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पर्यावरण संतुलन एवं संरक्षण के लिए समर्पित जीवन

डॉ. आनंद पाटील

पर्यावरण संतुलन एवं संरक्षण के लिए समर्पित जीवन
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वेबडेस्क। भौतिकवाद जनित भोगोपभोग के अतीव लालच ने 'उपभोक्तावादी संस्कृति' को जन्म दिया है। उपभोक्तावाद के कारण मनुष्य ने मोह-माया में लिप्त होकर प्रकृति-पर्यावरण का अतीव दोहन किया है। वह अधिकाधिक भोगने की लालसा-पिपासा में सुकुमार गुण (चरित्र) एवं प्रकृतासक्त सामरस्यपूर्ण जीवन की गुणवत्ता खोकर पर्यावरण को ध्वस्त करने में निमग्न है। ऐसे में, "सुन्दर से नित सुन्दरतर, सुन्दरतर से सुन्दरतम। सुन्दर जीवन का क्रम रे, सुन्दर सुन्दर जग जीवन!" (सुन्दर मृदु-मृदु रज का तन, सुमित्रानंदन पंत, 1932) की भावानुभूति से ओत-प्रोत होना यद्यपि शनैः-शनैः कठिन होता जा रहा है, तथापि चूँकि मनुष्य को ईश्वर की सर्वोत्तम कृति माना गया है, इसलिए ईश्वरीय कृति में उत्कृष्ट मानवों के प्रकृति-पर्यावरण प्रेम, विचार-चिंतन एवं कर्म से सुन्दरतम के संरक्षण की आशाएँ पल्लवित हैं। ऐसे चिंतनशील, कृतसंकल्पित व कर्मशील पर्यावरण-प्रेमी एवं योद्धाओं में श्री दिलीप कुलकर्णी और श्री अरविंद म्हेत्रे का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।

श्री दिलीप कुलकर्णी पर्यावरणविद् हैं और प्रकृति के सानिध्य में ऋषितुल्य जीवन बिता रहे हैं। वे विवेकानंद के 'आत्मज्ञान ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए' विचार से प्रभावित हुए और 1984 में नौकरी छोड़ दी। फिर, स्वामी विवेकानंद केंद्र में दस वर्षों तक पूर्णकालिक काम किया और 'विवेक विचार' पत्रिका का संपादन किया। उन्होंने पर्यावरणीय संकटों को दृष्टिगत रखते हुए प्रकृत स्वानुभूत जीवन जीने के लिए टेल्को कंपनी (पुणे) की नौकरी छोड़ी और रत्नागिरी-महाराष्ट्र में दापोली के निकट कुडावळे ग्राम में पत्नी पूर्णिमा कुलकर्णी के साथ निवास करने चले गए। सामान्यतः लोग शहर-महानगरीय जीवनासक्त होते हैं, किन्तु कुलकर्णी दम्पति ग्राम्य परिवेश में जीवन संस्कार एवं पर्यावरण पुनरुज्जीवन का मार्ग खोज भी रहे हैं और मार्गदर्शन भी कर रहे हैं।

इंजीनियरिंग ज्ञानानुशासन में शिक्षित-दीक्षित कुलकर्णी बताते हैं कि यदि मनुष्य उपभोक्तावादी दृष्टि त्याग कर पर्यावरणानुकूल जीवन शैली का अनुसरण करें, तो प्राकृतिक संहार, पतन (असंतुलन) रोका जा सकता है। उन्होंने पर्यावरण पर लगभग बीस पुस्तकें लिखी हैं। वे प्रकृति के सानिध्य में शिविर लगाते हैं, पर्यावरण संतुलन की मुहिम चलाते हैं और लोगों को प्रशिक्षित करते हैं, पर्यावरण संतुलन पर सतत व्याख्यान देते हैं, अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी के अंतर्संबंध को व्याख्यायित करते हैं। वे बताते हैं कि सभी प्राकृतिक क्रिया-प्रक्रियाएँ एक आवर्तन में चलती हैं, परंतु मानव निरंतर विकास, पक्की इमारतें और स्थायी संरचनाओं का निर्माण कर प्राकृतिक नियमों को बाधित करता है। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर अर्थशास्त्रीय सिद्धांत-प्रयोग से बहुस्तरीय एवं बहु-गुना विकास की अंधी दौड़ में लगा रहता है। वे 'गतिमान संतुलन' पत्रिका के माध्यम से सतत पर्यावरण प्रबोधन करने का महनीय कार्य कर हैं।

