पद्मश्री 2026: इन चार हस्तियों ने बढ़ाया मध्यप्रदेश का मान

साहित्य, समाजसेवा, लोककला और पुरातत्व में योगदान को मिला राष्ट्रीय सम्मान
साल 2026 के पद्म पुरस्कारों में मध्यप्रदेश की चार विभूतियों को पद्मश्री से सम्मानित किए जाने की घोषणा ने प्रदेश को गर्व से भर दिया है। साहित्य, समाजसेवा, लोककला और पुरातत्व जैसे विविध क्षेत्रों में दशकों तक किए गए योगदान के लिए इन हस्तियों को यह सम्मान मिला है। सूची में भोपाल के वरिष्ठ लेखक कैलाश चंद्र पंत, सागर के मार्शल आर्ट साधक भगवानदास रैकवार, मप्र जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष मोहन नागर और उज्जैन के पुरातत्वविद् डॉ. नारायण व्यास शामिल हैं।
“यह हिंदी की कृपा है”- कैलाश चंद्र पंत
भोपाल के वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार कैलाश चंद्र पंत उन लेखकों में रहे, जो कभी सुर्खियों के पीछे नहीं भागे। साहित्यिक पत्रिका ‘अक्षरा’ उनके लिए केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि विचारों की प्रयोगशाला रही, जहां साहित्य समाज को आईना दिखाता रहा। करीब दो दशकों तक उन्होंने ‘जनधर्म’ साक्षर पत्रिका का संपादन किया। महू में ‘स्वाध्याय विद्यापीठ’ की स्थापना कर उन्होंने शिक्षा को ज़मीन से जोड़ा.च भोपाल में हिंदी भवन न्यास और किसान कैलाश चंद्र पंत भवन के विकास में उनका योगदान यह साबित करता है कि वे केवल लेखनी तक सीमित नहीं रहे। साहित्यकार निवास, पुस्तकालय, बच्चों के शिक्षा केंद्र और IAS-PCS कोचिंग जैसी पहलें उसी सोच का विस्तार थीं। पद्मश्री मिलने पर उन्होंने कहा, “यह सम्मान मेरा नहीं, हिंदी का है। यह हिंदी की कृपा है।”
गांव-गांव तक बदलाव की कहानी- मोहन नागर
प्रदेश के हरे-भरे गांवों में मोहन नागर का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। साधारण परिवार में जन्मे मोहन नागर ने अपने जीवन को शिक्षा, समाजसेवा और ग्रामीण विकास के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने बचपन से देखा कि गांवों में शिक्षा, पानी और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है। यही अनुभव उनके जीवन की दिशा बन गया।भारत भारती आवासीय विद्यालय के माध्यम से बच्चों को शिक्षा देने के साथ-साथ उन्होंने सामाजिक चेतना को भी जगाया। आज वे मप्र जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष हैं। उनके नेतृत्व में परिषद ने जल संरक्षण, स्वच्छता अभियान, शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार से जुड़ी योजनाओं को गांवों तक पहुंचाया, जिससे हजारों परिवारों के जीवन में वास्तविक बदलाव आया।
बुंदेलखंड की लोककला के साधक-भगवानदास रैकवार
सागर जिले के एक छोटे से गांव में जन्मे भगवानदास रैकवार का जीवन आसान नहीं रहा। बचपन से ही उन्हें बुंदेली लोकसंस्कृति और पारंपरिक युद्ध कलाओं अखाड़ा, लाठी-भाला, तलवारबाजी में गहरी रुचि थी। समय के साथ उन्हें एहसास हुआ कि ये कलाएं धीरे-धीरे लोगों की जिंदगी से गायब हो रही हैं।1982 में उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया। सरकारी नौकरी छोड़कर उन्होंने अपना पूरा जीवन बुंदेली मार्शल आर्ट को बचाने में लगा दिया। समाज और परिवार की चिंताओं के बावजूद उनका धैर्य और समर्पण डिगा नहीं। पद्मश्री सम्मान उन्हें केवल कला कौशल के लिए नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की लोकविरासत को सहेजने के लिए मिले अथक प्रयासों के लिए दिया गया है।
मध्यप्रदेश के पुरातत्व के प्रहरी – डॉ. नारायण व्यास
उज्जैन में 5 जनवरी 1949 को जन्मे डॉ. नारायण व्यास का जीवन भारतीय पुरातत्व को समर्पित रहा। इतिहास और मानव सभ्यता के प्रति उनकी रुचि ने उन्हें शैलचित्रों और प्रागैतिहासिक अध्ययन की ओर अग्रसर किया। उन्होंने भू-कला और शैलचित्रों पर डी.लिट की उपाधि प्राप्त की और भीमबेटका, भोपाल व रायसेन क्षेत्र के शैलचित्रों का गहन अध्ययन किया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में करीब चार दशक की सेवा के बाद वे सुपरिंटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट के पद से सेवानिवृत्त हुए। उनके प्रयासों से 2000 से अधिक प्राचीन अवशेष और फॉसिल संरक्षित किए गए, जिन्हें वे ‘मिनी म्यूजियम’ के रूप में संजोते हैं। डॉ. व्यास को पहले भी डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर राष्ट्रीय सम्मान मिल चुका है। पद्मश्री 2026 उनके जीवनभर के शोध और समर्पण की राष्ट्रीय स्वीकृति है।
