‘मनरेगा’ बनाम ‘विकसित भारत जी राम जी’

‘मनरेगा’ बनाम ‘विकसित भारत जी राम जी’
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मेजर सरस त्रिपाठी

विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण), यानी ‘VB-G RAM G’, ग्रामीण रोजगार और आजीविका सुरक्षा के क्षेत्र में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर है। यह योजना केवल मजदूरी उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि टिकाऊ आजीविका, परिसंपत्ति निर्माण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण का मार्ग खोलती है। विपक्ष के विरोध के बावजूद संसद ने इस बिल को पारित कर दिया है। आलोचकों का मानना है कि यह बदलाव अधिकार-आधारित सुरक्षा को कमजोर कर सकता है। पुराने ‘मनरेगा’ और नए ‘VB-G RAM G’ में क्या सचमुच आमूलचूल परिवर्तन हुआ है? यदि हाँ, तो कितना सकारात्मक और कितना नकारात्मक?

सर्वप्रथम, प्रस्तावित ढांचे में वार्षिक रोजगार के दिनों की संख्या बढ़ाई गई है। इससे ग्रामीण परिवारों को अधिक आय-सुरक्षा मिल सकती है और मौसमी बेरोजगारी के प्रभाव कम हो सकते हैं। विशेषकर उन जिलों में, जहाँ कृषि के अलावा विकल्प सीमित हैं, यह वृद्धि सहायक मानी जाती है। पहले मात्र 100 कार्य-दिवसों की गारंटी थी, अब नए स्वरूप में 125 दिनों की गारंटी दी गई है।

दूसरी बात यह है कि VB-G RAM G एक आजीविका-केंद्रित योजना है। यह मजदूरी और आजीविका को जोड़ती है.अर्थात केवल अस्थायी काम नहीं, बल्कि ऐसे कार्य जिनसे दीर्घकालिक लाभ हों, जैसे जल-संरक्षण, ग्रामीण सड़क निर्माण, सामुदायिक परिसंपत्तियों का निर्माण, कृषि-सहायक ढांचे का विकास इत्यादि। इस प्रकार की व्यवस्था से स्थानीय अर्थव्यवस्था में चहुँगुणक (multiplier) प्रभाव पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है।

तीसरे, नवीन योजना में परिसंपत्ति निर्माण और गुणवत्ता पर विशेष जोर दिया गया है। नई संरचना में कार्यों की गुणवत्ता, टिकाऊपन और परिणामों के आकलन पर अधिक ध्यान देने की बात कही गई है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो अधूरी परिसंपत्तियों और दोहराव वाले कार्यों की समस्या कम हो सकती है।

चौथी बात यह है कि नवीन योजना में केंद्र और राज्य समन्वय को अधिक प्रभावी बनाया गया है। योजना को साझा वित्तीय उत्तरदायित्व के साथ लागू करने का तर्क यह है कि राज्यों की भागीदारी बढ़ेगी, स्थानीय प्राथमिकताओं के अनुरूप कार्य चुने जा सकेंगे और निगरानी में सुधार होगा। यह ‘सहकारी संघवाद’ की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

पाँचवीं महत्वपूर्ण बात यह है कि नवीन योजना में कृषि-मौसम के साथ तालमेल बनाए रखने पर जोर दिया गया है, ताकि कृषि सीजन के दौरान काम का प्रबंधन इस तरह हो कि खेतिहर श्रम की उपलब्धता बनी रहे। इससे कृषि उत्पादन प्रभावित हुए बिना गैर-कृषि कार्यों का संतुलन साधा जा सकता है।

