न्यूयॉर्क टाइम्स की पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग और एजेंडा

भारत विरोधी दुराशक्तियों को खुश करने की साजिश
हाल ही में न्यूयॉर्क टाइम्स ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (रा.स्व.संघ) की शताब्दी पर एक श्रृंखला के लेख प्रकाशित किए, जिनमें संगठन को 'फार-राइट' (अति-दक्षिणपंथी) और 'हिंदू प्रथम शक्ति' के रूप में चित्रित किया गया। इन लेखों में रा.स्व.संघ को भारत की धर्मनिरपेक्षता को नष्ट करने वाली शक्ति बताया गया, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के माध्यम से सत्ता पर कब्जा कर रही है। एक लेख में इसे विश्व का सबसे बड़ा फार-राइट नेटवर्क कहा गया, जो योग, ब्लड बैंक और यूथ होस्टल जैसे सामाजिक कार्यों के बहाने दुनियाभर में फैल रहा है।
यह कवरेज न केवल एकतरफा है, बल्कि स्पष्ट रूप से पक्षपातपूर्ण भी लगता है, क्योंकि इसमें रा.स्व.संघ की सकारात्मक भूमिका को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है और केवल नकारात्मक ऐतिहासिक संदर्भों को उजागर किया गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में ऐसी रिपोर्टिंग की उम्मीद नहीं की जाती, जो भारत जैसे विविधतापूर्ण देश की जटिल सामाजिक वास्तविकता को सरलीकृत करके प्रस्तुत करे। यह पक्षपात अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की छवि को विकृत करने का प्रयास प्रतीत होता है, खासकर जब भारत वैश्विक मंच पर तेजी से उभर रहा है।
रा.स्व.संघ की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी, जब देश ब्रिटिश शासन की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। उस समय हिंदू समाज में व्याप्त असंगठितता और विभाजन को देखते हुए डॉ. हेडगेवार ने एक ऐसा संगठन बनाया, जो हिंदू समाज को अनुशासन, शारीरिक फिटनेस और राष्ट्रीय भावना से जोड़े। रा.स्व.संघ ने कभी राजनीतिक सत्ता की महत्वाकांक्षा नहीं रखी, बल्कि राष्ट्र निर्माण को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया।
स्वतंत्रता संग्राम में रा.स्व.संघ की भूमिका को अक्सर कम आंका जाता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि इसके स्वयंसेवकों ने कांग्रेस के कई आंदोलनों में सक्रिय भाग लिया। डॉ. हेडगेवार स्वयं कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे और जेल भी गए। 1930 के जंगल सत्याग्रह और नमक सत्याग्रह में रा.स्व.संघ के स्वयंसेवकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी कई स्वयंसेवक भूमिगत होकर काम करते रहे। विभाजन के समय रा.स्व.संघ ने लाखों हिंदू और सिख शरणार्थियों की जान बचाई और उन्हें सुरक्षित भारत लाया। यह सेवा भावना रा.स्व.संघ की मूल पहचान है, जिसे न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे मीडिया में नजरअंदाज किया जाता है।
रा.स्व.संघ की सबसे बड़ी ताकत उसकी सामाजिक सेवा है, जो बिना किसी भेदभाव के समाज के हर वर्ग तक पहुंचती है। प्राकृतिक आपदाओं में रा.स्व.संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचते हैं। 2001 के गुजरात भूकंप में हजारों स्वयंसेवकों ने राहत कार्य किया और गांवों का पुनर्निर्माण किया। 2004 की सुनामी, 2013 की उत्तराखंड बाढ़, 2018 की केरल बाढ़ और हाल के चक्रवातों में रा.स्व.संघ की सेवा भारती जैसी सहयोगी संस्थाएं अग्रणी रही हैं।
COVID-19 महामारी के दौरान लाखों स्वयंसेवकों ने मास्क, भोजन और ऑक्सीजन की व्यवस्था की, जब सरकारें भी संघर्ष कर रही थीं। रा.स्व.संघ शिक्षा के क्षेत्र में भी अग्रणी है विद्या भारती जैसे संगठन हजारों स्कूल चलाते हैं, जहां ग्रामीण और जनजातीय बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलती है। स्वास्थ्य सेवाओं में सेवा भारती के अस्पताल और ब्लड बैंक देशभर में फैले हैं। ये कार्य राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र सेवा के लिए किए जाते हैं।
रा.स्व.संघ का दर्शन 'सर्वांगीण विकास' का है, जिसमें व्यक्ति निर्माण से समाज और राष्ट्र निर्माण तक की यात्रा शामिल है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्टिंग में यह सब अनदेखा कर दिया गया। इसके बजाय पुराने प्रतिबंधों, गांधीजी की हत्या से जुड़े संदर्भों (जबकि जांच में रा.स्व.संघ को क्लीन चिट मिली) और हिंदुत्व को 'फार-राइट' कहकर बदनाम करने पर जोर दिया गया।
यह पक्षपात इसलिए भी स्पष्ट है क्योंकि पश्चिमी मीडिया अक्सर भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रनिष्ठा को अपनी लिबरल दृष्टि से देखता है, बिना यह समझे कि हिंदुत्व भारत की प्राचीन सभ्यता की रक्षा है, न कि किसी की घृणा। रा.स्व.संघ कभी अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं रहा.इसके शाखाओं में सभी धर्मों के लोग शामिल होते हैं, और सेवा कार्यों में मुस्लिम, ईसाई समुदायों की भी मदद की जाती है।
मोदीजी का रा.स्व.संघ से जुड़ाव कोई रहस्य नहीं, बल्कि गर्व की बात है, क्योंकि उन्होंने रा.स्व.संघ की अनुशासन और सेवा भावना को राजनीति में उतारा है। भारत आज विश्व की सबसे तेज़ बढ़ती अर्थव्यवस्था है, गरीबी कम हुई है और डिजिटल क्रांति हुई है। इनमें रा.स्व.संघ की विचारधारा का योगदान है।
रा.स्व.संघ की शताब्दी पर न्यूयॉर्क टाइम्स की यह कवरेज भारत विरोधी ताकतों को खुश करने की साजिश के सिवाय कुछ नहीं है।
