खंड-खंड कुटुम्बकम्

खंड-खंड कुटुम्बकम्
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जयराम शुक्ल

यूरोप के बर्फीले देश फिनलैंड के एक अत्यन्त रईस व्यक्ति की एक दिलचस्प वसीयत का समाचार पढ़ने को मिला। उसने कैफियत दी थी कि इसे उसे दफनाने के बाद खोला जाए। वसीयत जब खुली तो यह जानकर लोग भौचक्के रह गए कि उसने अपनी खरबों डॉलर की संपत्ति उन लोगों को बांटने को कहा था जो उसकी अंतिम यात्रा में शामिल थे। अंतिम यात्रा में कुल सात लोग शामिल हुए जिसमें एक उसकी देखभाल करने वाली नर्स, चार म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के कर्मचारी, एक एंबुलेंस ड्रायवर और एक पादरी। पूरी संपत्ति इन्हों के बीच बांट दी गई, चार बेटे बेटियों, बहू-दमादों, नाती-पोतों का भरापूरा परिवार हाथ मलता रह गया क्योंकि ये अपने पिता के अंतिम संस्कार तक का वक्त नहीं निकाल पाए। ये सभी रहते भी पिता से अलग थे, अन्य शहरों में अपने-अपने काम में मस्त। ऐसी घटनाएं यूरोप से चलकर भारत की ओर आ रही है क्योंकि हमारे बच्चे यूरोपीय हो रहे हैं।

वसुधैव कुटुंबकम् की अवधारणा देने वाले भारत महादेश में संयुक्त परिवार खंड-खंड होते जा रही हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसे सदी की सबसे संभावित त्रासदी मानते हुए पंच परिवर्तन कार्यक्रम में कुटुंब प्रबोधन को वरीयता के क्रम में रखा है। परिवार टूटें न इसके जतन होने चाहिए। हमारी ज्ञान परंपरा में बुजुर्गों और पुरखों को देवतुल्य माना गया है। पर इन देवताओं का हाल यह कि प्रायः हर शहर में ओल्ड एज होम खोले जा रहे हैं। रियल इस्टेट के कॉर्पोरेट घराने इसमें अच्छा खासा निवेश कर रहे हैं।

सेवानिवृत्त अफसरों और धनिकों के पास अकूत संपत्ति है. उसके वारिस हैं परवरिश करने वाले नहीं। परिणामतः अवसाद में आकर ये बुजुर्ग आत्महत्याओं की ओर उद्धृत हो रहे हैं। पिछले साल की भोपाल की घटना सभी को मर्माहत कर गई, जब एक पढ़ी लिखी बेटी ने अपने मां-बाप को मवेशियों की तरह बंदी बनाकर अंधेरे कमरे में बंद कर दिया था। वह पूरी संपत्ति अपने नाम कराना चाहती थी। हमारे देश में मां के लिए दो नवरात्रियां व पिता के लिए एक पखवाड़ा पितृपक्ष के नाम से मनाया जाता है। मरने के बाद उनकी श्राद्ध में हलवा पूड़ी खिलाते हैं जिन्हें जीते जी एक गिलास पानी देने तक का वक्त नहीं निकाल पाते। जिंदा पितरों की दुर्गति परिवार दर परिवार बढ़ती ही जा रही है। चलिए जिंदा पितरों का हालचाल जाने।

वैसे भी जो इस लोक में नहीं वे गरुड़पुराण के विधानानुसार सरग या नरक में फल भोग रहे होंगे। जो प्रत्यक्ष है नहीं उनकी चिंता करने से लाभ ही क्या? पर हां हमारा यह धरम जरूर बनता है कि जो पुरखे दयालु, धर्मात्मा, परोपकारी, विद्वान रहे है उनकी सीख, उनके आदर्श, उनके आचरण को पितरपख में ही क्यों..! हर पल, आठों याम स्मरण रखें। हमारे समाज में कितने ही बुजुर्ग पितर बन जाने की प्रतीक्षा में है, कइयों को घर में ठौर नहीं इसलिए वृद्धाश्रम में जिन्दगी की उलटी गिनती गिन रहे हैं। इनकी चिंता इसलिए जरूटी है क्योंकि कल हम भी पितर में परिवर्तित हो जाने वाले हैं।

फिलहाल एक ऐसे ही जिंदा पितर की सत्यकथा सुनाते हैं-' पितरों की श्रेणी में पहुंचने से पहले ये बड़े अधिकारी थे। ऑफिस का लावलश्कर चेले चापड़ी, दरबारियों से भरापूरा बंगला। जब रसूख था और दौलत थी तब बच्चों के लिए वक्त नहीं था। लिहाजा बेटा जब ट्विंकल ट्विंकल की उमर का हुआ तो उसे बोर्डिंग स्कूल भेज दिया। आगे की पढ़ाई अमेरिका में लड़का देश, समाज,परिवार, रिश्तेदारों से कैसे दूर होता

