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महामानव एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पूज्य श्री पंडित गोपाल कृष्णजी पुराणिक

लेखक - माधव शरण द्विवेदी, पूर्व उप प्राचार्य शिवपुरी मध्यप्रदेश

महामानव एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पूज्य श्री पंडित गोपाल कृष्णजी पुराणिक
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मुझे पूज्य पंडित जी के सानिध्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ इसलिये मैं अपने आप को भाग्यशाली मानता हूॅूॅॅ़़। आदर्श सेवा संघ के संस्थापक अध्यक्ष और रूरल इंडिया के सम्पादक पूज्य पुराणिक जी सच्चे देश भक्त थे व ग्वालियर के प्रसिद्व गंाधीवादी नेता थे। ग्वालियर राज्य में राजनीतिक चेतना तथा पोहरी शिवपुरी क्षेत्र में जो राजनीतिक जागृति हुई और लोगों में राष्ट्र सेवा की भावना आई उसका मुख्य श्रेय श्री पुराणिक जी को हैं। वह लोक मंगल के लिये अपना तन-मन-धन तथा सर्वस्व समर्पित करने वाले एक आदर्श पुरूष थे। उन्होने देश सेवा के लिये अपना घर परिवार, धन दौलत मन बुद्वि सब कुछ समर्पित कर दिया था उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था, राष्ट्र सेवा करने के उद्देश्य से दूसरी शादी नहीं की, यघपि उस समय उनकी आयु 20 वर्ष थी उनकी जो एक मात्र संतान थी वह भी वाल्य काल में ही कालग्रस्त हो गई, उन्होने अपने नाम से न तो एक भी भौतिक वस्तु संग्रहित की और न एक पैसा कमाया, वे त्याग परोपकार और अपरिग्रह की जीती जागती मूर्ति थे। पंडित जी ने अपने पौरूष से बाम्बे में अन्तराष्ट्रीय ख्याति की अंग्रेजी में रूरल इंडिया मासिक पत्रिका निकाली थी और देश के चोटी के अंग्रेजी विद्वानो ने उसमे अपना योगदान दिया। उन्होने बोम्बे से चन्दा एकत्र करके राष्ट्रीय शिक्षा हेतु आत्म निर्भर विघालय चलाया था। जिसमें राष्ट्र प्रेमी बालक शिक्षा पाकर देश सेवा का मंत्र लेते थे जीवन में सदगुणी बनते थे, त्याग, कष्ट, सहिष्णुता, आत्मनिर्भता का पाठ पढ़ते थे। बालको में विद्यालय से राष्ट्रीय चरित्र ढल रहा था। पंडित जी ने भारत के नागरिको को भारतीयता के प्रति जागरूक कर ब्रिटिश सत्ता के विरू़द्व राष्ट्रीयता का शंखनाथ किया था। पंडित जी परतंत्र और स्वतंत्र भारत के नेताओं के भी पूज्य रहे थे। पंडित जी के पढ़ाए हुऐ शिष्य भारत सरकार मंे अच्छी सेवाओं मे हैं। मध्यप्रदेश में रामराज्य स्थापित करने और उसकी राजधानी पोहरी रखने हेतु संकल्प में योगी की भॉंति ध्यान मग्न रहा करते थे। पंडित जी का रहन-सहन सादगी में उच्च कोटि का होता था, उनकी पोशाक शुद्व खादी की दिन में दो तीन बार बदली जाती थी उनके लोढ़ की खोली भी नित्य बदली जाती थी, भोजन शुद्व शाकाहार सरस सुस्वाद पाचक और पौष्टिक होता था। पंडित जी का चाय का समय निर्धारित था, सारे काम निर्धारित समय पर होते थे। पंडित जी का बल इस बात पर रहता था कि कार्य करने की क्षमता अर्जित की जाये और कार्य पूर्ण क्षमता से किया जाये, कार्य समय पर किया जाए और वचन सोच विचार कर देना चाहिए। दिये गए वचन को प्राणपन से पूर्ण करना चाहिये दूसरों को दिये गए समय का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए।

