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पुण्य-भूमि वर्धा : गांधी ने अपने महत्वाकांक्षी कार्यक्रम का केंद्र बनाया

प्रोफ़ेसर गिरीश्वर मिश्र

पुण्य-भूमि वर्धा : गांधी ने अपने महत्वाकांक्षी कार्यक्रम का केंद्र बनाया
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वेबडेस्क। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में नागपुर से 75 किलोमीटर की दूरी पर स्थित वर्धा को महात्मा गांधी ने अपने महत्वाकांक्षी कार्यक्रम का केंद्र बनाया. सन 1930 के दांडी सत्याग्रह में उन्होंने 390 किलोमीटर लम्बी पद-यात्रा 24 दिनों में पूरी की थी और कानून को तोड़ कर नमक बनाया था. इस बीच उन्होंने तंय किया कि स्वतंत्रता मिले बगैर वे आश्रम नहीं लौटेंगे. वे गिरफ्तार हो कर यरवदा जेल में रहे और बाहर आने पर पूरे देश की यात्रा की. इस दौरान उन्हें लगा कि आन्दोलन का केंद्र भारतवर्ष के मध्य में होना चाहिए. तभी वर्धा के सेठ जमनालाल बजाज ने उनसे वर्धा आने का आग्रह किया जिसे स्वीकार कर गांधी जी यहाँ आए और फिर यहीं के हो गए. जमनालाल जी का गांधी जी के विचारों और कार्यों में अगाध विश्वास था और गांधी जी का भी उन पर बड़ा स्नेह था. वर्धा पहुँच कर गांधी जी बजाजवाड़ी में रहे और जमनालाल जी द्वारा दिए गए एक बड़े भू खंड पर अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ की शुरुआत की और गावों की हस्त-कलाएं और हुनर, खेती से जुड़े कुटीर उद्योग, सफाई और अस्पृश्यता-निवारण आदि रचनात्मक कार्यों को शुरू किया. यह स्थान 'मगनवाड़ी' के रूप में विख्यात हुआ.

स्मरणीय है कि वर्धा की बजाजवाड़ी में पंडित जवाहर लाल नेहरू, ड़ा. राजेन्द्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरदार वल्लभभाई पटेल, खान अब्दुल गफ्फार खान, आचार्य कृपालानी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, सरोजिनी नायडू आदि अनेक नेता आते रहे. यहाँ के गांधी चौक का भी ऐतिहासिक महत्त्व है जहां पर बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, साने गुरूजी, संत गाडगे जी महाराज और संत तुकड़ोजी महाराज आदि के सार्वजनिक प्रवचन भी आयोजित होते रहे.

इस बीच गांधी जी ने महसूस किया कि उन्हें गाँव के एक साधारण किसान की तरह रहना चाहिए. उनकी इस इच्छा अनुरूप मगनबाड़ी से 10 किलोमीटर की दूरी पर 'सेगाँव' नामक स्थान पर जमनालाल जी द्वारा दी गई जमीन पर एक आश्रम का निर्माण हुआ. सन 1936 में 67 वर्ष की आयु के गांधी जी 'सेगाँव' पहुंचे. उनकी हिदायत के मुताबिक़ सेगांव में उनकी कुटी का निर्माण लकड़ी, मिट्टी, गारे आदि के स्थानीय संसाधनों से किया गया. उनकी कुटी को 'आदि निवास' का नाम मिला. जब आगंतुकों की संख्या बढ़ने लगी तो गांधी जी एक दूसरी कुटी जिसे अब 'बापू कुटी' कहा जाता है, उसमें चले गए जिसे उनकी अंग्रेज शिष्या मीरा बेन ( मेडीलन स्लेड ) ने अपने उपयोग और स्त्रियों को कताई के प्रशिक्षण के लिए तैयार कराया था. फिर बापू कुटी, बा कुटी, कार्यालय, महादेव कुटी, परचुरे कुटी, आखिरी निवास और सार्वजनिक रसोई घर भी बने जिसमें दलित लोगों को लगाया गया ताकि अस्पृश्यता से घृणा दूर हो. गांधी जी ने इस जगह का नाम 'सेवा-ग्राम' रख दिया. सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय (चोरी न करना) अपरिग्रह( जरूरत से ज्यादे सामान न रखना), शारीरिक श्रम, अस्वाद (स्वाद पर नियंत्रण ), अभय, सर्वधर्म-समभाव, स्वदेशी और अस्पृश्यता-निवारण आश्रम-व्रत थे और लक्ष्य थे: बिना घृणा के मातृभूमि की सेवा, दूसरों को दुःख दिए बिना अध्यात्म का विकास, साधन और साध्य की पवित्रता और आत्म-निर्भरता.

गांधी जी की अनुशासित दिन-चर्या रहती थी. वे सोमवार को मौन रहते थे. प्रात: और संध्या समय प्रार्थना होती थी जिसमें विभिन्न धर्मों की प्रार्थनाएं शामिल थीं. नरसीदास का भजन 'वैष्णव जन तो तेने कहिए' और श्रीमद्भगवद्गीता का द्वितीय अध्याय बड़े प्रिय थे. जमनालाल बजाज ने तन, मन और धन से गांधी जी का भरपूर सहयोग किया. दादा धर्माधिकारी, काका कालेलकर, श्रीकृष्णदास जाजू, मनोहर दीवान, किशोरलाल मशरूवाला, तथा जे. सी. कुमारप्पा आदि भी उनके साथ जुटे हुए थे. महादेव देसाई, प्यारे लाल और राजकुमारी अमृत कौर ने बतौर सचिव जिम्मेदारी उठाई. सत्याग्रहियों के प्रशिक्षण और रचनात्मक कार्यक्रमों की इस प्रयोगशाला में नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों को आकार मिलने लगा.

