विश्व राजनीति का नया मोड़ भारत-ईयू समझौता

इस सप्ताह भारत ने मौन की शक्ति का प्रभावशाली प्रदर्शन किया। 27 जनवरी 2026 को अंतिम रूप दिए गए भारत-यूरोपीय संघ (ईयू) मुक्त व्यापार समझौते ने दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के बीच आर्थिक संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ ला दिया है। पहले व्यापक सुरक्षा और रक्षा साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर के साथ ही यह दोहरा ढांचा भारत-यूरोपीय संघ संबंधों में एक मौलिक बदलाव का संकेत देता है, जो अब केवल लेन-देन आधारित रिश्तों से आगे बढ़कर एक पूर्ण रणनीतिक साझेदारी की ओर अग्रसर है। यह समझौता वास्तव में वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में एक नए चरण का प्रतीक है।
इसी सकारात्मक घटनाक्रम के बीच वैश्विक स्तर पर कुछ अन्य उल्लेखनीय संकेत भी सामने आए हैं। रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की को संघर्ष समाधान के उद्देश्य से रोम में चर्चा के लिए आमंत्रित किया है। वहीं इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने घोषणा की है कि इज़राइल अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करेगा और भारत के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करेगा। ये सभी घटनाक्रम हर क्षेत्र में भारत के बढ़ते प्रभाव को दर्शाते हैं।
भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता, जिसे हाल ही में दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच की बैठक के दौरान यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने ‘सभी समझौतों की जननी’ कहा था, सात वर्षों की कठिन वार्ताओं की परिणति है, जिन्हें 2019 में पुनः आरंभ किया गया था। यह समझौता वैश्विक भू-राजनीति के एक ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ पर सामने आया है, जब भारत और यूरोपीय संघ दोनों ही अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक हितों के लिए बढ़ती चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
सुरक्षा और रक्षा साझेदारी पर एक साथ हस्ताक्षर यह स्पष्ट स्वीकार्यता प्रदान करते हैं कि आज के अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में आर्थिक गठबंधन और सुरक्षा सहयोग मूल रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। सामूहिक रूप से ये दोनों एक व्यापक रणनीतिक संरचना का निर्माण करते हैं, जो पारंपरिक व्यापार समझौतों से आगे बढ़कर रक्षा-औद्योगिक सहयोग, प्रौद्योगिकी आदान-प्रदान और खुफिया जानकारी साझा करने जैसे क्षेत्रों को भी शामिल करता है।
इस समझौते के तहत यूरोपीय संघ मूल्य के हिसाब से भारत के 99 प्रतिशत से अधिक निर्यात पर शुल्क समाप्त कर देगा, जिससे कपड़ा, चमड़ा और रत्न-जड़ित आभूषण जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों को बड़ा लाभ मिलेगा। इसके बदले भारत चरणबद्ध तरीके से यूरोपीय संघ के लगभग 92 से 97 प्रतिशत उत्पादों को शुल्क-मुक्त प्रवेश देगा, जिसमें मशीनरी, रसायन और प्रीमियम श्रेणी की कारों पर शुल्क में उल्लेखनीय कमी शामिल है, जो कुछ मामलों में 110 प्रतिशत से घटकर 10 प्रतिशत तक हो जाएगी।
वस्तुओं के साथ-साथ समझौते में सेवाओं और श्रमिक गतिशीलता के लिए एक महत्वाकांक्षी ढांचा भी शामिल है, जो भारत को यूरोपीय संघ के 14 से अधिक क्षेत्रों तक बेहतर पहुंच प्रदान करता है और कुशल पेशेवरों व छात्रों के लिए वीजा प्रक्रियाओं को सरल बनाता है। हालांकि डेयरी और अनाज जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को छूट देकर सुरक्षित रखा गया है, लेकिन समझौता जलवायु और श्रम अधिकारों से संबंधित प्रतिबद्धताओं को शामिल करते हुए व्यापार और सतत विकास अध्याय के जरिए समकालीन व्यापार मुद्दों को भी संबोधित करता है।
दूसरी ओर, सुरक्षा एवं रक्षा साझेदारी भारत और यूरोपीय संघ के बीच रक्षा सहयोग के लिए पहला व्यापक ढांचा प्रस्तुत करती है। यह साझेदारी, जो जापान और दक्षिण कोरिया के बाद एशिया में यूरोपीय संघ का तीसरा ऐसा समझौता होगी, वार्षिक सुरक्षा एवं रक्षा संवादों की शुरुआत करती है और समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी प्रयासों तथा परमाणु अप्रसार जैसे क्षेत्रों में संस्थागत तंत्र स्थापित करती है।