पुराणिक जी का जन्म 9 जुलाई सन 1900 को पोहरी जिला शिवपुरी मध्यप्रदेश के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था पुराणिक जी का परिवार अपने पंडित्य ज्योतिषशास्त्र के ज्ञान और पौराणिक कर्मकाण्ड के लिये प्रसिद्व था उनके घर में अनेक हस्त लिखित संस्कृत के ग्रन्थ थे प्राचीन गुरूकुल में शिष्य उनके यहांॅ विद्या उपार्जन कर दीक्षित होते थे यह उनके घर की परंपरा थी जिसमें विद्यार्थी अध्ययन के साथ साथ काम करते हुऐ विद्याध्ययन करते थे और नामी पंडित बनते थे। पंडित जी के पिता का निधन बहुत छोटी अवस्था में हो गया था। उनके पितामह का निधन जब वह 7 वर्ष के थे तब हो गया था पितामह ने अपने पोते को अच्छे संस्कार देकर संस्कृत का अच्छा अभ्यास कराकर पंडिताई की क्रियाओ का भी ज्ञान दे दिया था। आज भी उनके घर के प्रांगण में विद्यार्थीयों द्वारा निर्मित एक कुआ है। उनके घर में शुद्वता का इतना ध्यान रखा जाता था कि उनके भोजन गृह में लकड़ी भी धुलकर जाती थी। पंडित जी किसी स्कूल या कॉलेज में नियमित रूप से नहीं पढे़ और न कोई डिग्री प्राप्त की, फिर भी उच्च कोटी की अंग्रेजी और हिन्दी का ज्ञान उन्होने अपने कठोर श्रम से ज्ञान पिपासा के कारण रात दिन के स्वाध्याय से किया। पुराणिक जी जब 18 वर्ष के हुए तब पोहरी के स्थानीय स्कूल में अंग्रेजी के शिक्षक के पद पर उनकी नियुक्ति हो गई, उस समय उन्हें जो वेतन मिलता था उसका एक भाग वह अपने गरीब शिष्यों के लिये पुस्तकें क्रय करने आदि में लगा देते थें। लोगों को बाहरी गतिविधियों से परिचित कराने और उन में जागृति पैदा करने की दृष्टि से पोहरी में पंडितजी ने एक 'मित्र वाचनालय' खोला उसके लिए पुस्तके और पत्रिकायें मंगाई। व्यापारिक स्तर को ऊंचा उठाने, लोगों में खुशहाली के लिए उन्होनें एक 'मित्र मंडल' खोला था, इन दोनों प्रवृत्तियों में पुराणिक जी ने अपने स्वंय के जेवर बेचकर धन लगाया था।

कविवर रविन्द्र नाथ टैंगौर को जब भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा डॉक्टेªट की पद्वी से विभूषित करने के लिए शांति निकेतन में समारोह हुआ तो पद्वी देते समय 'लेटिन' भाषा में भाषण पढ़ा गया, रवीन्द्र नाथ टैगोर ने उसका उत्तर संस्कृत में दिया तब पंडित जी को संस्कृत की महत्ता समझ में आई जब कविवर रविन्द्रनाथ टैगोर का निधन हुआ तो उनकी स्मृति में रूरल इंडिया पत्रिका में उन्होंने संस्कृत में श्लोक लिखे जिनको संस्कृत के विद्वानों द्वारा सराहा गया था।

