सीरिया… कुर्द और युद्धविराम ?

सीरिया… कुर्द और युद्धविराम ?
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डॉ. पवन चौरसिया

तेल और प्राकृतिक गैस जैसे बहुमूल्य संसाधनों से परिपूर्ण क्षेत्र पश्चिम एशिया की तासीर ही कुछ ऐसी है कि यहां शांति नदारद ही रहती है और अनवरत युद्ध एवं अराजकता इसे घेरे रहती है। मौजूदा समय में भी पश्चिम एशिया के हालात ऐसे ही बने हुए हैं। जहां एक ओर ग़ज़ा अभी भी बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है और यमन में गृहयुद्ध अब तक समाप्त नहीं हुआ है, वहीं दूसरी ओर ईरान में भारी सरकार-विरोधी प्रदर्शनों के चलते कमजोर हुए शासन के विरुद्ध अमेरिका व इज़रायल द्वारा किसी सैन्य कार्रवाई की संभावना से पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता।

इसी सबके बीच पश्चिम एशिया के एक अन्य देश सीरिया में एक दशक से भी लंबे चले गृहयुद्ध के चलते हुए तख्तापलट के बाद एक बार फिर अस्थिरता, विघटन और आंतरिक कलह के बादल मंडराने लगे हैं। हालिया मामला दिसंबर 2024 में बशर अल-असद की सरकार का तख्तापलट कर अल-कायदा से जुड़े आतंकी संगठन से उभरे आमद अल-शरा की नई अंतरिम सरकार की सेना और सीरिया के प्रभावशाली कुर्द समुदाय के नेतृत्व वाली सैन्य टुकड़ी ‘सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज’ (एसडीएफ) के बीच हुए युद्ध और संघर्षविराम के स्थायित्व को लेकर है। यह लेख लिखे जाने तक दोनों पक्षों के बीच चार दिनों से जारी युद्धविराम को पंद्रह दिन के लिए बढ़ा दिया गया है।

सीरियाई सरकार की इस कार्रवाई से क्या नई सरकार स्वयं को मजबूती के साथ स्थापित कर पाएगी या फिर इससे सीरिया के अल्पसंख्यकों में उसके प्रति अविश्वास और बढ़ेगा, इसको लेकर विश्लेषकों की राय बंटी हुई है।

क्या है सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज?

सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज (एसडीएफ) एक बहुजातीय सैन्य गठबंधन है, जिसका गठन वर्ष 2015 में सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान मुख्य रूप से इस्लामिक स्टेट (आईएस) से लड़ने के लिए किया गया था। कुर्द, अरब, तुर्कमेन, असीरियन और अर्मेनियाई सहित विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लड़ाकों से मिलकर बना यह गठबंधन उन सैन्य गुटों से उभरा, जिन्हें सीरियाई गृहयुद्ध से पहले अमेरिका से संबद्ध माना जाता था।

मार्च 2019 तक आईएस की पराजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद एसडीएफ उत्तरी और पूर्वी सीरिया के स्वायत्त प्रशासन की आधिकारिक सैन्य शक्ति बन गया, जिसे ‘रोजावा’ के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र में सीरिया के वे स्वशासित इलाके शामिल हैं, जो केंद्र सरकार से अधिक स्वायत्तता प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। बीते एक दशक में एसडीएफ करीब 40,000 पुरुषों और महिलाओं की एक बड़ी ताकत बन गया, जिनमें आधे से अधिक कुर्द नहीं बल्कि अरब लड़ाके थे।

जहां एक ओर इस समूह के आईएस-विरोधी प्रयासों की व्यापक रूप से प्रशंसा की गई, वहीं दूसरी ओर कुछ सीरियाई अरबों द्वारा अल्पसंख्यक-प्रभुत्व वाली इसकी कथित सख्त और केंद्रीकृत नीतियों, विशेषकर इसके नियंत्रण वाले अरब-बहुल क्षेत्रों में, के लिए आलोचना भी की जाती रही है। कई असद-विरोधी विद्रोहियों ने भी कुर्दों द्वारा असद का विरोध करने के बजाय क्षेत्रीय नियंत्रण को प्राथमिकता देने के कारण उन्हें संदेह की नजर से देखा है।

दिसंबर 2024 में बशर अल-असद के शासन को गिराए जाने के बाद से अल-शरा के हयात तहरीर अल-शाम समूह के नेतृत्व में सीरिया के नए नेतृत्व को युद्धग्रस्त देश में सत्ता मजबूत करने के लिए संघर्ष करना पड़ा है। हालांकि शरा ने एक अधिक एकीकृत और प्रतिनिधि सीरिया के निर्माण का संकल्प लिया है, लेकिन उनके शासनकाल में देशभर में गहरे विभाजन और तीव्र सांप्रदायिक तनाव सामने आए हैं।

