उमर खालिद विवाद: मानवाधिकार के नाम पर अंतरराष्ट्रीय दबाव

उमर खालिद विवाद: मानवाधिकार के नाम पर अंतरराष्ट्रीय दबाव
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अनुराग तागड़े

न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी द्वारा दिल्ली दंगों के आरोपी और पूर्व जेएनयू छात्र उमर खालिद के नाम लिखा गया पत्र अब केवल व्यक्तिगत या भावनात्मक संदेश नहीं रह गया है। यह घटना भारत और वैश्विक राजनीति के जटिल टकराव का प्रतीक बनती जा रही है, जिसमें मानवाधिकार, कूटनीति और राष्ट्रीय संप्रभुता आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। रणनीतिक विशेषज्ञ इसे एक सोची-समझी अंतरराष्ट्रीय नरेटिव निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा मान रहे हैं।

जिस तरह अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने वर्षों तक वेनेजुएला के खिलाफ 'लोकतंत्र' और 'मानवाधिकार' के नाम पर प्रतिबंध, दबाव और राजनीतिक हस्तक्षेप की नीति अपनाई, उसी मानसिकता की छाया अब भारत के आंतरिक मामलों पर पड़ती दिख रही है। भारत के एक गंभीर आपराधिक मामले के आरोपी को लेकर किसी विदेशी नगर प्रमुख द्वारा सार्वजनिक रूप से सहानुभूति जताना केवल मानवीय चिंता नहीं है। भारत इसे एक ऐसे 'नैरेटिव की राजनीति' के रूप में देख रहा है, जो धीरे-धीरे न्यायिक प्रक्रिया पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की कोशिश करती है।

उमर खालिद पर लगे आरोप किसी विचारधारा, असहमति या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित नहीं हैं। ये आरोप 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़ी कथित साजिश, भड़काऊ गतिविधियों और हिंसा के संगठित प्रयासों से संबंधित हैं। मामला भारतीय अदालतों में विचाराधीन है और उसका निर्णय साक्ष्यों, गवाहों और कानून के आधार पर होना है, न कि किसी बाहरी दबाव के कारण।

किसी भी विदेशी राजनेता द्वारा ऐसे संवेदनशील मामलों पर टिप्पणी करना या पत्र लिखना भारत की न्यायिक संप्रभुता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यदि यही तर्क भारत अमेरिका या यूरोप के किसी आंतरिक मामले में अपनाए, तो इसे अस्वीकार्य और घरेलू मामलों में दखल माना जाएगा।

भारत में उमर खालिद का मामला अदालत में विचाराधीन है। सवाल कानून और साक्ष्यों का है, न कि अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति अभियानों का। भारत का स्पष्ट रुख है कि बहस हो सकती है, लेकिन हस्तक्षेप नहीं। यह घटनाक्रम राजनयिक शिष्टाचार की स्थापित सीमाओं को लांघने वाला प्रतीत होता है। यह पहली बार नहीं है जब भारत के खिलाफ इस प्रकार के नैरेटिव गढ़े गए हों। कश्मीर के संदर्भ में दशकों तक आतंकवाद और पाकिस्तान-प्रायोजित हिंसा को 'राजनीतिक असंतोष' के रूप में पेश किया गया, जबकि वास्तविकता में आम नागरिकों की हत्याएं, स्कूलों का जलना और सुरक्षाबलों पर हमले हो रहे थे।

नागरिकता संशोधन कानून को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर 'मुसलमानों से नागरिकता छीनने' के रूप में प्रचारित किया गया, जबकि इसका उद्देश्य पड़ोसी देशों में धार्मिक उत्पीड़न झेल रहे अल्पसंख्यकों की शरण देना था। किसान आंदोलन के दौरान भी कई विदेशी हस्तियों और संगठनों ने भारत को 'लोकतंत्र कुचलने वाला देश' बताया, जबकि आंदोलन के भीतर हुई हिंसा और लाल किले की घटना को नजरअंदाज किया गया। सरकारी और रणनीतिक हलकों का मानना है कि अब वही रणनीति उमर खालिद के मामले में अपनाई जा रही है, जहां आरोपी को 'मानवाधिकार प्रतीक' के रूप में प्रस्तुत कर भारत की न्यायिक प्रक्रिया पर नैतिक और अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जा रहा है। इस प्रक्रिया में दिल्ली दंगों के पीड़ितों की आवाज़ पीछे छूट जाती है और बहस आरोपी की वैश्विक छवि के इर्द-गिर्द सिमट जाती है।

हालांकि मानवाधिकार संगठनों और कुछ विपक्षी दलों का दृष्टिकोण भिन्न है। उनका कहना है कि लंबी न्यायिक हिरासत और कठोर कानूनों पर सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है और अंतरराष्ट्रीय समर्थन को वे न्यायिक पारदर्शिता की मांग के रूप में देखते हैं। लेकिन बहस और हस्तक्षेप की सीमा स्पष्ट है, और भारत इस सीमा पार किसी भी दबाव को स्वीकार नहीं करेगा।

इस पूरे प्रकरण ने भारत-अमेरिका संबंधों में नई और संवेदनशील परत जोड़ दी है। भारत जहां रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहीं वह अपने आंतरिक मामलों में किसी भी प्रकार के बाहरी दबाव को स्पष्ट रूप से खारिज करता है। भारत ने वैश्विक मंचों पर बार-बार यह दोहराया है कि उसका लोकतंत्र आत्मनिर्भर है और फैसले देश की अदालतें करेंगी, न कि विदेशी नेता या वैश्विक नैरेटिव।

अमेरिका और उसके सहयोगियों ने वेनेजुएला में 'मानवाधिकार' के नाम पर चुनी हुई सरकार को अवैध ठहराया, आर्थिक प्रतिबंध लगाए और जनता को संकट में डाला। भारत की आशंका है कि इसी नैरेटिव रणनीति का सीमित रूप अब उसके आंतरिक मामलों में अपनाया जा रहा है। वैश्विक राजनीतिक नैरेटिव आमने-सामने खड़े हैं। भारत का संदेश स्पष्ट है कि वह संवाद से नहीं हिचकता, लेकिन अपने न्याय, संविधान और न्यायिक प्रक्रिया पर किसी भी प्रकार के बाहरी दबाव को कतई स्वीकार नहीं करेगा।

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