चंबल पर बनने वाला हैंगिंग ब्रिज अटका, आगरा-ग्वालियर ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे की रफ्तार पर ब्रेक

पाइल टेस्टिंग फेल होने से पुल निर्माण पर संकट, तकनीकी समाधान तलाशने में जुटी निर्माण एजेंसी
आगरा से ग्वालियर को जोड़ने वाले बहुप्रतीक्षित ग्रीनफील्ड छह लेन एक्सप्रेस-वे परियोजना में बड़ा तकनीकी अवरोध सामने आया है। चंबल नदी पर प्रस्तावित 300 मीटर लंबे हैंगिंग ब्रिज के निर्माण की शुरुआती प्रक्रिया में पाइल टेस्टिंग असफल हो गई है, जिससे इस महत्वाकांक्षी परियोजना की समय-सीमा पर सवाल खड़े हो गए हैं।
चंबल नदी के किनारे किए गए पाइल परीक्षण के दौरान यह सामने आया कि नदी तट की मिट्टी अत्यधिक रेतीली और कमजोर है। पाइल के लिए खोदे गए गड्ढों के आसपास की मिट्टी बार-बार धंस रही है, जिससे पिलर की स्थिरता सुनिश्चित करना चुनौती बन गया है। यदि इसी स्थिति में निर्माण किया गया, तो पुल की दीर्घकालिक मजबूती और सुरक्षा पर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
चूंकि यह ब्रिज हैंगिंग (केबल स्टे) तकनीक पर आधारित है और टेंडर की शर्तों के अनुसार चंबल नदी के भीतर कोई पिलर खड़ा नहीं किया जाना है, इसलिए समस्या और जटिल हो गई है। पुल का पूरा भार नदी के दोनों किनारों पर बनाए जाने वाले पाइल और केबल सिस्टम पर निर्भर करेगा।
लोक निर्माण विभाग के सेतु संभाग से मांगा मार्गदर्शन
इस तकनीकी संकट को देखते हुए एक्सप्रेस-वे निर्माण का जिम्मा संभाल रही उदयपुर की जीआर इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड ने लोक निर्माण विभाग के सेतु संभाग से मार्गदर्शन और तकनीकी सहयोग मांगा है। कंपनी ने विशेष रूप से यह जानना चाहा है कि कमजोर और पानी वाली जमीन में किस तकनीक से मजबूत पाइल खड़ी की जा सकती हैं।
दरअसल, सेतु संभाग ग्वालियर में स्वर्णरेखा नदी पर एलिवेटेड रोड का निर्माण पहले ही कर चुका है, जहां पानी की मौजूदगी में पिलर खड़े किए गए थे। मौके पर पाइल टेस्टिंग कार्य देख रहे कंपनी के डीपीएम अरुण डेहरिया का कहना है कि लाइनर तकनीक अपनाने से पाइल की संरचनात्मक मजबूती बनी रहेगी और पुल के डिजाइन में कोई बड़ा बदलाव भी नहीं करना पड़ेगा। फिलहाल तकनीकी विशेषज्ञों की टीम इस समाधान की व्यवहारिकता पर काम कर रही है।
काम शुरू, लेकिन राह आसान नहीं
इन तमाम अड़चनों के बावजूद ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे का निर्माण कार्य यमुना एक्सप्रेस-वे मॉडल पर शुरू कर दिया गया है। छह लेन वाला यह हाईस्पीड कॉरिडोर आगरा से ग्वालियर की यात्रा को पूरी तरह बदल देगा। वर्तमान में जहां दोनों शहरों के बीच सफर में लगभग दो घंटे लगते हैं, वहीं एक्सप्रेस-वे बनने के बाद यह दूरी एक से डेढ़ घंटे में पूरी की जा सकेगी।
तकनीकी दिक्कतों के साथ-साथ परियोजना को भू-अर्जन की धीमी प्रक्रिया से भी जूझना पड़ रहा है। इस एक्सप्रेस-वे के लिए उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश के चार जिलों—आगरा, धौलपुर, मुरैना और ग्वालियर—में भूमि अधिग्रहण किया जाना है।
इस परियोजना का निर्माण 4,612.65 करोड़ रुपये की लागत से किया जा रहा है और इसे 30 महीनों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार चला, तो वर्ष 2028 तक एक्सप्रेस-वे चालू हो सकता है।
भू-अर्जन भी बना चुनौती
धौलपुर, मुरैना और ग्वालियर में 502 हेक्टेयर से अधिक भूमि का अधिग्रहण किया जाना है। मुरैना जिले में मुआवजा वितरण के बावजूद कई किसानों ने जमीन पर खेती जारी रखी है।
छह लेन में हाईस्पीड वाहनों का संचालन प्रस्तावित
यह हैंगिंग ब्रिज परियोजना का सबसे संवेदनशील हिस्सा माना जा रहा है। योजना के अनुसार चंबल नदी के दोनों तटों पर मजबूत पाइल तैयार की जाएंगी, जिन पर केबल के सहारे पूरा ब्रिज टिका रहेगा। इस पुल से छह लेन में हाईस्पीड वाहनों का संचालन प्रस्तावित है, इसलिए सुरक्षा मानकों को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा।
पर्यावरणीय मंजूरी से मिली राहत
एनएचएआई अधिकारियों के अनुसार इस परियोजना और चंबल नदी पर प्रस्तावित छह लेन केबल स्टे ब्रिज के लिए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय तथा वाइल्ड लाइफ एडवाइजरी बोर्ड से आवश्यक एनओसी प्राप्त हो चुकी है। इससे पर्यावरण संबंधी बाधाएं फिलहाल दूर हो गई हैं।
