जो लिखूंगा, सच लिखूंगा…

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अनुराग उपाध्याय

इंदौर में पानी के साथ सिस्टम भी सड़ा

इंदौर में गंदे पेयजल ने कहर मचा दिया। इस सबका जिम्मेदार लोग सिस्टम और सरकार को बता रहे हैं। वैसे आपको बता दें कि इंदौर में सिस्टम सड़-गल चुका है। अधिकारी ‘मेरी मर्जी’ वाले अंदाज़ में काम करते रहे हैं। जनता से किसी को कोई मतलब नहीं था। हकीकत में इंदौर में बैठा प्रशासन जनता से दूर हो गया था। मंत्री, विधायक और महापौर-सब इन अधिकारियों के सामने फेल हो गए हैं।

सार्वजनिक भाषणों में जब नेता अधिकारियों को चेतावनी देते थे, तो बेशर्म अधिकारी मुस्कुराते रहते थे। उनकी सेहत पर इसका कोई असर नहीं पड़ता था। इंदौर के नेता पिछले डेढ़ साल से इन निकम्मे अधिकारियों से जूझ रहे थे। लेकिन 16 निर्दोषों की मृत्यु के बाद अब कुछ होगा, इसकी उम्मीद इंदौरवासियों को जगी है, क्योंकि इंदौर में बैठे सभी अफसर इस कांड के लिए जवाबदेह हैं।

इस बीच यह बात भी सामने आई कि इंदौर में अधिकारियों की कमी है। ऐसे में यह सवाल भी लाज़िमी है कि जब काम करने वाले लोगों की कमी थी, तो उसके लिए ये सभी नेता क्या कर रहे थे।

मुख्यमंत्री ने तोड़ा कमिश्नर का भ्रम

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मालवा से आते हैं। ऐसे में इंदौर कांड ने उन्हें हिला कर रख दिया है। इंदौर नगर निगम आयुक्त दिलीप यादव खुद को मुख्यमंत्री का करीबी बताकर न पार्षदों की सुनते थे, न विधायकों की और न ही मंत्रियों की। ऐसा लगता था कि वे आम जनता के कमिश्नर हैं ही नहीं।

दिलीप यादव को जब-जब पार्षदों ने गंदे पानी की समस्या बताई, उन्होंने उसे या तो झुठला दिया या उस पर ध्यान ही नहीं दिया। ऐसे में सवाल यह है कि जो कमिश्नर पार्षदों और स्थानीय नेताओं तक की नहीं सुनता हो, उसे कमिश्नर बनाया ही क्यों गया।

इंदौर कांड के बाद जब इसकी प्रारंभिक जांच हुई, तो कमिश्नर यादव की गलतियां भी उजागर हुईं। ऐसे में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने तत्काल उनका तबादला कर उनका भ्रम दूर कर दिया। मुख्यमंत्री मोहन यादव ऐसे मामलों में संवेदनशील हैं। वे जानते थे कि इंदौर के लोग इससे बेहद आक्रोशित हैं। इसलिए उन्होंने नगर निगम से ही प्रशासन की सर्जरी की शुरुआत की।

मुख्यमंत्री का साफ कहना है कि इस मामले में किसी को बख्शा नहीं जाएगा। ज़रूरत पड़ी तो और कड़े कदम उठाए जाएंगे।

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