भोपाल लिट् फेस्ट विवादः बंगाल से भोपाल तक बाबर के हिमायती कौन हैं…?

भोपाल लिट् फेस्ट विवादः बंगाल से भोपाल तक बाबर के हिमायती कौन हैं…?
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मुगल आतताई बाबर को आखिर कौन लोग हैं, जो भारतीय लोकविमर्श में जिंदा बनाए रखना चाहते हैं? बंगाल में बाबरी मस्जिद के निर्माण को लेकर की गई राजनीतिक घोषणा और भोपाल लिट् फेस्ट में एक किताब के बहाने बाबर पर चर्चा-इन दोनों कड़ियों के बीच की क्रोनोलॉजी को समझने की आवश्यकता है।

सोमवार को लेखक आभास मलदहियार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को एक खुला पत्र लिखकर भोपाल लिट् फेस्ट में उनकी पुस्तक पर केंद्रित चर्चा सत्र को निरस्त किए जाने पर अफसोस जताया।

उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार के साथ-साथ ‘स्वदेश’ की उन खबरों को भी पत्र के साथ साझा किया, जिनमें भोपाल लिट् फेस्ट के विवादित आयोजन पर सवाल उठाए गए थे। यह पत्र सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में रहा।

भारत-केंद्रित पत्रकारिता का समर्थक स्वदेश

लेखक आभास ने जिस तरह से स्वदेश की खबरों पर असहमति जताई है, उससे यह स्पष्ट होता है कि वे एक तरह से विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं। स्वदेश पूरी जिम्मेदारी के साथ लेखक आभास के पक्ष को प्रकाशित करने का स्वागत करता है और उनके इस अधिकार को भी मान्यता देता है। हम आगे भी उनके पक्ष को सम्मान के साथ प्रकाशित करने का नैतिक साहस रखते हैं, क्योंकि संवाद ही हमारे पत्रकारीय संस्कार हैं।

लेकिन हम अपनी बात पर अडिग हैं कि लेखक आभास विक्टिम कार्ड खेलकर बीएलएफ के एजेंडे को मजबूती देने का काम कर रहे हैं, जबकि यह आयोजन शुरू से ही विशुद्ध रूप से आपत्तिजनक रहा है। वे अपने पत्र में दावा करते हैं और आपत्ति जताते हुए प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से गुहार लगाते हैं कि उनकी पुस्तक को लेकर स्वदेश ने गलत तथ्य प्रकाशित किए हैं।

जबकि सच्चाई यह है कि हमारी खबर में न तो लेखक का जिक्र है, न किताब का और न ही उसकी विषयवस्तु का। स्वदेश की बुनियादी आपत्ति बाबर को लेकर थी और भोपाल लिट् फेस्ट के आठवें संस्करण के एजेंडे को लेकर थी। आभास का यह कहना कि वे अकेले ऐसे व्यक्ति थे, जो हिंदुत्व के साथ खड़े थे तो क्या इसका यह अर्थ निकाला जाए कि शेष सभी हिंदुत्व के साथ नहीं थे? लेखक ने स्वयं को आयोजकों के साथ भी खड़ा किया है, जबकि आयोजक विगत आठ वर्षों से लगातार ऐसे विषयों को परोस रहे हैं, जिन्हें स्वदेश राष्ट्र-विरोधी विचारधारा के अंतर्गत मानता है।

पाठकों को यह भी याद दिलाना आवश्यक है कि स्वदेश ने अपनी रिपोर्ट में किसी लेखक, पुस्तक या उसकी विषयवस्तु पर टिप्पणी नहीं की। आभास, देश के मौजूदा वातावरण में अपनी पुरानी वामपंथी पहचान को मिटाकर खुद को हिंदुत्व का नया पोस्टर बॉय के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं। वे स्वयं को एक पीड़ित के रूप में दिखाकर उस नैरेटिव को खाद-पानी देना चाहते हैं, जिसे तथाकथित बौद्धिक जमात ने मोदी सरकार के आने के बाद ‘इंटॉलरेंस’ जैसे शब्दों के जरिए गढ़ा है।

क्या लेखक बीएलएफ के पूर्ववर्ती आयोजनों की विषयवस्तु के साथ असहमति जताने का साहस भी दिखा सकते हैं? यह प्रश्न उनसे बनता है। स्वदेश की खबरों में न तो लेखक का उल्लेख है और न ही उनकी पुस्तक की विषयवस्तु को लेकर कोई टिप्पणी। स्वदेश राष्ट्र-केंद्रित पत्रकारिता का समर्थक है और अखबार के रूप में उसका मूल उद्देश्य भोपाल लिट् फेस्ट के इस वर्ष के आयोजन तथा इससे पहले के सात संस्करणों के एजेंडे को उजागर करना था।

पूरी जिम्मेदारी के साथ स्वदेश इस बात पर अडिग है कि भोपाल लिट् फेस्ट एक एजेंडा-केंद्रित आयोजन है और इसका उद्देश्य समाज में उस विमर्श को स्थापित और मजबूत करना है, जो भारत की संस्कृति और लोकाचार के विरुद्ध है। स्वदेश ने लेखक आभास की पुस्तक या उनके नाम का कहीं भी उल्लेख नहीं किया, बल्कि पाठकों का ध्यान इस प्रश्न की ओर दिलाने का प्रयास किया कि अच्छे या बुरे किसी भी रूप में बाबर की चर्चा लोकविमर्श का हिस्सा क्यों बननी चाहिए?

मुद्दा लेखक या पुस्तक की विषयवस्तु का नहीं, बल्कि बीएलएफ के उस छिपे एजेंडे का है, जो अपने पिछले संस्करणों में एलजीबीटीक्यू, प्राइड परेड, कल्चरल जेनोसाइड, इंटेलेक्चुअल टेररिज्म और कल्चरल सबवर्ज़न जैसे विषयों को स्थापित करने में लगा रहा है।

भोपाल लिट् फेस्ट विवाद

बीएलएफ के आयोजकों की मंशा को समझने का प्रयास किया जाना चाहिए, जो चालाकी के साथ इस तरह के सत्रों की रचना करते हैं। यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब इस आयोजन में मध्य प्रदेश शासन के एसीएस स्तर के अधिकारी खुलेआम सहभागी रहे हों। मप्र सरकार समेत 44 संस्थानों को फंडिंग के उद्देश्य से इससे जोड़ा गया था और आयोजन भारत भवन जैसे प्रतिष्ठित परिसर में हुआ।

आभास का झूठ…!

लेखक आभास ने सोशल मीडिया पर दावा किया है कि भोपाल में उनकी पुस्तक पुलिस ने जब्त की, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के लोगों ने उनकी पुस्तक जलाई और उन्हें अपमानित किया। जबकि सच्चाई यह है कि लेखक भोपाल आए, उनका सत्र नाम बदलकर भारत भवन में आयोजित हुआ और उनका इंटरव्यू भी हुआ। यदि लेखक के दावे सत्य हैं, तो इन घटनाओं के प्रमाण उन्हें या आयोजनकर्ताओं को सार्वजनिक करने चाहिए।

साथ ही, आभास के समर्थकों को भी यह सोचने की आवश्यकता है कि वे उनके साथ खड़े होकर किस शातिर एजेंडे के जाल में फंस रहे हैं।

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