अपने-अपने हिस्से का समाजवाद..!

गांधी और समाजवाद, ये दो ऐसे मसले हैं कि हर राजनीतिक दल इन्हें अपने ब्रांडिंग के रैपर में चिपकाए रखना चाहता है। पर वास्तविकता कुछ वैसी ही है, जैसे गांधी की तस्वीर वाले नोट की ताकत से सभी किस्म के घातक कर्म होते हैं और वैसे ही समाजवाद के नाम की ओट में भी। हमारे यहां चलन है कि जिसे न मानना हो, उसकी मूर्ति विराजकर पूजा-अर्चना शुरू कर दीजिए। गांधी के साथ भी ऐसा ही हुआ और समाजवाद के साथ भी।
हरिशंकर परसाई ने किसी निबंध में लिखा है कि गीता की शपथ लेकर झूठ बोलने में ज्यादा सहूलियत होती है। शपथ खाने वाला यह मानकर चलता है कि उसके झूठ को सब सच ही मानेंगे, क्योंकि उसने गीता की कसम खाई है। आमतौर पर व्यवहार में भी यही देखा जाता है कि झूठा आदमी हर बात में कसमें खाता है।
अपने यहां भाषणबाज, चाहे मोहल्ले का हो या देश का, जनता को भरोसा दिलाने के लिए शपथ जरूर खाता है। लोक परंपरा में शपथ की इतनी इज्जत थी कि तुलसीदास ने लिखा प्राण जाए पर वचन न जाए। चुनावों में राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्र भी इसी संकल्प के साथ जारी किए जाते हैं। जब लोकलाज ही खत्म हो गई हो, तो फिर शपथ की विरासत ही क्या रह जाती है। फिर भी गांधी और समाजवाद की कसमें खाने और शपथ लेने का दस्तूर जारी है।
जब कोई मंत्री या विधिक पद पर आरूढ़ होता है, तब वह मनसा-वाचा-कर्मणा के साथ निष्ठापूर्वक संविधान के पालन की शपथ लेता है। संविधान में समाजवादी शब्द खासतौर पर टंकित है लोकतांत्रिक समाजवादी गणराज्य।
संविधान की पौथी तैयार करते समय या तो बाबा साहेब अंबेडकर समाजवाद को भूल गए थे, या फिर भविष्य में उसकी दुर्गति की कल्पना करते हुए अपने तौर पर उसकी इज्जत बख्श दी। दोनों में से कुछ भी सही हो सकता है। इंदिरा गांधी ने जब देश में आपातकाल लगाया, तो उन्हें समाजवाद की गहरी चिंता हुई। इसलिए 1976 में 42वां संशोधन लाया गया और समाजवाद को संवैधानिक शब्द बना दिया गया। वाह, क्या कंट्रास्ट है आपातकाल और समाजवाद।
गांधीजी को तो कांग्रेस अपनी बपौती मानती आई है, पर उसके लिए समाजवाद शुरू में लफड़े का मुद्दा था। इसी लफड़े के चलते 1934 में कांग्रेस के भीतर ही कांग्रेस समाजवादी दल की स्थापना हुई। इसकी जरूरत क्यों आन पड़ी होगी, चलिए इस पर कुछ मगजमारी करते हैं। समाजवाद का विलोम है व्यक्तिवाद। यानी किसी व्यक्ति की जगह समाज फैसला लेने लगे। राज्य के किसी भी फैसले में समाज के आखिरी आदमी, जिसे समाजवादी जनता जनार्दन, कम्युनिस्ट सर्वहारा और भाजपाई अंत्योदयी कहते हैं, की केंद्रीय भूमिका हो।
समाजवाद की अवधारणा भी लोकतंत्र की भांति पश्चिम से आई है। कांग्रेस में सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-33) की विफलता के बाद गांधी-नेहरू के कथित व्यक्तिवाद में घुट रहे कई मेधावी नेताओं जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्रदेव, डॉ. राममनोहर लोहिया, मीनू मसानी, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता ने पार्टी के भीतर ही समाजवाद की राह पकड़ी। बाद में 1948 में विधिवत समाजवादी दल की स्थापना हुई।
तब से आज तक समाजवादी दल अमीबा की तरह टूटते-फूटते, बिखरते-विखंडित होते हुए नए डंडे और झंडे के साथ चलते रहे हैं। लोकतंत्र और समाजवाद एक-दूसरे के निमित्त वैसे ही परस्पर पूरक हैं जैसे शरीर और आत्मा। लेकिन यह सिद्धांत की बात है। सिद्धांत व्यवहार के धरातल में शायद ही उतर पाता है।
