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भारत में पुनः पनपता द्विराष्ट्रवाद

इस्लाम स्वयं में एक राष्ट्र है और इसके अनुयायी किसी और पंथ या धर्म के साथ सह-अस्तित्त्व में विश्वास नहीं करते। भारत का विभाजन इसी आधार पर हुआ था।

भारत में पुनः पनपता द्विराष्ट्रवाद
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द्विराष्ट्र सिद्धान्त इस राष्ट्र के लिए नया नहीं है। इसी इस्लामिक सिद्धान्त ने बीसवीं शताब्दी में दशकों हिन्दू नरसंहार को अंजाम दिया और अंततः जिसका परिणाम भारत विभाजन के रूप में सामने आया। क्या है यह सिद्धान्त? इस्लाम स्वयं में एक राष्ट्र है और इसके अनुयायी किसी और पंथ या धर्म के साथ सह-अस्तित्त्व में विश्वास नहीं करते। भारत का विभाजन इसी आधार पर हुआ था। 1888 में सय्यद अहमद खान ने इस सिद्धान्त को धीरे-2 आगे बढ़ाया और इसके आधार पर ही अंग्रेजों से मुसलमानों के लिए प्रथक और विशेष राजनीतिक अधिकारों की मांग करने लगे। इसी प्रक्रिया ने आने वाले समय में मुस्लिम नेताओं को एक नए इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान का विचार दिया। यह विचारधारा राजनीतिक इस्लाम के विद्रूप साम्राज्यवादी नीति से जनित है।


राजनीतिक इस्लाम पूरे विश्व को दारुल इस्लाम (इस्लामिक शासन) और दारुल हरब (गैर-इस्लामिक शासन) में बाँट कर रखता है और पूरे विश्व को दारुल इस्लाम में परिवर्तित करना उसका अंतिम लक्ष्य है। सैमुएल हंटिंगटन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'सभ्यताओं का संघर्ष' और डॉ आंबेडकर ने अपनी पुस्तक 'पाकिस्तान पर विचार' में राजनीतिक इस्लाम की इस द्विराष्ट्र सिद्धांत की प्रक्रिया को विस्तार में अनेक वैश्विक उदाहरणों के साथ समझाया है। यही कारण है कि भारत में आज भी अनेक पाकिस्तान विद्यमान हैं। यही कारण है कि हम सभी हिन्दू सभ्यता का अंग होते हुये भी सांस्कृतिक रूप से इतने भिन्न हैं। हमारे राष्ट्रीय नायक और प्रतीक तक भिन्न-2 हैं। हम भौगोलिक एकता के बाद भी सामाजिक रूप से बिखरे हुये हैं। राष्ट्रीय नीतियों को भी शत्रु की भाँति भारतीय राजनीतिक इस्लाम चुनौती देते दिख रहा है। मोपला हिन्दू नरसंहार का शताब्दी वर्ष 2022 है परंतु केरल में स्वतन्त्रता के बाद आज भी राजनीतिक इस्लाम वैश्विक खिलाफत की स्थापना के लिए सीरिया से लेकर अफगानिस्तान तक अपने जिहादियों को आईएसआईएस के साथ लड़ने के लिए भेज रहा है। क्या यह सब राष्ट्र की राजनीतिक और सामाजिक एकता पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह नहीं हैं?

इज़राइल पर इस्लामिक आतंकी संगठन हमास के रॉकेट हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। इस्लामिक राष्ट्र इस यहूदी राष्ट्र को समाप्त करना चाहते हैं। इज़राइल और भारत के अच्छे व्यावसायिक,राजनीतिक और सामरिक संबंध हैं। इज़राइल भारत की अनेक क्षेत्रों के अनुसन्धानों में सहायता करता आया है। भारत उस क्षेत्र में शांति का समर्थक रहा है। भारत आधिकारिक रूप से इज़राइल के विरुद्ध हो रही हिंसा की निंदा करता है परंतु भारतीय राजनीतिक इस्लाम इस्लामिक आतंकियों का पक्ष लेता दिखाई देता है। वह पड़ोसी इस्लामिक देशों में धार्मिक आधार पर पीड़ित हिंदुओं को भारत में बसाये जाने का विरोध करता है। उसके मदरसों में आज भी गजवा-ए-हिन्द और भारत में खिलाफत की स्थापना के पाठ पढ़ाये जाते हैं। इस विषय पर समय-2 पर अनेक समाचार चैनलों ने स्टिंग ऑपरेशन कर इस भयावह सत्य को उजागर किया है। बंगाल में मुस्लिम बाहुल्य जनपदों में चुनाव के पहले और बाद में हुयी हिन्दू विरोधी हिंसा उनके इस योजना पर मुहर लगाते हैं। भारतीय राजनीतिक मुस्लिम तुष्टीकरण ने इस्लामिक अलगाववाद को हवा दी है। भारत अंदर ही अंदर इस समस्या से टूट रहा है परंतु अभी भी पर्याप्त ठोस कदम उठाए जाने बाकी शेष हैं। विभाजन के बाद भारत इस विचारधारा और सिद्धान्त को प्रसारित होते रहने का संकट नहीं उठा सकता है। यह हमारे अस्तित्त्व का प्रश्न है।

