपेक्ष भी । सापेक्ष दृष्टि से वह संसार है और निरपेक्ष दृष्टि से निर्वाण बुद्ध उसको बोधि अथवा धर्म मानते हैं। प्रतीत्यसमुत्पाद शाश्वतवाद और उच्छेदवाद का मध्यम मार्ग है। महात्मा बुद्ध ने पिछले जीवन के कारणों( अविद्या, संस्कार, विज्ञान ) वर्तमान जीवन के कारणों( नामरूप , षडायतन ,स्पर्श . वेदना, तृष्णा उपादान)और भविष्य से संबंधित विषयों(भव ,जाति ,जरा मरण)को द्वादश निदान के रूप में निरूपित किया। उन्होंने आत्मा की नित्यता को अस्वीकार किया है। गौतम बुद्ध पुनर्जन्म को मानते थे।

उनका मानना था कि आत्मा नाम-रूप है ।नाम का अर्थ मानसिक अवस्थायें तथा रूप का अर्थ शरीर ,इंद्रियां आदि हैं। नाम रूप में पांच स्कंध बताए हैं रूप स्कंध ,वेदना स्कंध, संज्ञा स्कंध, संस्कार स्कंध ,विज्ञान स्कंध। उन्होंने क्षणिक बाद में सभी वस्तुओं को अनित्य बताया है। आंगुत्तर निकाय और महापरिनिर्वाण सूत्र में इसका विस्तृत विवरण दिया गया है। आदि शंकराचार्य ने बुद्ध के क्षणिकवाद की आलोचना करते हुए बताया है कि यदि आत्मा क्षणिक है तो ज्ञान असंभव है। क्षणिकवाद के आधार पर कार्य -कारण का संबंध नहीं समझाया जा सकता ।जैन आचार्य हेमचंद्रने क्षणिकवाद की आलोचना करते हुए कृत प्रणाश,अकृत कर्म भोग ,भवभंग ,प्रमोक्षभंग ,स्मृति भंग तर्क प्रस्तुत किए हैं।

सम्यक कर्म ,आजीविका जैसे अष्टांग मार्ग कोई नए विषय प्रतीत नहीं होते हैं उपनिषदों तथ भगवत गीता में उपदिष्ट विषयों का सीधा प्रभाव बुद्ध के दर्शन पर देखने को मिलता है उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और देश काल का प्रभाव उन्हें सनातन भारतीय चिंतन से दूर नहीं रख सका है। बुद्ध के निर्वाण के बाद उनके द्वारा स्थापित किए गए संघ दो मुख्य भागों में बंट गए ।महासांघिक और थेरवाद या स्थविरवादी । महासांघिक लोग तर्क से काम लेते थे और उनके मत के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति बुद्ध हो सकता है। स्थविरवादी परंपरा के भक्त थे। अत्यधिक मतभेद बढ़ने पर महासांघिकों ने स्थविरवादियों को "हीनयान" और अपने संप्रदाय को "महायान "कहना आरंभ कर दिया।विचार धारा में मतांतर होने से वैभाषिक और सौत्रान्तिक पृथक मत निर्मित हुए।

बौद्ध धर्म के अनुयायियों में वज्रयान एक शाखा प्रचलित हुई जिसे तांत्रिक बौद्ध धर्म ,तंत्र यान ,मंत्र यान, गुप्त मंत्र, गूण बौद्ध धर्म और विषमकोण शैली या वज्ररास्ता भीकहा गया। महात्मा बुद्ध के अनुयायियों में जब भारी मत मतांतर हो गया और बौद्ध धर्म विभिन्न मतों में बट गया तो जिसको जैसा समझ में आया वैसा उसका स्वरूप बना कर उपयोग किया। बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने नवयान अर्थात नव-बौद्ध अभियान चलाकर नए स्वरूप में भारतीय दलितों को एकजुट करने का प्रयास किया। बौद्ध धर्म ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था का विरोधी रहा है ,परंतु बौद्ध धर्म भी साश्वत ,सनातन भारतीय संस्कृति के अंश भागों द्वारा उद्भूत एक क्षत्रिय राजकुमार की त्याग तपस्या के पश्चात चिंतन और दर्शन द्वारा सुझाया गया रास्ता है जो उपनिषदों के उपदेशों से भिन्न नहीं है इस पर वैदिक परम्परा के सिद्धांतों की स्पष्ट छाप देखने को मिलती है, ग्रंथ इस बात का प्रमाण करते हैं। बौद्ध धर्म दर्शन का मूल संसार के दुखों का नाश करके उसके कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना था जो सदा, वंदनीय है ।इससे इतर इसके जो भी स्वरूप किसी ने भी निर्मित करने का प्रयास किया है, उसके प्रभाव भी उसी अनुरूप प्राप्त होंगे।संसार को दुखों से मुक्ति दिलाने का रास्ता तलाशने वाले और रास्ता बताने वाले महात्मा बुद्ध का कोटिशः वंदन।

Updated : 2022-05-16T06:15:50+05:30
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