पुराणिक जी ने ग्राम सभाओं के माध्यम से सामाजिक कुरीतिओं, बाल विवाह प्रथा, शादियो व मृत्यु भोज पर अतिशय खर्च करने की प्रथा आदि, पंडित जी ने इन प्रथाओं को रोका। पुराणिक जी ने अपनी पूज्य भानजी विद्यावती का डॉ. हरिहर निवास द्विवेदी से विवाह पोहरी में कराया था, जिसमें कोई बारात नहीं आई, केवल दूल्हा, उनके नानाजी और दो चार अन्य व्यक्ति आए, कोई भोज नहीं दिया गया विवाह वैदिक रीति से संपन्न हुआ जो कुछ ही घंटो मे समाप्त हो गया था, उन्होनें एक विधवा का विवाह भी सादगी से कराया था। पंडित जी ने अपने शिष्य श्री राम गोपाल गुप्त का भी विवाह उज्जैन में 1936 में कराया था, बारात में मित्र अपने व्यय से पहुॅचे इसमें कोई दहेज व भोज नहीं दिया गया था।

पुराणिक जी नागपुर में अखिल भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस के अधिवेशन में भाग लेने गए उसमें कलकत्ता के अधिवेशन में पारित स्वराज्य प्राप्ति के लिए ब्रिटिश शासन के विरूद्व देश में सविनय असहयोग आन्दोलन छेड़ने के प्रस्ताव का समर्थन किया गया उसके अनुसार विधान सभाओं न्यायालयों शासकीय सेवाओं आदि को बहिष्कार करने के साथ शासकीय स्कूलों और कॉलेजो का बहिष्कार करना और उनके स्थान पर राष्ट्रीय विद्यापीठों को स्थापित करना भी सत्याग्रह आन्दोलन का एक अंग था। गॉधीजी की प्रेरणा से देश में अनेक राष्ट्रीय विद्यापीठों की स्थापना की गई। पुराणिक जी ने पोहरी में आदर्श विद्यालय को राष्ट्रीय विद्यापीठ के रूप में संचालित किया। आदर्श विद्यालय द्वारा शिक्षित स्थानीय तेजस्वी बालकों को हाईस्कूल की परीक्षा दिलाने के बाद उन्हें अपनी ओर से आर्थिक सहायता देकर उच्च शिक्षा व ग्राम उद्योगों की ट्रेनिंग दिलाकर आदर्श विद्यालय के कार्य को संभालने योग्य बना दिया। पुराणिक जी के पास अब आदर्श विद्यालय में शिक्षित और बाहर उच्च शिक्षा दिलायें, स्वयं के कार्यकर्ता तैयार हो गए थे इसलिए गोपाल कृष्ण गोखले जी के भारत सेवक समाज संगठन की तरह पुराणिक जी ने उसी के संविधान जैसा संविधान बनाकर 12 जनवरी 1921 को आदर्श सेवा संघ का निर्माण किया, इसके आजीवन सदस्य बनाए गए और उन्हें जीवन निर्वाह के लिये उपवेतन दिया गया कोई सदस्य व्यक्तिगत रूप से अलग आय नहीं कर सकता। श्री पुराणिक जी उसके आजीवन अध्यक्ष बने श्री राम गोपाल गुप्त, हरिशंकर द्विवेदी, रत्नलाल दिक्षित, नारायणदास त्रिवेदी, वैदेही चरण पाराशर और दौलतराम पालीवाल आदि उसके आजीवन सदस्य बनाए गए यह लोग संघ के जीवन समर्पणकारी व अभिन्न अंग बने। पुराणिक जी ने आदर्श सेवा संघ के अंतर्गत ''आदर्श विद्यालय'' संचालित रखा। इस विद्यालय में केवल किताबी शिक्षा नहीं दी जाती थी, वरन् विद्यार्थीयों को राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत करने, उन्हें राष्ट्रसेवी नागरिक बनाने, उनमें शारीरिक मानसिक व चारित्रिक, बहुमुखी विकास के गुणों का समावेश किया जाता था। देश भर में गांधीयन अर्थशास्त्र के सर्मथन में बडें उद्योगों के स्थान पर ग्रामीण उद्योगों के विकास पर अधिक बल दिया गया इस हेतु पुराणिक जी ने विद्यार्थीओं का शिक्षण स्वावलंबी पद्वति पर किया जिससे उन्हें नौकरी के लिए दर-दर मारे-मारे न फिरना पडें