सोशल मीडिया ने इस्लामिक अलगाववाद को और अधिक बढ़ावा दिया है। अनेक मुस्लिम युवा सोशल मीडिया से प्रेरित हो आतंकी बने। इस्लामिक कट्टरता निरंतर बढ़ रही है इस पर संदेह करना आत्मघात से कम नहीं है। अनेक युवा पिछले कई वर्षों में पुलिस द्वारा आतंकी संगठनों से संपर्क के कारण पकड़े गए इनमे महिलाएं भी शामिल हैं। यह सब पढे लिखे और खाते-पीते घरों से संबंध रखने वाले थे। कश्मीर से लेकर केरल तक अगर आप सोशल मीडिया और अनेक छोटी-बड़ी घटनाओं का विश्लेषण करेंगे तो देखेंगे कि भारत में किसप्रकार अबाध गति से एक और राष्ट्र का उदय हो रहा है। इस्लामिक अलगाववाद के अनेक उदाहरण इस बार उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों के परिणामों के बाद देखने को मिले जहाँ मुस्लिम बाहुल्य गांवों में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए गए। इन समाचारो को समाचार पत्रों और सोशल मीडिया ने भी दिखाया। यह भावना कहीं एक दो दिनों में नहीं पैदा हो गयी अपितु सदियों की सांस्कृतिक दूरियों से जनित है। हैदराबाद का अकबरुद्दीन ओवैसी आज के लोकतान्त्रिक भारत में भी हिंदुओं को मारने की धमकी देता है जिसपर उसकी सभा में उपस्थित लाखों मुसलमानों की भीड़ तालियाँ बजाती है और उसके सुर में सुर मिला कर हिंदुओं को मारने का समर्थन करती है।यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि भारतीय राजनीतिक इस्लाम भारत का क्या करना चाहता है।

इन परिस्थितियों में भारत कैसे सामरिक रूप से एक सशक्त राष्ट्र बन पाएगा? सिमी और इंडियन मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों के आतंकी इसी भारतीय मुस्लिम समाज का अंग थे। यह आतंकी भारत के सभी राज्यों से थे। अनेक आतंकियों के मारे जाने या पकड़े जाने का मुस्लिम समाज के द्वारा हिंसक विरोध भी किया गया। बाटला हाउस मुठभेड़ के बाद जो प्रदर्शन और राजनीति हुयी वह शर्मनाक थी। आजमगढ़ से एक विशेष ट्रेन में मुसलमान भरकर दिल्ली में अपना विरोध तक ज्ञपित करने आए। आज इस मुठभेड़ की सत्यता जगजाहिर है। पत्रकार शिशिर गुप्ता की पुस्तक 'द इंडियन मुजाहिदीन : द एनिमी विदिन' में वो इस मुठभेड़ से लेकर भारत में इस्लामिक आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन की विस्तृत जानकारी देते हैं। जेएनयू में कुछ मुस्लिम छात्रों द्वारा खुलकर एक कश्मीरी आतंकी का समर्थन किया गया और भारत के टुकड़े होने के नारे लगाए गए। सत्तर के दशक में गठित किए गए स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया(सिमी) का लक्ष्य भी भारत को दारुल इस्लाम बनाना या खिलाफत की स्थापना था। यह संगठन आज भी फल-फूल रहा है। तबलीघी जमात और जमात-ए-इस्लामी इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए एक वैचारिक वातावरण तैयार कर रहे हैं। आधुनिक लोकतन्त्र इस्लाम की विचारधारा को को निर्बाध बढ्ने में सहायक सिद्ध हो रहा है। सम्पूर्ण यूरोप आज इसी वैचारिक उथल-पुथल से गुजर रहा है। इस्लामिक अलगाववादी दंगे बेल्जियम, फ़्रांस, स्पेन, नीदरलैंड, जर्मनी और इंग्लैंड में धीरे-2 आम बात हो गए हैं। सैमुएल हंटिंगटन का सभ्यताओं का संघर्ष आरंभ हो चुका है। इस्लामिक अलगाववाद और द्विराष्ट्र सिद्धान्त राजनीतिक इस्लाम का अपरिहार्य अंग हैं।

