संघ कार्य के 100 वर्ष:पांचवीं कक्षा में खेलने के लिए शाखा में गया और जीवन की दिशा बदल गई

मुझे याद है, आपातकाल की घोषणा के समय संघ पर प्रतिबंध लगा और सामान्य गतिविधियां रुक गईं। इस चुनौतीपूर्ण काल ने संघ को कमजोर नहीं, बल्कि और अधिक सशक्त बना दिया। इस दौरान मेरी गतिविधियां संघ के अन्य संगठनों के साथ बनी रहीं। अक्सर मेरे मित्र और रिश्तेदार संघ में जाने को लेकर या तो मुझे मना करते थे या सतर्कता बरतने की सलाह देते रहते थे, लेकिन मेरा मन संघेतर कार्यों में भी लगा रहता था। भूमिगत रहकर मैं प्रचारकों के साथ उठता-बैठता रहा। आपातकाल में जिन मित्रों को जेल जाना पड़ा, उनके परिजनों के साथ मेरा संपर्क बना रहा। कुछ परिवार बुरी तरह टूट गए थे। यह सब देखकर लगता था कि संघ कार्य में ऐसी क्या शक्ति है, जो हर परिस्थिति में स्वयंसेवक को अडिग बनाए रखती है।
मेरा घर का वातावरण आरंभ से ही संस्कारपूर्ण रहा है। मेरी मां प्रतिदिन हमें धार्मिक और प्रेरणादायी कहानियां सुनाया करती थीं। पांचवीं कक्षा में पढ़ते समय, वर्ष 1965 मेरे जीवन में एक निर्णायक मोड़ लेकर आया। एक दिन मैंने आगरा रेलवे कॉलोनी के निकट स्थित मंदिर प्रांगण में कुछ बाल और तरुणों को कबड्डी खेलते देखा। उनका अनुशासन और आपसी तालमेल मुझे अत्यंत आकर्षक लगा। वहीं पहली बार मुझे शाखा में जाने का अवसर मिला।
प्रारंभ में यह मुझे केवल खेल और शारीरिक व्यायाम का स्थान लगा, किंतु धीरे-धीरे मुझे अनुभव हुआ कि शाखा केवल शरीर-निर्माण का नहीं, बल्कि व्यक्तित्व और वाक्तित्व निर्माण की एक जीवंत प्रयोगशाला है।
दर्जन भर तबादलों को झेला
संघ कार्य में मेरी सक्रियता कई बार सरकारी स्तर पर लोगों को अखरती थी। मेरे प्राचार्य बुलाकर कहा करते थे कि आप पर सरकार की नजर है, इसलिए आप सेवा में रहते हुए संघ के साथ काम न करें। सेवा काल में कुपित होकर सरकार ने मेरे करीब 12 बार तबादले किए बड़वाह, सबलगढ़ और मुरैना तक। मेरे तबादलों के लिए एक पूरी फौज सक्रिय रहती थी, हालांकि मेरे विभाग में मेरे शुभचिंतक भी काफी थे। मेरा कार्य जनजातीय क्षेत्रों में था, इसलिए मैं मिशनरियों के निशाने पर भी रहा करता था।
वर्ष 1966 में यज्ञोपवीत संस्कार के अवसर पर मेरे ननिहाल ग्वालियर से भागवत मामा आए। पूजा के समय उन्होंने मुझे कुछ वस्तुएं दीं एक कलम, एक धार्मिक पुस्तक और एक अत्यंत छोटा-सा चाकू। उन्होंने कहा कि यज्ञोपवीत के बाद शास्त्र का अध्ययन करना चाहिए, कलम को अस्त्र बनाना चाहिए और धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र का भी ज्ञान होना चाहिए। उस समय उनके शब्दों की गहराई को समझ पाना मेरे लिए संभव नहीं था, किंतु शास्त्र अस्त्र शस्त्र की यह अवधारणा मेरे मन में अंकित हो गई। आगे चलकर संघ की गतिविधियों और वरिष्ठों के मार्गदर्शन से इसका वास्तविक अर्थ मेरे सामने स्पष्ट होता चला गया।
शाखा का अनुशासन, समयपालन, गणवेश और सामूहिक गतिविधियाँ मेरे और मेरे मित्रों के मन पर गहरा प्रभाव डालने लगीं। शाखा और अन्य कार्यक्रमों में देशभक्ति के गीत गाते समय मन में जो ऊर्जा और गर्व का भाव उत्पन्न होता था, उसे शब्दों में बाँध पाना कठिन है। छोटी-छोटी, किंतु अत्यंत प्रभावशाली कहानियां जीवन के मूल्यों को सरल भाषा में समझा देती थीं। इन्हीं कारणों से शाखा जाना मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया और संघ धीरे-धीरे मेरे जीवन का अभिन्न अंग बनता चला गया।
मैं 1976 में मध्यप्रदेश उच्च शिक्षा सेवा में आया। 1981 में मेरा संपर्क खरगोन के विभाग प्रचारक अण्णा जी मुकादम से हुआ। वे भी कॉलेज में प्रोफेसर थे, किंतु उन्होंने सरकारी सेवा छोड़कर संघ कार्य को प्राथमिकता दी। अण्णा जी ने मुझसे एक बार कहा कि प्रोफेसर तो बहुत हैं, लेकिन देश की सेवा के लिए मैं प्रचारक बन रहा हूं। यह बात मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायी सिद्ध हुई और संघ कार्य से जुड़ने में निर्णायक बनी।
प्रो. शितुत अमेरिका नहीं गए
पीजी कॉलेज में हमारे प्राचार्य प्रो. शितुत थे। वे केमेस्ट्री के प्रकांड विद्वान थे। वे भी हम लोगों के साथ कल्याण आश्रम और अन्य गतिविधियों में सक्रिय हो गए। अमेरिका में निवासरत उनकी बहू ने एक बार उनसे कहा कि अब आप भारत छोड़कर अमेरिका आ जाइए। प्रो. शितुत ने बहू से कहा कि तुम लोग एक बार यहाँ आकर हमारे काम को देखो। बहू आई। प्रो. शितुत ने उन्हें झाबुआ और अलीराजपुर में चल रहे कार्य दिखाए, तो वह कहने पर मजबूर हो गई कि आपकी ज़रूरत अमेरिका में नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश के इन क्षेत्रों में ही है।
मैं वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़ गया। इस कार्य में मेरे मार्गदर्शक बने श्री बलराम जी मालवीय जैसे तपोनिष्ठ संगठन मंत्री। मालवीय जी के साथ मैं जनजातीय क्षेत्रों में काम करने लगा। उन दिनों न मोबाइल थे और न ही परिवहन के पर्याप्त साधन। अक्सर स्कूटर से, और कई बार साइकिल से, मैं मालवीय जी के साथ बड़वानी के सुदूर गांवों में जाता था। बाद में प्रचारक श्री राम अरावकर ने मुझे विद्या भारती के कार्य से जोड़ दिया।
संघ ती केवल हिन्दुस्थान हिन्दुओं का, इस ध्येय वाक्य को प्रत्यक्ष में लाना चाहता है। जैसे अन्य लोगों के अपने देश है, वैसा ही यह हिन्दुओं का देश है।
डों केशव बलिराम हेडगेवार
