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योगी आदित्यनाथ : उत्तरप्रदेश की हथेली पर रखा गुरू गोरखनाथ का प्रसाद

-विजय मनोहर तिवारी

योगी आदित्यनाथ : उत्तरप्रदेश की हथेली पर रखा गुरू गोरखनाथ का प्रसाद
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2017 के बाद देश को सर्वाधिक शुभ समाचार अगर किसी एक राज्य से प्राप्त हुए तो वह है केवल उत्तरप्रदेश। केवल पाँच वर्ष के संक्षिप्त अंतराल में तीव्र गति से पतनशील सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य को हर दृष्टि से सटीक दिशा में गतिशील करना पुरानी घिसीपिटी राजनीतिक परिपाटी के किसी नेता के बूते की बात नहीं थी। मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ उत्तरप्रदेश की हथेली पर रखा गया महान् गुरू गोरखनाथ का पवित्र प्रसाद हैं। पार्टी और संघ तो निमित्त मात्र हैं। हाँ, नियति निमित्त भी हर किसी को नहीं बनाती वर्ना पार्टियों की खरपतवार भी खूब फैली है और संघ और संगठनों की भी खूब भरमार है!

यह कैसा दुर्भाग्य था कि भगवान शिव, राम और कृष्ण भारत की सर्वाधिक समृद्ध आध्यात्मिक विरासत वाले इस गौरवशाली राज्य का राजनीतिक आधार जाति और मजहब की विषैली नींव पर खड़ा कर दिया गया था। जिस राज्य ने एक हजार साल की घोर गुलामी से बाहर आए खंडित राष्ट्र को पहला प्रधानमंत्री दिया और फिर कतार से सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री दिए, उसे 75 सालों तक हमने एक अजीब जकड़न में कसमसाते ही देखा। परिवारवादी सामंतों ने उत्तरप्रदेश को उत्तम बनाने की सभी संभावनाओं पर ग्रहण लगा दिया था। सत्ता उनके लिए सैफई का आनंद उत्सव थी।

स्वयं को एक्सीडेंटल हिंदू मानने वाले अपने समय के वैश्विक नेता पंडित जवाहर लाल नेहरू को उत्तरप्रदेश की सांस्कृतिक विरासत ने कभी आकर्षित नहीं किया। अयाेध्या, मथुरा, वाराणसी और प्रयागराज घूरे के ढेर ही बने रहे। वे सरदार पटेल के साेमनाथ प्रयोग से प्रेरणा लेने की बजाए उनके विरुद्ध खुलकर खड़े थे। न उन्हें कश्मीर में अपनी जड़ों की कोई अनुभूति थी और न ही उत्तरप्रदेश की महान परंपराओं की। पता नहीं वे सफेद शेरवानी में सुर्ख गुलाब खाेंसकर लाल किले से कौन से विश्व इतिहास की झलक दिखाने आए थे?

2017 के बाद हम अयाेध्या को एक नया अवतार लेते हुए देख रहे हैं। हमने वाराणसी में सदियों की जकड़न से मुक्त होते हुए बाबा विश्वनाथ का ऐतिहासिक अभिषेक देखा। प्राचीन प्रयागराज पर इलाहाबाद के नाम का नाजायज कब्जा हटते हुए भी हमारी सौभाग्यशाली पीढ़ी ने देख लिया। कौन सोच सकता था कि एक दिन मुस्लिमपरस्ती की एकपक्षीय घातक राजनीति के घृणित उत्पाद आजम खां, अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे लोग अपने असली ठिकानों पर पहुंचा दिए जाएंगे?

सत्ता परिवर्तन भर से घटी ये मामूली घटनाएँ नहीं हैं और यह किसी भी पार्टी की परंपरागत राजनीति से ढलकर निकले कितने भी शक्तिशाली या लोकप्रिय नेता की समूची सोच के परे लिए गए निर्णय हैं। वे सब नेता आपसी सौजन्य से एक दूसरे के लिए सत्ता के सुखद वातावरण को ढालते आए थे। उनकी अधिकतम सीमा अपनी कुर्सी और अपने परिजनों की प्रतिष्ठा तक ही देखी गई। उनसे ऐसे बदलावों की कोई उम्मीद नहीं थी। उत्तरप्रदेश ने देश भर के मुख्यमंत्रियों के लिए एक लंबी रेखा खींच दी है। खोखले भाषणों, व्यर्थ नारों और आत्मपूजा में मुग्ध परिवारवादी नेताओं के लिए योगी ने मठ की घंटी बजा दी है।

नियति ने ही योगी को परिवर्तन का निमित्त बनाया। ठीक वैसे ही जैसे केंद्रीय राजनीति का मुकुट मणि नरेंद्र मोदी के भाल पर रखा गया। सामान्य भारतीयों के मन की गहराई में एक विश्वास के रूप में अपना स्थान अर्जित करने वाले मोदी और योगी, दोनों ही भारत के प्रचलित राजनीतिक पथ से प्रकट व्यक्तित्व नहीं हैं। दोनों की पृष्ठभूमि भिन्न है। दोनों विभूतियों की प्रारंभिक यात्रा को देखिए, उनके मंत्र और विधान बिल्कुल अलग रहे हैं। सर्वोच्च सिद्धियाँ यूं ही प्राप्त नहीं होतीं।