21वीं शताब्दी के आरंभ में (2001) उनकी पुस्तक 'वेगळ्या विकासाचे वाटाडे' (शब्दशः 'शाश्वत विकास-पथ के मार्गदर्शक') प्रकाशित हुई। इसमें विज्ञान-प्रौद्योगिकी जनित प्रगति की आलोचना करते हुए उन्होंने लिखा है - "यह आशा करना असंभव है कि इस वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के साथ सबकुछ शुभ एवं शिवमय होगा। क्योंकि यह प्रगति वासना, भोग, लालसा, शोषण एवं विद्वेष पर आधारित है। नई पीढ़ी स्वयं को विज्ञान-प्रौद्योगिकी की भयावह प्रगति के दलदल में पाएगी। असंख्य समस्याएँ हैं, जिनके लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं, और जिनका उनके पास कोई उत्तर भी नहीं है। इसे 'विकास' (प्रगति) नहीं कहा जा सकता। यह अपरिहार्यतः विनाश का मार्ग है।" 1936 में कवि जयशंकर प्रसाद ने संकेत किया ही था – "प्रकृत-शक्ति तुमने यंत्रों से सबकी छीनी! शोषण कर जीवनी बना दी जर्जर झीनी!" (कामायनी)

श्री दिलीप कुलकर्णी प्रकृति के सानिध्य में स्वस्थ-सुखी जीवन के अनगिनत समाधान बताते हैं। वे प्रत्येक सप्ताहांत में लोगों के लिए, विविध समूह तथा संस्थाओं के लिए 'निसर्गयान' शिविरों का आयोजन करते हैं। उनका मानना है कि यदि थोड़ी-सी इच्छाशक्ति एवं लचीलापन हो, तो इस मानव-केंद्रित व्यवस्था से बाहर प्रकृतासक्त एवं सर्व-सार्थक जीवन का मार्ग मिल सकता है।

उनका मानना है कि पर्यावरणानुकूल जीवन जीने के लिए आपको ग्रामवासी बनने की आवश्यकता नहीं है। केवल चार सूत्रों का पालन कर हम पर्यावरणानुकूल जीवन जी सकते हैं - आराम और आवश्यकताओं के बीच अंतर करें, तनाव से बचें, न्यूनतम आवश्यकताएँ रखें। प्रकृति लालसाओं को संतुष्ट नहीं कर सकती ; आवश्यक वस्तुओं का भी कम-से-कम प्रयोग होना चाहिए, यथा : पानी ; किसी भी वस्तु का पूरा उपयोग करें, यथा : कागज। कागज के आगे-पीछे लिखें। ध्यान होना चाहिए कि कागज बनाने के लिए वृक्ष तोड़े गये हैं ; वस्तुओं का पुनर्निर्माण करना चाहिए। कोई भी वस्तु कचरे के रूप में प्रकृति में न जाए।"

विवेकानंद केंद्र, सोलापुर के पर्यावरण कार्यकर्ता श्री वल्लभदास गोयदानी ने लिखा है, "दिलीप कुलकर्णी केवल एक विचारक नहीं हैं। "बोले तैसा चाले त्याची वंदावी पाऊले" उक्ति उन पर शतशः लागू होती है। उन्होंने हजारों लोगों को कागज़ के आगे-पीछे लिखने के संस्कार से संस्कारित किया है। उन्होंने 'गतिमान संतुलन' पत्रिका के माध्यम से कागज के समुचित उपयोग के संबंध में सतत प्रमाणसिद्ध प्रबोधन किया है। वे कृतिशील (सक्रिय) विचारक हैं।"