वर्धा के लक्ष्मी नारायण मंदिर में 17 जुलाई 1928 को गांधी जी ने दलितों के साथ प्रवेश किया. बाबा साहब आम्टे भी आश्रम में रहे . गांधी जी ने उन्हें 'अभय साधक' कहा था. बाबा आम्टे ने कुष्ट रोगियों के लिए अलग आश्रम बना कर इस क्षेत्र की बड़ी सेवा की. सन 1936 में हिन्दी भाषा को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति गठित की जो तब से अनवरत कार्यरत है. अंग्रेजी शिक्षा के कटु आलोचक गांधी जी की अध्यक्षता में अक्टूबर 1937 में राष्ट्रीय सम्मलेन हुआ था जिसमें हस्त-कौशल पर आधृत सात साल की आयु तक निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा तथा मातृ-भाषा में शिक्षा प्रस्तावित की गई. गांधी जी की 'नई तालीम' में ह्रदय, मस्तिष्क और हाथ तीनों के उपयोग पर बल दिया गया. डा. जाकिर हुसेन की अध्यक्षता में एक समिति ने 'वर्धा शिक्षा-योजना' तैयार की. सेवा-ग्राम का आनंद निकेतन विद्यालय आज भी इसी राह पर चल रहा है .

सेवा-ग्राम में आगंतुकों में खान अब्दुल गफ्फार खान, संत टुकड़ो जी, अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर, भारत के वाइसराय लार्ड लिन लिथिगो और जापान के फूजी गुरूजी का नाम उल्लेखनीय है. सन 1935 में विश्व शान्ति अधिवेशन हुआ था. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अनेक बैठकें यहाँ होती रहीं. बापू कुटी भारत की राजधानी का काम कर रही थी. यहीं 1942 में शुरू हुए प्रसिद्ध 'अंग्रेजो भारत छोड़ो' के निर्णायक आन्दोलन का फैसला लिया गया था. सन 1946 में गांधी जी यहाँ से दंगाग्रस्त नोआखाली में शांति बहाल करने निकले फिर वापस नहीं आए. गांधी-स्मृति से सराबोर सेवा-ग्राम अभी भी सरल, सात्विक और नैतिक जीवन की संभावना जगाए हुए है.

आचार्य विनोबा भावे सन 1921 में गांधी जी के कहने पर वर्धा आए और सत्याग्रह आश्रम की शाखा स्थापित की. उन्होंने 1934 में परम धाम आश्रम और ब्रह्म-विद्या मंदिर पवनार नामक स्थान पर स्थापित किया. गांधी जी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी विनोबा जी कई बार जेल गए जहां उन्होंने खूब अध्ययन किया, कई भाषाएँ सीखीं और अध्यात्म विषयक अनेक पुस्तकें लिखीं. वर्ष 1940 में गांधी जी ने उन्हें असहयोग आन्दोलन का पहला सत्याग्रही चुना था. बिनोबा जी का नारा था 'जय जगत'. उन्होंने सन 1951 में भूदान आन्दोलन शुरू किया. उनके द्वारा गीता का मराठी अनुवाद किया गया जिसे ग्रेनाइट की शिलाओं पर अंकित कर भव्य 'गीताई' उद्यान-मंदिर में स्थापित किया गया है जिसका उदघाटन बिनोबा जी ने 1980 में किया था. सन 1982 में उन्होंने समाधि-मरण (संथारा) अपना कर देह-त्याग किया. ब्रह्म-विद्या मंदिर अभी भी सक्रिय है और आत्मनिर्भरता और टिकाऊ जीवन शैली का सजीव सन्देश दे रहा है.

वर्धा गांधी जी का पर्याय हो गया और वहां की परम्परा का अंश बन गया. आधुनिक परिवेश में वैश्वीकरण और प्रौद्योगिकी की विकराल होती छाया के बीच गांधी-विचार का आकर्षण कम हो रहा है तब भी अनेक उपक्रम उसे आगे बढ़ा रहे हैं. (स्व.) देवेन्द्र कुमार, (स्व.) टी. करुणाकरण, उल्हास जाजू, गौतम बजाज, भरत महोदय, सोहं पंडया, अतुल देशपांडे, अनिल सोले, सुषमा शर्मा, विभा गुप्ता तथा ओ. पी. गुप्त प्रभृति जैसे समर्पित और सृजनधर्मी जनों की सक्रियता से आशा बंधती हैं. यहाँ कई संस्थाएं महात्मा गांधीजी के सपनों को जी रही हैं. जहां गांधी जी 1944-36 में निवास किए थे वहां पर अब महात्मा गांधी इंस्टीच्यूट फॉर रूरल इंजीनियरिंग चल रहा है. जमनालाल बजाज फाउंडेशन, महात्मा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, ग्रामोपयोगी विज्ञान-केंद्र, गांधी सेवा-संघ, सर्वसेवा संघ, नई तालीम समिति, मगन-संग्रहालय, आचार्य-कुल, महिला आश्रम, गांधी ज्ञान-मंदिर, गोरस-भण्डार, लेप्रोसी फाउंडेशन, तथा चर्मालय जैसी संस्थाएं लोक-कल्याण में संलग्न हैं. वर्धा की पुण्य-भूमि स्वतंत्रता की अप्रतिम गाथा के साथ देश-भक्तों के लिए सदैव प्रेरणा देती रहेगी.

Updated : 23 Aug 2022 1:38 PM GMT
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स्वदेश वेब डेस्क

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