प्रमुख आलोचनाएं और चिंताएं

आलोचकों का प्रमुख तर्क यह है कि नवीन योजना में अधिकार-आधारित गारंटी समाप्त कर दी गई है। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि पहले की व्यवस्था मांग-आधारित कानूनी अधिकार पर टिकी थी, जहाँ काम मांगने पर रोजगार उपलब्ध कराना दायित्व था। नए ढांचे में, आलोचकों के अनुसार, प्रशासनिक विवेक और योजना-डिज़ाइन की भूमिका बढ़ जाती है, जिससे वास्तविक ‘गारंटी’ कमजोर पड़ सकती है। इसमें सरकारी तंत्र को स्वविवेक से निर्णय लेने का अधिकार दिया गया है, जो गारंटी की भावना को कमजोर करता है।

दूसरी आलोचना यह है कि नवीन योजना में केंद्रीकरण बढ़ रहा है और स्थानीय स्वायत्तता कम हो रही है। उनका मानना है कि नए तंत्र में निर्णय प्रक्रिया अधिक केंद्रीकृत हो सकती है। यदि कार्य-चयन और स्वीकृति में स्थानीय पंचायतों की भूमिका सीमित हुई, तो जमीनी जरूरतों से कटाव का जोखिम रहेगा। हालांकि, यह भी तर्क दिया जाता है कि ऐसा उन शिकायतों के समाधान के लिए आवश्यक था, जहाँ पंचायतों पर कार्य आवंटन में भेदभाव के आरोप लगते रहे हैं।

साझा वित्तपोषण मॉडल का विरोध इस आधार पर भी किया जाता है कि आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों के लिए अतिरिक्त बोझ उठाना कठिन हो सकता है। यदि राज्य समय पर अपना अंशदान न दे पाएँ, तो कार्य रुकने और भुगतान में देरी की आशंका रहती है। परंतु यदि केंद्र सरकार संवेदनशील और कार्यशील हो, तो ऐसी स्थिति नहीं बनती। वर्तमान सरकार ने जीएसटी अंशदान में पारदर्शिता और राज्यों के हिस्से का समयबद्ध भुगतान कर यह साबित भी किया है।

मजदूरी भुगतान और पारदर्शिता से जुड़े मुद्दों पर भी आपत्तियाँ उठाई गई हैं। भुगतान में देरी, तकनीकी सत्यापन और डिजिटल निर्भरता पहले से ही चिंता के विषय रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि नई व्यवस्था में यदि अनुपालन और ऑडिट प्रक्रिया जटिल हुई, तो इसका सबसे अधिक असर मजदूरों पर पड़ेगा। हालांकि, सही अर्थों में ये सभी आलोचनाएँ अधिकतर प्रतीकात्मक और वैचारिक ही हैं।

कुछ दल और संगठन योजना के नामकरण को लेकर भी विरोध जता रहे हैं। उन्हें महात्मा गांधी के नाम को हटाए जाने पर आपत्ति है और वे इसे ‘विरासत’ के प्रश्न से जोड़ते हैं। उनका तर्क है कि प्रतीक केवल नाम नहीं होते, वे अधिकार-आधारित सोच और सामाजिक अनुबंध को दर्शाते हैं, जिन्हें कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। इस आलोचना का उत्तर तो प्रश्न में ही निहित है. यदि महात्मा गांधी हमारे राष्ट्रनायक हैं, तो ‘राम जी’ स्वयं महात्मा गांधी के आदर्श और प्रेरणा रहे हैं।

VB-G RAM G ग्रामीण भारत के लिए अवसर और जोखिम दोनों लेकर आता है। यदि इसे अधिकार-केंद्रित सुरक्षा, स्थानीय स्वायत्तता और वित्तीय अनुशासन के साथ लागू किया जाए, तो यह ग्रामीण आजीविका को नई दिशा दे सकता है। परंतु इन संतुलनों के अभाव में आशंकाएँ वास्तविक चुनौतियों में बदल सकती हैं। सफलता का पैमाना अंततः कागजी दावे नहीं, बल्कि मजदूर के हाथ में समय पर मिला काम और भुगतान होगा जिसका निर्णय भविष्य करेगा।

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