बल्कि वे कोई न कोई हुनर सीखकर निकले जिससे वे अपना जीवन स्वावलंवी रहकर सम्मान पूर्वक व्यतीत कर सकें। पंडित जी ने विद्यार्थीओं को उनकी रूचि के कोई न कोई हुनर में प्रशिक्षित करने के लिये और ग्रामोद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिये अपने शिष्यों का एक दल बाहर भेजा, खादी उत्पादन का प्रशिक्षण लेने के लिये रतीराम धाकड़ को सावरमती आश्रम में, ललित मोहन महाजन को माचिस बनाने की टेªनिग के लिये सोदपुर आश्रम, कागज बनाना सीखने के लिये परमानन्द पुराणिक को वर्धा भेजा। आदर्श विद्यालय की मुख्य विशेषता उसकी आश्रम पद्वति थी, समस्त विद्यार्थी उनके शिक्षक आश्रम में ही रहते थे। प्रातः 4 बजे उठने से लेकर रात्रि 9 बजे शयन करने तक एक निश्चित दिनचर्या का पालन करना सबको अनिवार्य था। प्रातः उठते ही ईश्वर प्रार्थना की जाती थी और संध्या को भोजनोपरांत प्रार्थना, रामायण पाठ, श्रीमदभगवत गीता के सौलहबें आध्याय का पाठ, प्रवचन का कार्यकम चलता था। सुबह-शाम व्यायाम व खेलों में सभी छात्रों का भाग लेना अनिवार्य था, अपने-अपने कमरों की सफाई विद्यार्थी स्वयं करते थे। एक घण्टे का श्रम सबके लिए अनिवार्य था, बगीचे की देखभाल उसमें पौधे लगाना, पानी देना विद्यार्थी के उत्तरदायित्व का अंग था, पढाई, भोजन, व्यायाम, शयन सभी कुछ निर्धारित समय पर एक साथ किया जाता था, सभी खादी के वस्त्र पहनते थे। इस विद्यालय में छुआ-छूत प्रथा नहीं थी ऊंची तथा नीची जाति के विद्यार्थी साथ पढ़ते तथा साथ भोजन करते थे। सन् 1935 में राज्य की ओर से जिला मुख्यालय शिवपुरी में भी हाईस्कूल नहीं था और न पास के जिला गुना में और भिण्ड जिले में ही एक मात्र हाईस्कूल पोहरी परगने के भटनावर ग्राम में था, वहॉ अग्रेंजी से मिडिल करने के बाद विद्यार्थी को एक वर्ष में ही मेट्रिक पास करा दिया जाता था पहली, दूसरी, तीसरी श्रेणी की कक्षाओं का भेद न कर मिडिल कोर्स की पुस्तकों को पढ़ाना आरम्भ कर दिया जाता था और मिडिल परीक्षा में प्रवेश दिला दिया जाता था। पोहरी उस समय शिक्षा का केन्द्र था, भारत के कोनें-कोनें से बुद्विवादीगण अपने-अपने बालको को पोहरी भेजते थे। शिक्षकों का व्यवहार बालकों के साथ महत्वपूर्ण बडे़ भाई के समान था और वे भ्राता जी कहलाना पसंद करते थे। प्रत्येक बालक के व्यक्तित्व का स्वतंत्र विकास होने के लिये बालक के नाम के आगे जी लगाकर सम्बोधित किया जाता था। पंडित जी कहते थे कि विद्यार्थी अपने जीवन का उच्च से उच्च लक्ष्य निर्धारित करे और उसका निरंतर ध्यान रखते हुए परिश्रम करे तो जो चाहे सो बन सकता हैं, केवल दृढ़-संकल्प होना चाहिए। पुराणिक जी ने आदर्श विद्यालय में संस्कृत पढ़ाने के लिए एक ऐसे शास्त्री की नियुक्ति की थी जो विघालय की संध्याकालीन प्रार्थना मे नित्य प्रति संस्कृत में प्रवचन करते थे जिससे संस्कृत बोलने व समझने के लिए अनुकूल वातावरण बन सके। आदर्श विद्यालय के पुस्तकालय में जो श्रेष्ठतम अंग्रेजी और हिन्दी की विभन्न विषयो की विशेष रूप से राजनीति, शिक्षा, साहित्य, ग्राम सुधार, महान पुरूषों की जीवनियॉ आदि सभी पुस्तकों को उन्होने पढा़ था, वह अग्रेंजी व हिन्दी की उनकी प्रिय पत्रिकाओं को भी पढ़ते थें।