इस ढांचे का एक विशेष रूप से महत्वपूर्ण पहलू रक्षा-औद्योगिक सहयोग से संबंधित है। यह भारतीय कंपनियों को यूरोपीय संघ की ‘रेडिनेस 2030’ पहल और प्रस्तावित 400 अरब यूरो की ‘रीआर्म यूरोप’ योजना में शामिल होने के अवसर प्रदान करता है, जिसे मार्च 2025 में पेश किया गया था। यह यूरोपीय संघ की रक्षा खरीद रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है, जो अटलांटिक पार आपूर्तिकर्ताओं से आगे बढ़कर अपने रक्षा औद्योगिक स्रोतों को विविध बनाने के इरादे को स्पष्ट करता है।
भारत के लिए यह अवसर सरकार के रणनीतिक स्वायत्तता के एजेंडे और रक्षा विनिर्माण पर केंद्रित ‘मेक इन इंडिया’ पहल के अनुरूप है। हाल के वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र सहित भारतीय रक्षा निर्माताओं ने अपनी उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की है। यूरोपीय संघ के साथ यह साझेदारी यूरोपीय आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकरण और सह-उत्पादन समझौतों के लिए आवश्यक मार्ग प्रदान करती है, जिससे वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र के रूप में भारत की क्षमता और सुदृढ़ होती है।
सूचना सुरक्षा समझौते से संबंधित ढांचे के प्रावधान भी विशेष ध्यान देने योग्य हैं। इसका उद्देश्य एक ऐसा कानूनी आधार प्रदान करना है, जो भारत और यूरोपीय संघ के बीच गोपनीय सूचनाओं के आदान-प्रदान को सुगम बनाए। ऐसे ढांचे रक्षा-औद्योगिक और प्रौद्योगिकी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए अनिवार्य हैं और यह दर्शाते हैं कि दोनों पक्ष इस संबंध को गहन रणनीतिक एकीकरण के स्तर तक ले जाने को तैयार हैं।
मुक्त व्यापार समझौते और रक्षा ढांचे का समय प्रमुख वैश्विक शक्तियों द्वारा रणनीतिक स्वायत्तता की बढ़ती मांग के अनुरूप है। ट्रम्प प्रशासन की संरक्षणवादी नीतियों और नाटो को लेकर अस्पष्ट प्रतिबद्धताओं के कारण यूरोपीय संघ को अटलांटिक पार सुरक्षा ढांचे को लेकर अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ रहा है। वहीं भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच चीन और रूस दोनों के साथ जटिल संबंधों को संतुलित करने में जुटा है।
भारत और यूरोपीय संघ की यह साझेदारी दोनों के लिए द्विआधारी गठबंधनों के विकल्प प्रस्तुत करती है। यूरोपीय संघ के लिए भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की खोज, उसका गुटनिरपेक्ष दृष्टिकोण और सूचना प्रौद्योगिकी व विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में उसकी तकनीकी क्षमताएं पूरक लाभ प्रदान करती हैं। भारत के लिए वैश्विक जीडीपी के लगभग 25 प्रतिशत हिस्से वाले एक संगठित समूह के साथ सहयोग महाशक्तियों के दबावों का प्रतिकार करता है और उन्नत प्रौद्योगिकियों तक पहुंच को संभव बनाता है।
सामूहिक रूप से ये घटनाक्रम अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के भीतर हो रहे संरचनात्मक परिवर्तनों को रेखांकित करते हैं-पारंपरिक गठबंधनों से परे साझेदारियों का विस्तार, भारत का एक केंद्रीय धुरी के रूप में उभरना और वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए वैकल्पिक संस्थागत ढांचों की स्थापना। यह नई भारत–यूरोपीय संघ साझेदारी एक ऐसा व्यापक रणनीतिक जुड़ाव प्रस्तुत करती है, जो आधुनिक अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य की बहुध्रुवीय जटिलताओं के लिए उपयुक्त है।
इस साझेदारी का महत्व केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है। यह दर्शाता है कि आज के शक्ति प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक अनिश्चितता के दौर में समान मूल्यों और पूरक क्षमताओं वाले लोकतंत्र ऐसी साझेदारियां बना सकते हैं, जो आर्थिक परस्पर निर्भरता के साथ-साथ रणनीतिक सहयोग, पारस्परिक लाभ और साझा दृष्टिकोण पर आधारित हों।
