संघ कार्य के 100 वर्ष: खंडवा नगर में 1935 में सेवा समिति के अखाड़े में प्रारंभ हुई पहली शाखा

शाखा सुदृढ़ करने में इनका बड़ा योगदान
महोदय रायकर, हनुमंत रावकार, डॉ. भौकाती कोपरकर आदि ने शाखा को सुदृढ़ करने में अत्यंत परिश्रम किया। इनके अलावा खंड के भगवंतराव मंडल, पं. बाबूलाल तिवारी, चिहारीताल दाधीच, हजारौत मास्टर, सेठ सूरजमल अग्रवाल, रायुनाथ एवं गंगाचरण मिश्रा आदि पहले दिन से ही संघ के साथ जुड़े रहे।
सेवा समिति के अखाड़े के प्रांगण के बाद शाखा नीलकंठेश्वर धर्मशाला के मैदान में लगने लगी। धीरे-धीरे स्वयंसेवकों की उपस्थिति बढ़ती गई और सन 1936 तक लगभग 200 स्वयंसेवकों की उपस्थिति होने लगी।
खंडवा नगर में सन् 1935 में पहली शाखा प्रारंभ हुई। इसके बाद तहसील केंद्रों पर भी संघ की शाखाएं प्रारंभ करने की योजना बनाई गई और शीघ्र ही तहसीलों में शाखाएं लगने लगीं। खंडवा का सीधा संबंध नागपुर से होने के कारण कांग्रेसी नेताओं के माध्यम से डॉ. हेडगेवार से परिचय पहले से ही था।
यहां आगमन पर डॉ. हेडगेवार ने नगर के गणमान्य लोगों की एक बैठक ली। इसमें प्रमुख रूप से डॉ. बद्रीनारायण महोदय, पं. शिवनारायण पांडे, बाबूलाल तिवारी, हजारीलाल मास्टर एवं गंगाचरण मिश्रा उपस्थित थे।
बैठक में डॉक्टर साहब ने इन लोगों के सामने संघ का विचार रखा और उसी दिन खंडवा के लिए संघ के अधिकारियों की घोषणा कर दी। डॉ. बद्रीनारायण महोदय को संघचालक, पांडे को सह-संघचालक तथा सोहनलाल गुमा को सह-कार्यवाहक मनोनीत किया गया। इसके अगले दिन से ही सेवा समिति के अखाड़े के प्रांगण में शाखा लगने लगी। स्वयं डॉक्टर साहब शाखा में उपस्थित रहे और स्वयंसेवकों के समक्ष उनका बौद्धिक हुआ। हालांकि शाखा का व्यवस्थित स्वरूप दो-तीन वर्षों बाद ही बन सका।
खंडवा के पहले जिला प्रचारक राजाभाऊ पाकी थे। सन् 1942 में चंद्रकांत जुमड़े खंडवा के जिला प्रचारक बने। वे स्वयं पैदल गांव-गांव जाकर शाखाओं का विस्तार करते थे। उनके अनुसरण में खंडवा के कार्यकर्ताओं की टोली भी इसी प्रकार तहसीलों में पैदल घूम-घूमकर संघ कार्य का विस्तार करती रही।
उस समय के पुराने कार्यकर्ता राधेश्याम आचार्य, गौते एवं लक्ष्मीनारायण खंडेलवाल उन दिनों गांव-गांव जाते थे और अपने प्रेरणादायी अनुभव सुनाते थे। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप खंडवा तहसील में शाखाओं की संख्या 60 तक पहुंच गई और संघ कार्य की दृष्टि से यह तहसील प्रांत में प्रथम स्थान पर रही। खंडवा तहसील का एक गांव अरूद भी है, जहां की शाखा काफी पुरानी है। प्रायः हर स्वयंसेवक परिवार में तृतीय पीढ़ी का स्वयंसेवक सक्रिय है।
बाधाओं को दूर कर कार्य में जुटे वीरसिंह हिंडोन
वीरसिंह हिंडोन एक वरिष्ठ कार्यकर्ता थे। सन् 1949 में उन्होंने बिलासपुर शिक्षा वर्ग में जाने का निश्चय किया, किंतु उनके सामने दो बाधाएं थीं। एक ओर उनके पिता ने विवाह की तिथि निर्धारित कर दी थी और दूसरी ओर आर्थिक व्यवस्था की समस्या थी। किंतु ‘जहां चाह, वहां राह’ की उक्ति के अनुसार उन्होंने दोनों बाधाओं को दूर किया। विवाह के संबंध में उन्होंने अपने पिता से स्पष्ट कह दिया कि इन परिस्थितियों में उन्हें विवाह स्वीकार नहीं है। आर्थिक समस्या के समाधान के लिए उन्होंने स्वयं कार्य प्रारंभ कर दिया।
खंडवा के बाद पंधाना, सिरपुर, बोरखला, सिलौदा में शाखाएं शुरू
खंडवा नगर में शाखा प्रारंभ होने के बाद तहसील पंधाना में शाखा शुरू हुई। इसके कुछ ही दिनों बाद सिरपुर, बोरखला, सिलौदा आदि स्थानों पर भी संघ की शाखाएं लगने लगीं। उन्हीं दिनों मुंडी में भी शाखा प्रारंभ हुई। खंडवा में प्रत्येक रविवार को पूर्ण गणवेश में शारीरिक अभ्यास होता था, जिसके बाद संचलन निकाला जाता था। सन् 1940 में खंडवा के शासकीय बैंक परिसर में शिविर लगा, जिसमें लगभग 400 स्वयंसेवक उपस्थित थे। उस समय खंडवा में शाखाओं की संख्या निरंतर बढ़ रही थी। पहले तीन सायंकालीन और एक प्रातःकालीन शाखा चलती थीं। ये शाखाएं डबल फाटक स्कूल मैदान (वर्तमान बस स्टैंड), श्रीनिंग फैक्टरी (जहां वर्तमान में सरस्वती शिशु मंदिर संचालित है) और भिलाई मैदान में लगती थीं। मुख्य शाखा भिलाई मैदान में लगती थी।
1946 में शाखाओं की संख्या अपने चरम पर
सन् 1946 तक खंडवा जिला शाखाओं की संख्या के दृष्टिकोण से अपने चरम पर था। जिले में कुल 132 शाखाएं थीं-बुरहानपुर में 43, खंडवा में 70, हरसूद में 4 और हाथदा में 15 शाखाएं संचालित हो रही थीं। सन् 1948 में संघ पर लगे प्रतिबंध का प्रभाव 1960 तक रहा। इसके बाद पुनः शाखाओं का विस्तार प्रारंभ हुआ। सन् 1970 से 1980 की अवधि में जिले में अधिकतम 48 शाखाएं रहीं। प्रतिबंध के समय खंडवा तहसील में 70 स्थानों पर शाखाएं लगती थीं। उन दिनों खंडवा के प्रचारक मोरुभैया केलकर थे।
