राष्ट्र निर्माण के 100 वर्षः संस्कारों से राष्ट्र निर्माण का अलख जगाते स्वयंसेवक

राष्ट्र निर्माण के 100 वर्षः संस्कारों से राष्ट्र निर्माण का अलख जगाते स्वयंसेवक
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डॉ. आलोक कुमार द्विवेदी

एक वर्ष के कारावास की उन्हें सजा सुनाई गई। जुलाई 1922 में कारावास से मुक्त होने के पश्चात् डॉ. हेडगेवार ने कांग्रेस से जुड़े स्वयंसेवी संगठनों में अनुशासन, निरंतरता और संगठनात्मक संरचना के अभाव को गहराई से अनुभव किया। इसी अनुभव ने उनके भीतर यह दृढ़ विश्वास उत्पन्न किया कि देश की सांस्कृतिक परंपराओं और ऐतिहासिक चेतना पर आधारित एक स्वतंत्र, अनुशासित और दीर्घकालिक संगठन की स्थापना आवश्यक है।

इसी उद्देश्य से उन्होंने 1922 से 1924 के बीच नागपुर में अनेक प्रमुख राजनीतिक एवं सामाजिक व्यक्तित्वों से संवाद किया। 1924 में उन्होंने समीपवर्ती वर्धा स्थित गांधी आश्रम का भी दौरा किया, जहां महात्मा गांधी से विभिन्न राष्ट्रीय और सामाजिक विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई। इस संवाद के पश्चात् हेडगेवार का ध्यान विशेष रूप से इस दिशा में केंद्रित हो गया कि किस प्रकार परस्पर विरोधी और बिखरे हुए हिंदू समूहों को एक साझा राष्ट्रवादी चेतना के अंतर्गत संगठित किया जा सके। इसी चिंतन और प्रयास की परिणति आगे चलकर एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन की अवधारणा के रूप में सामने आई।

विजयादशमी, 27 सितंबर 1925 को नागपुर में कुछ युवाओं के साथ डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। प्रारंभ में इसके नाम को लेकर अनेक विचार सामने आए। किसी ने ‘शिवाजी संघ’ नाम सुझाया, तो किसी ने ‘जरीपटका मंडल’ और किसी ने ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’। किंतु अंततः ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम निश्चित हुआ। यह स्थापना किसी राजनीतिक आंदोलन के रूप में नहीं, बल्कि व्यक्ति-निर्माण आधारित राष्ट्र-निर्माण की दीर्घकालिक योजना के रूप में हुई।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य स्पष्ट था ‘हिंदू समाज को संगठित, सशक्त और राष्ट्रनिष्ठ बनाना।’ उल्लेखनीय है कि यहां ‘हिंदू’ कोई संकीर्ण धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक जीवन-दृष्टि का प्रतीक था। सम्पूर्ण भारतीय भू-भाग और इसकी सांस्कृतिक विरासत में अपनी आस्था रखने वाले सभी हिंदू ही हैं.ऐसी राष्ट्रीय सोच रा.स्व.संघ की रही है।

रा.स्व.संघ का मूल विश्वास यह था कि भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र है, जिसकी आत्मा उसके समाज और व्यक्ति में निवास करती है। व्यक्ति निर्माण ही संघ का प्राथमिक उद्देश्य और दीर्घकालिक आदर्श है। स्वतंत्र भारत में रा.स्व.संघ ने स्वयं को सत्ता से दूर रखते हुए समाज के भीतर कार्य करने का मार्ग चुना।

इसी दौर में रा.स्व.संघ से प्रेरित अनेक अनुषांगिक संगठनों का जन्म हुआ, जिनमें प्रमुख रूप से भारतीय मजदूर संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विश्व हिंदू परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम, विद्या भारती आदि शामिल हैं। इनके माध्यम से संघ ने समाज के सभी वर्गों में हिंदुत्व की चेतना के प्रसार का अनवरत प्रयास जारी रखा। इन संगठनों के माध्यम से रा.स्व.संघ की विचारधारा समाज के विभिन्न वर्गों तक शनैः-शनैः पहुंचती रही।

1975–77 का आपातकाल रा.स्व.संघ के इतिहास का एक निर्णायक अध्याय है। संघ पर पुनः प्रतिबंध लगा, हजारों स्वयंसेवक जेल गए और भूमिगत आंदोलन चला। इस दौर में रा.स्व.संघ ने यह स्पष्ट किया कि वह केवल एक सांस्कृतिक संगठन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षक भी है। आपातकाल के बाद भारतीय राजनीति और समाज में रा.स्व.संघ की भूमिका को एक नई दृष्टि से देखा जाने लगा।

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