विगत वर्ष 2020 में नागरिक संशोधन अधिनियम के विरोध में शाहीन बाग से आरंभ हुआ हिन्दू विरोध दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगों में बदल गया। मुस्लिम समाज द्वारा दंगों की तैयारियाँ किसी लंबे चलने वाले गृह युद्ध से कमतर न थी। बंगलुरु के दंगों का स्वरूप भी दिल्ली की ही भाँति था। हिन्दू और उनकी संपत्तियाँ मुख्य निशाने पर थी। विभाजन के बाद हुये दंगों के पीछे पूर्व की काँग्रेसी सरकारों का खुला मुस्लिम तुष्टीकरण रहा है। क्या भारत में सांप्रदायिक सौहार्द आंबेडकर के पूर्ण हिन्दू-मुस्लिम जनसंख्या हस्तानंतरण के सुझाव में ही छुपा था जैसा की पहले ग्रीस और टर्की तथा चेकोस्लोवाकिया में हो चुका था। भारत में मुसलमान सदियों से अपने ही पंथ बाहुल्य क्षेत्रों में रहते आए हैं। अपने ही पांथिक मदरसों में तालीम लेते हैं और अधिकांश अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक संस्थानों में उच्च शिक्षा लेते आए हैं। यहाँ यह बताना भी आवश्यक है कि एएमयू ने 1940 के बाद पूरे संयुक्त राज्य में पाकिस्तान आंदोलन को गाँव-2 और नगर-2 में खड़ा किया था। इस विषय पर सघन जानकारी के लिए वेंकट धूलिपाला की पुस्तक 'मेकिंग ऑफ ए न्यू मदीना' बहुत ही शोधपूर्ण कार्य है। द्विराष्ट्र के इस प्रतीक को संरक्षित करके रखना भी एक सामरिक भूल थी।

भारत का स्वतन्त्रता के बाद जिस सांस्कृतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता थी वह हुआ ही नहीं। जो कि प्रत्येक पराधीन राष्ट्र स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात करता आया है। इस पुनर्जागरण के माध्यम से ही आप दासता के अवशिष्टों को मिटा पाते हैं। भारत में तो यह नितांत आवश्यक था क्योंकि हम इस्लामिक और ब्रिटिश दो क्रूर साम्राज्यवादी शक्तियों से लगभग 800 वर्षों बाद स्वतंत्र हुये थे। इस राष्ट्र की सांस्कृतिक आत्मा हिन्दुत्त्व को सदैव हेय सिद्ध करने का प्रयास हुआ। यही कारण रहा भारत यूँ ही बटता रहा। हिन्दू और मुसलमान पूर्व की तरह ही दो राष्ट्रों के रूप में भिन्न-2 दिशाओं में बढ़ते रहे। किसी के नायक शिवाजी तो किसी के औरंगजेब बने रहे। साझी सांस्कृतिक विरासत जैसी कोई सोच ही नहीं निर्मित की गयी। एक राष्ट्रीय चेतना का विकास एक अखंड राष्ट्र की अपरिहार्य आधारशिला है। जो चीन आज शिंजियांग प्रांत में कर रहा है वही विकल्प अब हमारे पास भी शेष है राष्ट्र का सांस्कृतिक एकीकरण करने के लिए। देश के इतिहास लेखन से लेकर देश के अनेक धर्मस्थलों की पुनर्स्थापना इसका अंग हैं।




(लेखक आदित्य प्रताप सिंह भारतीय थलसेना में कर्नल रहे हैं)


Updated : 2021-05-22T11:45:12+05:30
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Swadesh Lucknow

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