प्रचलित राजनीति जोड़तोड़, चापलूसी और गुटबाजी का एक ऐसा जटिल जंजाल बन गई थी, जिससे होकर कोई भले ही सर्वोच्च पदों तक पहुंच जाए लेकिन उससे किसी बड़े परिवर्तन की आशा भी व्यर्थ थी। उनके पास अपने परिजनों, अपनी जाति और अपने क्षेत्र से बाहर सोचने की सामर्थ्य ही नहीं थी। राज्य और राष्ट्र के हितों को तो भूल ही जाइए। लाेग जब कहते हैं कि मोदी और योगी के आगे-पीछे कौन तो इस एक वाक्य के गहरे निहितार्थ समझिए।

हमने प्रचलित राजनीति में कद से बड़ी परछाइयों के आत्ममुग्ध नेताओं को देखा है। अचानक कुर्सी पर आते ही सब तरह की नकली महानताएं ओढ़ने वाले ऐसे नेता हर राज्य में भरपूर आए और गए हैं। वे जब तक कुर्सी पर रहे, जयजयकारों ने उन्हें भ्रम में बनाए रखा कि वे महान् हैं। कुर्सी से उतरते ही वे इतिहास के कूड़ेदानों में समा गए। उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने अपने साहसपूर्ण निर्णयों से एक राज्य की नियति बदलने का मार्ग प्रशस्त किया है। किसी लीडर का असली कद यही है। उनमें यह समझने का विवेक है कि सूरज ढलते ही गुम हो जाने वाली क्षितिज तक फैली लंबी परछाइयां असल कद नहीं होती। पद मिलता है और कद स्वयं निर्मित करना होता है।

मोदी के बाद योगी अकेले हैं, जिन्होंने भारतीय राजनीति का व्याकरण बदलने में भी अपनी भूमिका तय की है। पांच साल बिताने के बाद पहली बार 2022 में उत्तरप्रदेश में किसी क्षेत्र या सीट के वोटों को लेकर ऐसे आंकड़े चर्चा में नहीं रहे कि कहाँ कितने कुर्मी, कहाँ कितने यादव, कहाँ कितने ब्राह्मण? योगी ने सारे छोटे कोष्ठक हटा दिए और एक बड़े कोष्ठक में आंकड़ों को अर्थहीन कर दिया। शपथ में पहली बार एक पसमांदा मुसलमान को साथ लाकर उधर के छोटे कोष्ठकों की कसमसाहट को स्पेस दे दिया। अकेले इस एक कदम से इस्लाम के वर्ग और जातीय भेद से हिजाब हट गया।

राजनीतिक सोच से जातियों का जंगल साफ हो रहा है, यह कम बड़ी बात नहीं है। भारतीय राजनीति पहली बार अपनी आत्मा में झांक रही है। यह भारतीयता के बोध के जागरण से ही संभव हुआ है। 2014 के बाद तो उस बीज का अंकुरण हुआ है, जिसे रोपने और सींचने में नामालूम कितने अनाम साधक प्रचारकों का त्यागपूर्ण जीवन खप गया। पक्की दिखाई दे रही इस नींव को भरने में सौ साल का समय और सब्र लगा है।

2022 में अपनी सीटें गँवाने वाले योगी के विधायकों और मंत्रियों को और दूसरे राज्यों में उनकी पार्टी के वर्तमान विधायकों, सांसदों और मंत्रियों के साथ समस्त भावी प्रत्याशियों को एकमात्र सबक यह है कि केवल दो-चार प्रभावशाली चेहरों के अासरे वे अपनी राजनीतिक नौका सत्ता के तटों तक नहीं ले जा सकते। उन्हें सत्ता प्रदत्त परछाइयों से बाहर निकलकर अपने वास्तविक कद प्राप्त करने होंगे। उन्हें आम लोगों के बीच कठाेर परिश्रम करना होगा। भारतीयता को केंद्र में रखकर निष्पक्ष रूप से कठोर निर्णय लेने होंगे, बिना यह सोचे कि कौन बुरा मानेगा, कौन भला? उन्हें केवल यह देखना होगा कि भारत के हित में क्या आवश्यक है। और उन्हें अपने अंडों-बच्चों को राजनीतिक लाभ-शुभ से दूर रखना होगा।

मैं निस्संकोच यह भी कहना चाहूंगा कि विषैली मजहबी जमीन पर अंधेरे भविष्य की ओर धकेले जा चुके असम जैसे एक और जटिल राज्य की कमान संभालने वाले हेमंत बिस्वसरमा अपने पहले ही कार्यकाल में सही दिशा को पूरे साहस से पकड़ने वाले एकमात्र समकालीन मुख्यमंत्री के रूप में सामने आए हैं। मानचित्र पर उत्तरप्रदेश तो वही है, किंतु एक व्यक्ति के आने भर से देखते ही देखते क्या कुछ बदल सकता है, यह योगी आदित्यनाथ ने भलीभांति दिखाया है।

अगर 'मोदी के बाद योगी' का जुमला जुबान पर चढ़ रहा है तो यह किसी पेशेवर प्रचार प्रबंधक के मस्तिष्क की उपज नहीं है। यह जन भावना की नैसर्गिक अभिव्यक्ति है, जो यह रेखांकित करती है कि जनता अपने लीडर में कौन से गुण, कैसा साहस और परिवर्तन की कैसी बेचैनी देखना चाहती है!

(लेखक ने पांच साल तक भारत की लगातार आठ परिक्रमाएं की हैं। सात किताबें छपी हैं। कई पुरस्कार और सम्मान मिले हैं। मध्यप्रदेश में सूचना आयुक्त के पद पर कार्यरत हैं।)


Updated : 13 April 2022 7:13 AM GMT

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