लगभग बीस दिन पहले शुरू किए गए सैन्य अभियान में सीरियाई सेना ने दैर-अज़-ज़ोर और रक्का प्रांतों के साथ-साथ हसाका के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। सीरियाई सरकारी सेना के हसाका में आगे बढ़ने के साथ ही एसडीएफ ने अल-होल शिविर से अपनी वापसी की घोषणा कर दी है, जहां आईएस से कथित तौर पर जुड़े हजारों लोगों को रखा गया है। इस क्षेत्र का अधिकांश भाग, जिसमें सीरिया के सबसे बड़े तेल क्षेत्र, प्रमुख जलविद्युत बांध और कृषि क्षेत्र शामिल हैं, एसडीएफ द्वारा इस्लामिक स्टेट से छीन लिया गया था, जब कुर्द नेतृत्व वाली यह सेना सीरिया में जिहादियों से लड़ने वाली अमेरिका की मुख्य सहयोगी थी। आईएस को हराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कुर्दों ने इस जीत का लाभ उठाते हुए सीरिया के लगभग एक-तिहाई भूभाग पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर लिया था।

अमेरिका की ‘डू-एंड-डंप’ नीति का शिकार बने कुर्द

सीरिया की सरकारी सेना के हालिया हमले को लेकर अमेरिका के रुख के कारण कुर्दों का अमेरिका के साथ गठबंधन भी कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। दरअसल यह माना जा रहा है कि शरा को सीरिया की सत्ता में बैठाने में अमेरिका, तुर्किये और इज़रायल का हाथ था। सत्ता में आने के बाद शरा ने जिस तरह से इन तीनों देशों के प्रति मित्रवत रुख अपनाया है, उससे अमेरिका और सीरिया के बीच नजदीकियां काफी बढ़ी हैं।

इसी के चलते अमेरिका ने अपने पारंपरिक सहयोगी कुर्दों का साथ छोड़ते हुए उन्हें शरा के नेतृत्व वाली अंतरिम सीरियाई सरकार में शामिल होने की सलाह दी है। कुर्द इस्लामी शासन और उसकी अनुशासनहीन सशस्त्र इकाइयों को लेकर सशंकित हैं और वे शरा की सेना तथा आईएस आतंकवादियों के बीच कोई खास अंतर नहीं देखते।

इन सबके बीच सीरिया पर तुर्किये के दबाव को भी एसडीएफ के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई के पीछे एक बड़ा कारण माना जा रहा है। गौरतलब है कि कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके) से कथित संबंधों के कारण तुर्किये एसडीएफ को आईएस के आतंकवादियों से अलग नहीं मानता। यही वजह है कि तुर्किये ने शरा सरकार पर इनके खिलाफ कार्रवाई का दबाव बनाया।

अमेरिका ने पिछले साल मार्च में शरा और एसडीएफ प्रमुख माज़लूम अब्दी के बीच एक समझौता करवाया था, जिसके तहत एसडीएफ और उसके संबद्ध संगठनों को सीरियाई राज्य में एकीकृत किया जाना था और इसके अंतिम विवरण 2025 के अंत तक तय होने थे। हालांकि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर दुर्भावना और समझौते के प्रति अनिच्छा का आरोप लगाया।

यह भी उल्लेखनीय है कि शरा सरकार के हमले से कुछ समय पहले कुर्द अधिकारियों को एक समझौता प्रस्तावित किया गया था, जिसे बिना शर्त स्वीकार करने की अपेक्षा की गई थी। इसके तहत एसडीएफ की तीन डिवीज़न और दो बटालियनों को सीरियाई राष्ट्रीय सेना में शामिल किया जाना था और इसके प्रमुख माज़लूम अब्दी को उपरक्षा मंत्री बनाए जाने का प्रस्ताव था। परंतु कुर्द अधिकारियों ने सीरिया के अन्य हिस्सों में सरकारी बलों और उनके सहयोगियों द्वारा की गई सांप्रदायिक हिंसा को देखते हुए सुरक्षा गारंटी की मांग की। अंततः एसडीएफ ने शरा सरकार के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। दोनों पक्ष इस बात पर गतिरोध में बने रहे कि क्या कुर्द उत्तर-पूर्वी सीरिया में सीरियाई सरकारी बलों की तैनाती को स्वीकार करेंगे या नहीं।

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