श्री दिलीप कुलकर्णी का यह कहना भी तर्कसंगत प्रतीत होता है कि "पर्यावरणीय समस्याओं के मूल में मानव निर्मित उपभोक्तावाद है।" यह सच भी है कि अर्थशास्त्र यही कहता है कि माँग बढ़ाइए, आपूर्ति बढ़ेगी। इस विचार ने मनुष्य में लालसा एवं पिपासा उत्पन्न कर दी और उपभोग की संस्कृति ने पैर पसारे हैं। वे कहते हैं कि "यह अत्यधिक उपभोग (अर्थात् खपत) है, इसलिए उत्पादन में वृद्धि हो रही है। यह चक्र सतत बढ़ रहा है।" कहना न होगा कि पर्यावरणीय असंतुलन और प्रदूषण अकारण ही नहीं बढ़ रहा है। इससे बचने के उपाय के संबंध में वे बताते हैं कि "केवल व्यवस्था बदलने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए खपत (उपभोग) कम करनी होगी। उपभोक्तावाद से प्राणघाती प्रतिस्पर्धा, शिक्षा में उतार-चढ़ाव, हड़बड़ी और भागदौड़ बढ़ती है। इससे बचने के लिए हमें जीवन के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है। स्वामी विवेकानंद कहते हैं, उपभोग जीवन का साधन है, साध्य नहीं। इससे व्यक्ति को आंतरिक एवं बाहरी, दोनों तरह से क्षति होती है। इससे उत्तम कार्य है, साधारण जीवन शैली अपनाना। पर्यावरणीय असंतुलन कम करने के लिए खपत और क्रमशः उत्पादन कम करना होगा। चूँकि लोग इस पर विचार नहीं कर रहे हैं, इसलिए नित दिन नवीन समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। लोग कितनी अनावश्यक चीजें संग्रह करते हैं... अलमारी भर कपड़े वर्षों तक वैसे ही पड़े रहते हैं। वैसे ही, चप्पल और जूतें भी। हम अनावश्यक रूप से फर्नीचर का भंडारण भी करते हैं। इसके चलते सतत समस्याएँ बढ़ रही हैं।" यह मिथ्या मोह-माया का द्योतक है और प्रकृति की दृष्टि से घातक।

पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से उन्होंने सद्विचारपरक चिंतन-सृजन का कार्य किया है। उनकी उल्लेखनीय पुस्तकें हैं – सैफ्रन थिंकिंग ग्रीन लिविंग, वेगळ्या विकासाचे वाटाडे, अणुविवेक, ग्रीन मेसेजेस, दैनंदिन पर्यावरण, निसर्गायण, पर्यावरण जागृती, विकासस्वप्न, वैदिक गणित, सम्यक विचार, हरितसंदेश, हसरे पर्यावरण (बालसाहित्य) इत्यादि।

स्मरणीय है कि लेखक ने अपनी 30 पृष्ठों की लघु-पुस्तिका 'सैफ्रन थिंकिंग ग्रीन लिविंग' में हरित (प्रकृतिस्थ) जीवन संबंधी हिंदू दर्शन को रेखांकित किया है। हिंदू दर्शन में प्रकृतिस्थ जीवन अंतर्निहित है। यह आवश्यक का भी अल्प-भोग सिखाता है। सृष्टि में उपलब्ध सबकुछ का दोहन नहीं सिखाता। प्रकृति के सभी स्रोतों की पूजा एवं प्रार्थना करना सिखाता है। यह अरण्य संस्कृति का परिचायक है। लेखक के जीवन-दर्शन एवं कृतिशीलता को देखते हुए कालिदास की शकुंतला का सहज स्मरण हो आता है।

Updated : 2022-07-14T12:58:50+05:30
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स्वदेश वेब डेस्क

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