सन् 1930 में पुराणिक जी सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लेने दिल्ली के समीप नरेला ग्राम पहुंचे थे, इस ग्राम में भाषण देने पर उन्हें सरकार ने बन्दी बना लिया था, और उन्हें बी क्लास जेल में रखकर उन पर मुकद्मा चलाया था। खास ग्वालियर में ''ग्वालियर राज्य सेवा संघ'' जिसके अध्यक्ष श्री पुराणिक जी तथा मंत्री श्री रूद्र दत्त गुप्त थे, कार्यकारिणी के सदस्य साहित्यकार श्री जगन्नाथ प्रसाद मिलिंद, साहित्यकार श्री हरिहर निवास द्विवेदी, श्री श्याम लाल पांडवीय आदि थे। ग्वालियर राज्य सेवा संघ की नियमित बैठकें होती थी, लोगों में राष्ट्रीय भावनाऐं लाने के लिए एक साथ बैठकर योजनाएं बनाते थे, वह ग्वालियर राज्य सेवा संघ के माधयम से राज्य में राजनीतिक चेतना जागृत करने का प्रयत्न करने लगे, इसी ग्वालियर राज्य सेवा संघ के तत्वावधान में सन् 1938 में झॉसी की रानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथी महोत्सव ग्वालियर में मनाया गया था। उसमे मुख्य अतिथि के रूप मंे क्रांतिकारी वीर सावरकर आए थे, जिसमें खुल कर राजनीतिक चर्चा की गई। श्री पुराणिक जी ग्वालियर राज्य सेवा संघ के माध्यम से लोगों को ग्वालियर राज्य में उत्तरदायी शासन स्थापित करने के लिए तैयार करने लगे। महाराज जीवाजीराव सिंधिया पुराणिक जी को ग्वालियर राज्य के मंत्री मंडल में लेना चाहते थे, लेकिन पुराणिक जी पद और सत्ता ग्रहण करने के विपक्षी थे, इसलिए उन्होनें ग्वालियर राज्य के मंत्री मंण्डल में मंत्री का पद ग्रहण करने से नम्रता पूर्वक इंकार कर दिया था।