गया साहब बहादुर को यह महसूस करने का वक्त ही नहीं मिला। वे अपने में मुदित रहे। उधर एक दिन बेटे ने सूचना दी कि उसने शादी कर ली है। इधर साहब बहादुर दरबारियों को बेटे की माडर्न जमाने की शादी के किस्से सुनाकर खुद के भी माडर्न होने की तृप्ति लेते रहे क्योंकि इसके लिए भी वक्त नहीं था। एक दिन वह भी आया कि रिटायर्ड हो गए। बड़ा बंगला सांयसाथ लगने लगा। सरकारी लावलश्कर, दरबारी अब नए अफसर का हुक्का भरने लगे। जब तक नौकरी की नाते रिशतेदारों को दूरदुराते रहे। रिटायर हुए तो अब वे नाते रिश्तेदार दूरदुराने लगे। तनहई क्या होती है अब उससे वास्ता पड़ा। वीरान बंगले के पिंजडे में वे पत्नी तोता मैना की तरह रह गए। एक दिन सूचना मिली कि विदेश में उनका पोता भी है जो अब पांच बरस का हो गया। बेटे ने माता-पिता को अमेरिका बुला भेजा। रिटायर्ड अफसर बहादुर को पहली बार गहराई से अहसास हुआ कि बेटा, बहूनाती पोता क्या होता है। दौलत और रसूख की ऊष्मा में सूख चुका वात्सल्य उमड़ पड़ा। वे अमेरिका उड़ चले। बहू और पोते की कल्पित छवि संजोए। बेटा हवाई अड्डा लेने आया। वे मैनहट्टन पहुंचे। गगनचुंबी अपार्टमेंट में बेटे का शानदार फ्लैट था। सबके लिए अलग कमरे। सब घर में थे अपने अपने में मस्त।

सबके पास ये सूचनाएं तो थी कि एक दूसरे का जैविक रिश्ता क्या है पर वक्त की गर्मी ने संवेदनाओं को सूखा दिया था। एक छत के नीचे सभी थे पर यंत्रवत् रोबोट की तरह। पर था, दीवारें थी, परिवार नाहीं था। रात को अफसर साहब को ऊब लगी पोते की। सोचे इसी के साथ सोएंगे, उसका घोड़ा बनेंगे, गप्पे मारेंगे आह अंग्रेजी में जब वह तुतलाकर दहू कहेगा तो कैसा लगेगा।

वे आहिस्ता से फ्लैट के किडरूम गए। दरवाजाखोल के पोते को छाती में चिपकाना ही चाहा कि वह नन्हा पिलंडा बिफर कर बोला.. हाऊ डेबर यू इंटर माई रूम परमीशन.. दहू। विदाउट माई दहू के होश नहीं उड़े बल्कि वे वहीं जड़ हो गए पत्थर के मूरत को तरह। दूसरे दिन की फ्लाइट पकड़ी भारत आ गए। एक दिन अखबार में वृद्धाश्रम की स्पेशल स्टोरी में उनकी तस्वीर के साथ उनकी जुबान से निकली यह ग्लानिकथा पढ़ने व देखने को मिली।' इस कथा में तय कर पाना मुश्किल है कि जवाबदेह कौन? पर यह कथा इस बात को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है कि संयुक्त परिवारों का विखंडन भारत के लिए युग की सबसे बड़ी त्रासदी है।

संवेदनाएं मर रही हैं और रिश्ते नाते वक्त की भट्टी में स्वाहा हो रहे है। कभी संयुक्त परिवार समाज के आधार थे जहां बेसहारा को भी जीते जी अहसास नहीं हो पाता था कि उसके आगे पीछे कोई नहीं। वह चैन की मौत मरता था। आज रोज बंगले या फ्लैट में उसके मालिक की दस दिन या महीनेभर की पुरानी लाश मिला करती है।

वृद्धों में खुदकुशी करने की प्रवृत्ति बड़ी है। पुरखे हमारी निधि हैं और पितर उसके संवाहक। हमारी संस्कृति व परंपरा में पितृपक्ष इसीलिए आया कि हम अपने बाप दादाओं का स्मरण करते रहे। और उनकी जगह खुद को रखकर भविष्य के बारे में सोचें। हमारे पुरखे श्रुति व स्मृति परंपरा के संवाहक थे। भारतीय ज्ञान परंपरा ऐसे ही चलती चली आई है और वांगमय को समृद्ध करती रही है। ये पितरपक्ष रिश्तों को ऊष्मा और त्रासदी पर विमर्श का भी पक्ष है। रवीन्द्रनाथ टैगोर की चेतावनी को नोट कर लें-जो पीढ़ी पुरखों को विस्मृत कर देती है उसका भविष्य रुग्ण और असहाय हो जाता है।

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