सिद्धांत राजनीतिक दलों की वैसी ही मजबूरी और जरूरत है, जैसे करेंसी नोट पर गांधीजी की फोटो। राजनीतिक दलों को, जहां अब ‘सुप्रीमो’ शब्द ने अध्यक्ष को कूड़े-करकट के ढेर में धकेल रखा है, अपनी स्वेच्छाचारिता और मनमानी को ढंकने के लिए सिद्धांत से बेहतर मखमली खोल और क्या हो सकता है। और यह खोल अगर समाजवाद हो, तो क्या कहना इससे लोकतांत्रिक आस्था अपने आप प्रकट होती है। फिलहाल फासीवाद, निरंकुशता, तानाशाही जैसे तमाम वादों की लोक-प्रतिष्ठा होने तक समाजवाद का लफ्जी लबादा ओढ़े रखने की मजबूरी बनी हुई है।
साम्यवादी अपने आपको आदिसमाजवादी मानते आए हैं, इसलिए वे समाजवाद शब्द को ओढ़ने-बिछाने को गैर-जरूरी मानते हैं। कांग्रेस इसे गांधीवाद के भीतर ही देखती रही है। फिर भी जनता गफलत में न रहे, इसलिए इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के ऐलान के साथ संसद में संविधान संशोधन कर यह बताया कि कांग्रेस के नस-नस, रग-रग में समाजवाद है।
यह बात अलग है कि 1977 में जिन्हें श्रीमती गांधी ने हराया और जेल भेजा, वे भी खुद को समाजवाद के गर्भ से ही निकला हुआ बताते थे। जब ये समाजवादी सत्ता में आए तो तेरा-मेरा समाजवाद कहते हुए आपस में ऐसे उलझे कि फिर सड़क पर आ गए। आखिर जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार कैसे कर सकती थीं। लोहिया, जेपी, नरेंद्रदेव, कृपलानी किसी ने भी पांच साल का सब्र नहीं किया। सौंपा, काएमपीपी, प्रसोपा, संसोपा ये सब पांच साल के भीतर ही बने और बिगड़े।
तब से आज तक समाजवाद के नाम पर कितने दल बने, उजड़े, टूटे, फूटे, बिखरे इसका कहीं न कहीं रिकॉर्ड जरूर होगा। चुनाव आयोग के दस्तावेजों में तो होगा ही।
इन सबके बावजूद यह ध्रुवसत्य सभी ने जाना कि सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने के लिए समाजवाद से बेहतर शीघ्रगामी लिफ्ट कोई नहीं। अटल बिहारी वाजपेयी ने इसकी महिमा को गंभीरता से समझा। 1980 में जनता पार्टी टूटी, जनसंघ भी तिड़ककर बाहर आ गया। अटलजी ने जनसंघ को नए सिरे से गांधीवादी समाजवाद में लपेटकर भारतीय जनता पार्टी का रूप दिया। अटलजी गलत नहीं निकले। 1980 में 2 से शुरुआत हुई और आज भाजपा सत्ता में है, वह भी अच्छे-खासे बहुमत के साथ।
आज संघ के निष्ठावान पूर्णकालिक स्वयंसेवक मोदीजी की भाजपा के पास सब कुछ है सत्ता भी, गांधी भी, समाजवाद भी। वैसे समाजवाद पर सबकी अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं। ब्रिटिश राजनीतिकशास्त्री हेराल्ड लास्की ने कभी कहा था कि समाजवाद ऐसी टोपी है, जिसे कोई भी अपने हिसाब से पहन लेता है।
और अंत में, समाजवाद को समझने की इस पूरी मगजमारी का फौरी सबब हैं रघु ठाकुर। रहन-सहन, आचरण, भाषा-भूषा से समाजवादी और जीवन भर उसे ओढ़ने-बिछाने वाले रघु ठाकुर समाजवाद के आखिरी ‘लुहावे’ धारक हैं, जो सार्वजनिक जीवन में अब भी सक्रिय हैं। हाल ही में वे हमारे शहर के विश्वविद्यालय में प्रख्यात समाजवादी विचारक जगदीश जोशी स्मृति व्याख्यानमाला में मुख्य वक्ता के रूप में आए थे। विषय था समाजवाद का भविष्य।
व्याख्यान के बाद मैंने एक मित्र से पूछा आपकी नजर में समाजवाद का भविष्य क्या है? उन्होंने जवाब दिया जो भविष्य रघु ठाकुर का है, वही भारत में समाजवाद का। फिर समाजवादियों का क्या भविष्य? इस पर उन्होंने मुस्कराते हुए कहा आज जो लालूजी का वर्तमान है, वही शेष समाजवादियों का भविष्य।
