बलिदान दिवस आज: संगीत, स्वराज और बापू

सच्चे कर्मयोगियों ने कभी भी अपनी साधना और तपस्या का लेखा-जोखा नहीं रखा, लेकिन वक्त के सफ़हों पर उनके किए और कहे का हिसाब हमेशा दर्ज रहा। जन्म और मरण की तारीखों से परे उनका चिंतन आने वाली नस्लों की रूहों में नई चमक लिए कायम रहता है। स्वाधीनता के शिल्पी मोहनदास गांधी भी 30 जनवरी की रस्मी यादों से निकलकर एक शाश्वत आवाज़ में तब्दील हो चुके महात्मा हैं।
जिक्र उनकी शख्सियत के उस अनचिन्हे पहलू का है, जो शब्द और संगीत की आपसदारी में स्वराज के लिए आध्यात्मिक शक्ति की तलाश करता रहा। अनचाही त्रासदी और बेचैनियों के इस दौर में बापू का यह प्रयोग एक बार फिर हमारी आत्मा के तारों को झंकृत कर सकता है।
दरअसल, संगीत की शक्ति पर बापू को अटूट भरोसा था। वे संगीत को कामधेनु कहते थे। उनका मानना था कि अमन, एकता और आपसदारी का सच्चा और सनातन संदेश सात सुरों की सोहबत में बड़ी सहजता से हासिल किया जा सकता है, और इसके लिए संगीत का संत साहित्य से रिश्ता जोड़ा जाना जरूरी है।
गांधीजी की प्रार्थना सभाओं और प्रभात फेरियों में सुबह-शाम सामूहिक रूप से भक्ति संगीत गाया जाता था। ये वे भक्ति पद थे जिनका इस्तेमाल स्वाधीनता आंदोलन के दौरान शांति, समरसता, शुचिता और आंतरिक मनोबल बनाए रखने के लिए उन्होंने किया।
1904 में हिन्दुस्तानी संगीत के आधुनिक पुरोधा पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने महात्मा गांधी के स्वदेशी आन्दोलन में भाग लिया और कई सभाओं में उन्होंने रामधुन 'रघुपति राघव राजा राम' गाकर लोक की आत्मा में शक्ति और स्वाभिमान का आलोक बिखेरा।
1915 में जब बापू ने अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना की, तो उन्होंने पलुस्करजी से निवेदन किया कि वे किसी कुशल शिष्य को आश्रम में रहकर प्रार्थना सभाओं के लिए सरल-सहज धुनें तैयार करने का कार्य सौंपें। तब नारायण मोरेश्वर खरे नामक एक शिष्य ने चार सौ भजनों को संगीतबद्ध किया, जिसे बाद में राग-ताल विवरण सहित अहमदाबाद के नवजीवन प्रकाशन मंदिर ने 'आश्रम भजनावली' में प्रकाशित किया।
इसी लघु पुस्तिका में संग्रहित भक्त नरसिंह का भजन 'वैष्णवजन तो तेणे कहिए' बापू को सर्वाधिक प्रिय था, जो बाद में 'दांडी यात्रा' सहित गांधीजी के अनेक प्रवासों में प्रार्थना संगीत की अनिवार्य और कालजयी रचना साबित हुआ। बहुत कम लोग जानते हैं कि महात्मा गांधी भारतरत्न से सम्मानित प्रख्यात गायिका सुब्बलक्ष्मी से अपना प्रिय भजन 'हरि तुम हरो जन की पीर' सुनना चाहते थे।
सन् 1947 में मुंबई में प्रार्थना सभा में जब उनके आग्रह पर सुब्बलक्ष्मी ने 'रामधुन' सुनाई, तो सरोजिनी नायडू ने अपनी 'भारत कोकिला' उपाधि उन्हें प्रदान की थी। गांधी का परिवेश रामधुन से प्रेरित था। रामधुन का अर्थ अपने आप पर विश्वास का भाव लिए होना था। रोज़ की प्रार्थना एक जरूरी कार्य था। भाषा से परे भाव में लीन हो जाने की विधि, जहां सच्चे 'वैष्णवजन' की तरह पराई पीड़ा को अनुभव करने की अंतःप्रेरणा जाग उठे।
गांधीजी कलाकारों का बहुत सम्मान करते थे, किंतु वे कला में आध्यात्मिक ऊंचाइयों और गहन आस्था को देखना चाहते थे। उन्हें अपनी तस्वीरें खिंचवाना अधिक पसंद नहीं था, फिर भी चित्रकारों द्वारा बनाई गई कलाकृति पर तारीख सहित अपने हस्ताक्षर करने के बाद वे संदेश लिखते थे, जैसे 'Tooth is God'।
बापू के लिए ईश्वर, सत्य और सुंदरता परस्पर आश्रित रहे। उनके अनुसार जब तक किसी भी कला में स्वयं की छाप नहीं होती, उसमें रस नहीं पैदा होता, और सौन्दर्यबोध नहीं जागता। वे कला और कलाकारों के संरक्षक थे। वे कला में विविधता के पक्षधर थे, पर कला में जीवन बोले, आनंद हो और सबके लिए हो यही उनका मत था। कला में मन, आत्मा और शरीर एक होकर प्रकट हों, बापू की यही कामना रही।
