संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता पर सवाल

संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता पर सवाल
X
उमेश चतुर्वेदी

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी को लेकर भारत की संतुलित प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। अमेरिका से व्यापारिक रिश्तों को ध्यान में रखते हुए भारत द्वारा की गई कार्रवाई की कड़ी आलोचना राष्ट्रीय कूटनीतिक शिष्टता की दृष्टि से उचित नहीं कही जा सकती। वहीं, कुछ राष्ट्रों द्वारा तीखी प्रतिक्रिया देना भी उनके राष्ट्रीय हितों के अनुरूप माना जा सकता है।

लेकिन इस बार भारत के लोगों ने इस कार्रवाई के विरोध में प्रतिक्रिया व्यक्त की है, जिसे भारतीय लोक-स्वभाव की स्वाभाविक प्रक्रिया का ही हिस्सा माना जाना चाहिए। भारतीय समाज स्वभाव से लोकतांत्रिक है और वह लोकतांत्रिक संस्थाओं को सैन्य कार्रवाई के जरिए उखाड़ना पसंद नहीं करता। भारतीय लोक-चेतना का झुकाव सदैव कमजोर के पक्ष में रहा है। इसी कारण अधिकांश भारतीय प्रतिक्रियाएं निकोलस मादुरो के पक्ष में और अमेरिका की कार्रवाई के विरोध में देखने को मिली हैं।

पहली बात यह है कि ताकतवर के लिए कुछ भी करना संभव होता है। वह इसे नियमों और कानूनों की परिभाषा में ढाल सकता है। दुनिया चाहे चिल्लाती रहे कि किसी राष्ट्राध्यक्ष को रातों-रात अपदस्थ कर गिरफ्तार करना और उसे अपने कानून के दायरे में लाना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है, लेकिन इसका अमेरिका की नीति पर कोई खास असर नहीं पड़ता। अमेरिका ने एक तरह से इतिहास को दोहराया है।

अमेरिका अपने हितों के विरुद्ध जिस देश को सिर उठाते देखता है, उसके खिलाफ सैन्य, कूटनीतिक और आर्थिक कार्रवाई करने में देर नहीं लगाता। इस मौके पर जॉर्ज बुश सीनियर के दौर को भी याद किया जाना चाहिए। कुवैत में इराकी सेना की बर्बर कार्रवाई के खिलाफ अमेरिका ने युद्ध छेड़ा, लेकिन सत्ता में रहते हुए वे सद्दाम हुसैन को अपदस्थ नहीं कर पाए। उनके अधूरे कार्य को उनके बेटे जॉर्ज बुश जूनियर ने पूरा किया।

इसके लिए ओसामा बिन लादेन और उसके आतंकी संगठन अलकायदा को बहाना बनाया गया। इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को हटाने के लिए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश जूनियर और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच का उपयोग किया। संयुक्त राष्ट्र द्वारा भेजे गए वैज्ञानिकों और पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के आधार पर दावा किया गया कि इराक के पास व्यापक जनसंहार के हथियार हैं।

अमेरिका की नजर में सद्दाम जैसे तानाशाह के हाथों में ऐसे हथियार मानवता के लिए खतरा थे। इसके बाद अमेरिका और ब्रिटेन ने इराक पर सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी। इराक तहस-नहस हो गया, सद्दाम गिरफ्तार किए गए और अंततः उन्हें फांसी दे दी गई। बाद में यह सामने आया कि इराक के पास ऐसे हथियार थे ही नहीं।

इस पूरे प्रकरण में बीबीसी को यह खबर लीक करने वाले ब्रिटिश वैज्ञानिक डेविड केली संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाए गए। ब्रिटेन सरकार को इस मामले में भारी आलोचना का सामना करना पड़ा।

इराक में अमेरिकी तर्ज का लोकतंत्र तो स्थापित कर दिया गया, लेकिन क्या वहां स्थायी शांति आई? यही प्रश्न आज वेनेजुएला को लेकर भी उठ रहा है। सवाल यह है कि मादुरो के बाद वहां जो सत्ता स्थापित हुई है, क्या वह नशीले पदार्थों के कारोबार को रोक पाएगी?

नशीले पदार्थों की बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्रंप प्रशासन ने मादुरो पर आरोप लगाया है कि वे ड्रग्स तस्करी को बढ़ावा दे रहे थे। अमेरिका का वास्तविक उद्देश्य तेल भी माना जा रहा है। वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा कच्चे तेल का भंडार है करीब 303 अरब बैरल। इसके बावजूद वह तेल उत्पादन में बहुत पीछे है और वैश्विक स्तर पर 21वें स्थान पर है।

इसका कारण यह है कि वहां बुनियादी ढांचे की भारी कमी है और मादुरो के सत्ता में आने के बाद अमेरिका ने कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। इन प्रतिबंधों के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ। अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले भारत वेनेजुएला का बड़ा तेल आयातक था। भारत की संतुलित प्रतिक्रिया के पीछे भारतीय तेल कंपनियों का वहां किया गया भारी निवेश भी एक कारण है। भारत के लगभग हजार करोड़ रुपये वहां फंसे हुए हैं।

अमेरिका में भी एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि मादुरो को हटाने के पीछे ट्रंप प्रशासन की मंशा अपने पारिवारिक नियंत्रण वाली तेल कंपनियों को लाभ पहुंचाना है।

इस पूरी कार्रवाई के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। अमेरिका ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र को ठेंगा दिखाया है। इस संकट में संयुक्त राष्ट्र संघ और उसके महासचिव की भूमिका केवल बयान देने और सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाने तक सीमित रह गई।

दुनिया को अब सोचना होगा कि क्या वास्तव में वैश्विक व्यवस्था को ताकतवर ही चलाएंगे? क्या कमजोर राष्ट्रों की संप्रभुता और स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं रह गया है? विडंबना यह है कि अमेरिका स्वयं को लोकतंत्र का सबसे बड़ा संरक्षक मानता है, जबकि वैश्विक मंच पर उसका आचरण कई बार तानाशाही जैसा रहा है।

एक और महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या परमाणु शक्ति ही किसी राष्ट्र की वास्तविक सुरक्षा है? यदि वेनेजुएला परमाणु शक्ति संपन्न होता, तो क्या उस पर ऐसी कार्रवाई संभव होती? यूक्रेन इसका बड़ा उदाहरण है। यदि उसके पास परमाणु हथियार होते, तो क्या आज उसकी स्थिति ऐसी होती?

अमेरिकी कार्रवाई के बाद यह भी आशंका जताई जा रही है कि उत्तर कोरिया अगला निशाना हो सकता है, लेकिन यह भी सच है कि उत्तर कोरिया परमाणु हथियारों से लैस है। इसी कारण अमेरिका वहां सीधे हस्तक्षेप से बचता रहा है।

अफगानिस्तान और वियतनाम जैसे उदाहरण बताते हैं कि सैन्य शक्ति के बावजूद अमेरिका को कई जगहों पर मुंह की खानी पड़ी है।

Next Story