पुराणिक जी पोहरी क्षेत्र के विकास के लिए यहॉ की शिक्षा में कृषि, पशुपालन और ग्राम उद्योगों के प्रशिक्षण को अनिवार्य मानते थे, अतः वे एक ऐसा विश्वविद्यालय स्थापित करना चहाते थे, जहॉ इन विषयों के उच्च से उच्च सैद्वान्तिक तथा व्यवहारिक शिक्षा के साथ अनुसंधान और प्रयोग करने की समुचित व्यवस्था हो। सन् 1931 से पोहरी जागीर के विभिन्न ग्राम समूहों में ग्राम सुधार केन्द्र खोलकर उनके सर्वांगीण विकास का कार्य किया जा रहा था धीरे धीरे वह बढ़कर ग्वालियर तक पहुॅच गया था। सन् 1938 से बम्बई से रूरल इंडिया नाम की मासिक पत्रिका अंग्रेजी में ग्राम सुधार विषय पर प्रकाशित की जा रही थी। जिससे पूरे देश में चल रहे ग्राम विकास के कार्यो व प्रयोगों में निकट का सम्बंध स्थापित हो गया था। पुराणिक जी ने खादी तथा ग्रामोद्योगों को पुनर्जीवित करने के लिए प्रशिक्षण हेतु भेजे गए कार्यकर्ताओं द्वारा प्रशिक्षण प्राप्त करके वापिस आने पर खादी तथा ग्रामोद्योगों के प्रचार-प्रसार के लिए पोहरी में कला मंदिर की स्थापना की गई। आदर्श सेवा संघ ने 1 जनवरी 1944 से ग्राम विश्वविद्यालय स्थापित करने का लक्ष्य बनाकर कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण हेतु पोहरी में संघ के मुख्यालय पर ''ग्राम कार्यकर्ता प्रशिक्षण केन्द्र'' चलाने का निश्चय किया था, जो ग्राम विश्वविद्यालय स्थापित करने का प्रारम्भ था। रूरल इंडिया के माध्यम से प्रचार कर तथा पत्र लिखकर देश के सभी प्रांतो से प्रशिक्षण हेतु कार्यकर्ता बुलाये गए प्रथम चरण में दो मास का प्रशिक्षण रखा गया, बाद में पहले छह मास का और पीछे एक वर्ष का कर दिया गया, प्रशिक्षण वैज्ञानिक और उन्नत कृषि पद्वति, पशु नस्ल सुधार, ग्रह उद्योगों का विकास, ग्राम शिक्षा, कताई बुनाई, कागज बनाना, माचिस बनाना और मधुमक्खी पालन आदि के सम्बंध में था, प्रशिक्षाणार्थी भारत के अनेक प्रांतो से आए जैसे असम और बिहार से, मैसूर और गुजरात से, समीप के राजस्थान और उत्तरप्रदेश से।

स्वंतत्रता प्राप्ति के बाद अन्न की कमी की समस्या बढ़ गई थी, बाहर से आयात कर अन्नपूर्ति की जाती थी। आदर्श सेवा संघ के उद्योग से दस वर्ष में सन् 1938 से 1948 तक खाद्यान अभाव देवरी ग्राम सुधार केन्द्र की उत्पादन शक्ति 126 प्रतिशत बढ़ गई भारत सरकार इस से बहुत प्रभावित हुई। पुराणिक जी ने अन्नोत्पादन बढ़ाने के लिए रूरल इंडिया में लेख प्रकाशित कर राष्ट्रीय स्तर पर समस्या पर विचार करने तथा हल निकालने कि दृष्टि से पोहरी में आदर्श सेवा संघ के मुख्यालय पर एक अखिल भरतीय अन्नोत्पादन परिषद करने का विचार रखा, अनेक विचारशील व्यक्तियों ने इसका सर्मथन किया और अन्त में सन् 1949 के अप्रैल मास में परिषद बुलाने का निश्चय किया गया। परिषद की अध्यक्षता के लिए तत्कालीन कृषि मंत्री श्री जयराम दौलतराम दास से निवेदन किया गया, उन्होनें इसकी स्वीकृति दे दी, प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने भी परिषद के उद्घाटन करने की स्वीकृति प्रदान कर दी थी और परिषद कि तिथि 12 तथा 13 अप्रैल निश्चित की गई थी, परिषद के साथ एक बड़ी कृषि प्रदार्शिनी करने का विचार किया गया। उसके लिए कृषि उत्पादन के नमूने देश के विभिन्न भागों के अनुसंधान केन्द्रो और विश्वविद्यालयों से मंगाये गए, परिषद की प्रायः सभी तैयारियॉ हो गई, ऐन मौके पर प्रधानमंत्री की ओर से सूचना आई कि वे परिषद का उद्घाटन करने नहीं आ सकंेगे, इसलिये पुराणिक जी के कृषि पालन और ग्रामोद्योगों की उच्चतम शिक्षा के साथ कृषि अनुसंधान का स्वावलम्वी विश्वविद्यालय का पोहरी में होने का स्वप्न पूरा नहीं हो सका,

