संघ कार्य के 100 वर्ष:संघ का असर है कि आज मैं समाज सेवा में लगा हूँ

संघ कभी भी ब्रांडिंग नहीं करता
संघ के कार्यकर्ता और उनसे जुड़े लोग हमेशा ही देश व समाज की सेवा कार्यों में जुटे रहते हैं। वे कभी भी ब्रांडिंग की ओर ध्यान नहीं देते। संघ प्रतिकूलताओं में पनपा है। इसके बावजूद सभी परिस्थितियों को पार करते हुए सौ वर्ष पूर्ण कर चुका है। जब भी देश किसी भी प्रकार की आपदा या विपरीत परिस्थिति से जूझ रहा होता है, तो संघ के कार्यकर्ता पूरे समर्पण भाव से सेवा कार्यों में लग जाते हैं। पूरी निष्ठा और कर्तव्य-बोध के साथ देश के प्रति समर्पण ही संघ की सबसे बड़ी ताकत है।
व्यापक फलक पर संघ के सेवा कार्यों का दायरा शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम विकास से लेकर आपदा प्रबंधन तक फैला हुआ है। चाहे कोरोना काल की विकट परिस्थितियाँ हों, सीमा पर युद्ध के हालात हों या फिर बाढ़ और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएं स्वयंसेवक बिना किसी सरकारी निर्देश या पुरस्कार की प्रतीक्षा किए सबसे पहले पहुँचते हैं। उनके लिए ‘भारत माता की जय’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक जीवंत संकल्प है।
चरित्र निर्माण के साथ संस्कृति का भी करता है संचार
संघ ने ही हमें सिखाया है कि व्यक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र प्रथम होता है। राष्ट्रहित से बढ़कर कुछ नहीं होता। आवश्यकता पड़ने पर हमें राष्ट्र के लिए अपना सब कुछ बलिदान करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
संघ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह चरित्र निर्माण के साथ ही अपनी सभ्यता और संस्कृति का भी संचार करता है। संघ चुंबकीय व्यक्तित्वों का एक संगठन है। मैंने संघ के अलावा कोई भी दूसरा संगठन ऐसा नहीं देखा, जहाँ व्यक्ति से अधिक राष्ट्र महत्वपूर्ण होता है। संघ से जुड़ने के पीछे मेरा उद्देश्य भी यही है कि इस राष्ट्र के लिए कुछ कर सकूँ। राजनीति से बाहर रहकर भी अपने कर्मपथ पर टिके रहने का दूसरा नाम ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है।
संघ ने कभी भी आपदा में अवसर नहीं खोजा, बल्कि हमेशा कर्तव्य खोजा है। मेरा पूरा परिवार संघ की विचारधारा से जुड़ा रहा है। मेरे अधिकांश मित्र भी संघ से जुड़े हैं और सेवा कार्यों में सक्रिय रहते हैं। करीब 12 वर्ष पहले मेरी मुलाकात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह-बौद्धिक प्रमुख दीपक विस्मुने से हुई थी। उस समय श्री विस्मुने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य क्षेत्र. जिसमें मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ शामिल हैं के क्षेत्र प्रचारक थे। उनकी सादगी और समर्पण भाव से कार्य करने की क्षमता से मैं अत्यधिक प्रभावित हुआ।
संघ की विचारधारा का ही प्रभाव है कि आज मैं विभिन्न सेवा कार्यों के साथ-साथ समाज को आपस में जोड़ने वाले कार्यों में भी लगा हुआ हूँ।
संघ की विचारधारा वाला परिवार
मेरे पिता भी प्रारंभ से ही संघ की विचारधारा से जुड़े थे। वे वनवासी कल्याण आश्रम से भी जुड़े रहे। इसके चलते वे संघ से जुड़े सेवा कार्यों में समर्पण भाव से तल्लीन रहते थे। संघ से हमारी तीसरी पीढ़ी के रूप में मेरा पुत्र पुनीत पारवानी भी जुड़ा हुआ है और संघ की बैठकों में भाग लेता है।
लगातार प्रगति पथ पर आगे बढ़ रहा संघ
संघ ने अपने सौ वर्ष पूरे कर लिए हैं, लेकिन इसके द्वारा किसी भी प्रकार की आतिशबाजी या नाच-गाना नहीं किया जा रहा है। बल्कि यह अपने आने वाले वर्षों की तैयारियों में जुट गया है। चुनौतियाँ बहुत हैं, फिर भी संघ हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार खड़ा है और निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर है।
“हिंदुस्थान के साथ जिसके सारे हित-संबंध जुड़े हैं, जो इस देश को भारत माता कहकर अति पवित्र दृष्टि से देखता है तथा जिसका देश के बाहर कोई अन्य आधार नहीं है.ऐसा महान धर्म और संस्कृति से एकसूत्र में गुंथा हुआ हिंदू समाज ही यहाँ का राष्ट्रीय समाज है।”
- डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार
