EWS आरक्षण की हकीकत: 10% नहीं, सामान्य वर्ग को मिलता हैं सिर्फ 5 फीसदी आरक्षण

भोपाल:गरीब सामान्य वर्ग को 10 प्रतिशत नहीं, बल्कि अधिकतम 5 प्रतिशत ही आरक्षण मिलता है। भारत सरकार द्वारा ईडब्ल्यूएस संवर्ग के आरक्षण को लेकर यह कहना है मंत्रालयीन सेवा अधिकारी-कर्मचारी संघ के अध्यक्ष इंजि. सुधीर नायक का।
जारी बयान में उन्होंने शासन द्वारा घोषित पदों की श्रेणी में अनारक्षित यानी यूआर के स्थान पर मेरिट या परिश्रम श्रेणी रखने की मांग की है।
यूआर की जगह ‘मेरिट श्रेणी’ की मांग
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि सामान्य वर्ग को अलग से कुछ नहीं दिया गया है। एक हाथ से सामान्य वर्ग का हिस्सा कम कर, दूसरे हाथ से वही हिस्सा सामान्य वर्ग को दे दिया गया। एक बड़ा भ्रम यह फैलाया गया है कि गरीब सामान्य वर्ग को 10 प्रतिशत आरक्षण दे दिया गया है, जबकि यह कुल पदों का 10 प्रतिशत नहीं बल्कि अनारक्षित पदों का 10 प्रतिशत है। हाईकोर्ट अपने कुछ फैसलों में इसकी पुष्टि भी कर चुका है।
श्री नायक का कहना है कि हर श्रेणी में 33 प्रतिशत पद महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। इसके अलावा 6 प्रतिशत दिव्यांगों के लिए आरक्षण है। संविदा कर्मचारियों और भूतपूर्व सैनिकों के लिए भी आरक्षण का प्रावधान है। बस, मेरिट या टॉपर्स के लिए कोई अलग श्रेणी नहीं बनाई गई है।
तो 3.7 प्रतिशत रह जाएगी ईडब्ल्यूएस सीटें
प्रदेश में आरक्षण बढ़ाने को लेकर चल रही कवायद के बीच उन्होंने अनुमान जताया कि आगामी समय में गरीब सामान्य वर्ग का ईडब्ल्यूएस आरक्षण 5 प्रतिशत से घटकर 3.7 प्रतिशत तक रह सकता है। उन्होंने कहा कि यदि आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ाया जाता है तो अनारक्षित वर्ग के लिए 100 में केवल 37 सीटें ही बचेंगी। इसका 10 प्रतिशत यानी 3.7 सीटें ही ईडब्ल्यूएस के खाते में जाएंगी।
इस हिसाब से मप्र में मिल रहा आरक्षण
यदि मध्यप्रदेश में कोई भर्ती निकलती है तो 100 पदों में 20 प्रतिशत एसटी, 16 प्रतिशत एससी और 14 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित होते हैं। इसके बाद 50 पद अनारक्षित बचते हैं। इन 50 पदों का 10 प्रतिशत यानी 5 पद ईडब्ल्यूएस के लिए आरक्षित किए जाते हैं, जो कुल पदों का केवल 5 प्रतिशत ही होते हैं।
उन्होंने कहा कि यह किसी भी स्थिति में कुल रिक्तियों का 5 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता, क्योंकि कहीं भी 50 प्रतिशत से कम आरक्षण नहीं है। वहीं, पिछड़ा वर्ग को 13 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय अभी न्यायालय में लंबित है।
