ऑनलाइन गेम्स की लत: टूटता बचपन, बिखरता कुटुंब

गाजियाबाद में तीन सगी बहनों की आत्महत्या की हृदयविदारक घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह केवल एक परिवार की निजी त्रासदी नहीं है, बल्कि डिजिटल युग में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, परवरिश की चुनौतियों और सामाजिक जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला प्रसंग भी है। 12, 14 और 16 वर्ष की बच्चियों का यह कदम इस बात का संकेत है कि ऑनलाइन मोबाइल गेम्स की दुनिया बच्चों के मन-मस्तिष्क पर कितनी गहरी पकड़ बना चुकी है, इतनी कि जीवन और मृत्यु का भेद तक धुंधला हो जाए।
ऑनलाइन टास्क-बेस्ड गेम्स या तथाकथित ‘लव गेम्स’ बच्चों को पहले भावनात्मक जुड़ाव में बांधते हैं। दोस्ती, अपनापन और प्रशंसा के माध्यम से भरोसा जीता जाता है, फिर धीरे-धीरे टास्क बढ़ते जाते हैं। असहमति पर डर, दबाव और अपराधबोध पैदा किया जाता है। इस प्रक्रिया में बच्चा वास्तविक दुनिया से कटने लगता है। स्कूल छूटता है, सामाजिक व्यवहार बदलता है, परिवार से संवाद घटता है और आभासी पहचान वास्तविक रिश्तों से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
गाजियाबाद की घटना में भी यही सामने आता है कि बच्चियां लंबे समय से स्कूल नहीं जा रही थीं, आसपास के लोगों से बात नहीं करती थीं और एक-दूसरे के सिवा किसी से जुड़ाव नहीं रखती थीं।
इस त्रासदी में अभिभावकों की भूमिका पर संवेदनशीलता के साथ विचार आवश्यक है। अक्सर माता-पिता बच्चों की लत को देर से पहचान पाते हैं। जब पहचान होती है, तो अचानक सख्ती, डांट या पूर्ण प्रतिबंध को समाधान मान लिया जाता है। परंतु संवाद के बिना लगाई गई रोक बच्चों को और अधिक गोपनीय, जिद्दी और अकेला कर देती है। यह कहना उचित नहीं होगा कि माता-पिता दोषी हैं, लेकिन यह अवश्य स्पष्ट है कि डिजिटल दौर में परवरिश के तरीके बदलने होंगे। बच्चों के ऑनलाइन जीवन में रुचि लेना, उनके खेल, दोस्तों और बातचीत को समझना तथा भय के बजाय विश्वास का वातावरण बनाना आज की आवश्यकता है।
सरकार और नीति निर्माताओं की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ब्लू व्हेल जैसे खतरनाक गेम्स पर प्रतिबंध के बावजूद नए-नए नाम और रूप बदलकर ऐसे प्लेटफॉर्म सामने आते रहते हैं। केवल बैन करना पर्याप्त नहीं है। सख्त रेगुलेशन, सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही, उम्र-उपयुक्त सामग्री की अनिवार्यता, संदिग्ध गतिविधियों की त्वरित रिपोर्टिंग और टेक-डाउन व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए। साथ ही स्कूलों में डिजिटल साक्षरता, साइबर सेफ्टी और मानसिक स्वास्थ्य को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना समय की मांग है।
यह मामला गहराई से कुटुंब प्रबोधन से जुड़ा हुआ है। कुटुंब प्रबोधन का अर्थ केवल नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि परिवार के भीतर सतत संवाद, भावनात्मक सुरक्षा और सहभागिता है। जब परिवार में बच्चे सुने जाते हैं, उनकी भावनाओं को महत्व मिलता है और उनके जीवन में समय दिया जाता है, तब वे बाहरी आभासी सहारों की ओर कम आकर्षित होते हैं। संयुक्त गतिविधियां, साझा भोजन, खुली बातचीत और सीमित लेकिन समझदारीपूर्ण डिजिटल अनुशासन बच्चों के लिए सुरक्षा कवच बन सकता है।
समाधान बहुस्तरीय है। माता-पिता को सजग और संवादशील बनना होगा, स्कूलों को व्यवहारिक बदलावों के शुरुआती संकेत पहचानने होंगे, सरकार को कठोर लेकिन मानवीय नीतियां लागू करनी होंगी और समाज को यह समझना होगा कि मोबाइल केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि बच्चों के मन पर गहरा प्रभाव डालने वाली शक्ति है।
गाजियाबाद की यह त्रासदी हमें चेतावनी देती है कि यदि हमने समय रहते बच्चों, तकनीक और कुटुंब के बीच संतुलन नहीं बनाया, तो ऐसे सन्नाटे बार-बार हमारे दरवाजे खटखटाएंगे। इस पीड़ा से सीख लेकर ही हम टूटते बचपन और बिखरते कुटुंब को संभाल सकते हैं।