सन् 1949 में जब राजनीतिक कुचक्रों से प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू न आ सके थे, तो पुराणिक जी को जबरदस्त धक्का लगा था, राजनीति क्षेत्र में त्यागपूर्ण और निस्वार्थ सेवा करने वालों की कमी देखकर वह श्री किदवई व श्री कृपलानी, द्वारा संगाठित किसान मजदूर प्रजा पार्टी में कार्य करने के लिए उद्यत हुए, किन्तु आगे चलकर वह दल समाजवादी पार्टी में विलीन हो गया तो उससे भी अलग हुए फिर श्री राजगोपालाचारी द्वारा संचालित स्वतंत्र पार्टी को भी टटोला, इसमें भी पद तथा सत्ता से प्रेम करने वाले लोग थे, इसलिए वह आदर्श सेवा संघ के माध्यम से ही रचनात्मक कार्य करने में लगे रहे। पुराणिक जी ग्रामों में शत प्रतिशत साक्षरता लाना चाहते थे, अतः पाठशालाओं के साथ उन्होनें आदर्श विद्यालय में शिक्षित और बाहर उच्च शिक्षा दिलाए स्वंय के कार्यकर्ताओं व शिक्षको से प्रौढ़ स्त्री और पुरूषों को पढ़ाने के लिये प्रौढ़ शिक्षा वर्ग भी चलवाये पुराणिक जी ने ग्रामों में अधिक स्कूल खोलने की व्यवस्था की थी ताकि ऐसा कोई ग्राम न रहे जिसके समीप में स्कूल न हो शिक्षा के अतिरिक्त खादी बनाना, हाथ का कागज बनाना, माचिस बनाना आदि कुटीर उद्योग भी संघ ने आरंम्भ कर दिये थे सन् 1931 में पुराणिक जी ने कृष्णगंज बस्ती की स्थापना की तथा आदर्श सेवा संघ की स्वंय की कृष्णगंज कॉलोनी, कुटीर उद्योगों का ग्राम कला मंदिर, विद्यालय भवन, छात्रावास, अध्यापकों के निवास गृह निर्मित होकर कृषि महाविद्यालय का भवन भी बनाया था। पुराणिक जी के सभी कार्यो में भूतपूर्व पोहरी जागीर के स्वामी श्रीमंत राज राजेन्द्र सरदार एम.एन. शीतौले साहब का तन, मन, धन से योगदान रहा था, श्रीमन्त ने कई लाख रूपये देकर संघ के लिए विशाल भवन बनवाये एवं 301 बीघा भूमि देकर लक्ष्मी ग्राम सेवा ट्रस्ट की स्थापना की जिसकी समूची आय संघ के उपयोग को थी। श्री शीतौले साहब की पत्नी ने अपने स्वयं के पास से रूपया देकर 4 लाख के उपर के मूल्य का लक्ष्मी सरस्वती गोपाल कृष्ण महाविद्यालय के भवन का निर्माण कराया था। पोहरी में सन् 1970 से लक्ष्मी सरस्वती गोपाल कृष्ण महाविद्यालय चल रहा हैं।

पुराणिक जी ने जनहित में निस्वार्थ देश सेवा के लिये सब कुछ समर्पित कर दिया था, इसलिए सभी लोग उनको शत्-शत् नमन व वंदन करते हैं तथा उनके श्री चरणों मे श्रृद्वा के सुमन अर्पित करते हैं, उनके शिष्य, परिजन, उत्तराधिकारी व अन्य लोग उनकी लोकमंगल के लिये निस्वार्थ देश सेवा के उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प ले तथा उन जैसा साधक बनने का प्रयास करें।


Updated : 10 July 2022 1:57 PM GMT

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