‘विश्व व्यवस्था’ नहीं, शक्ति के खेल में भारत की राह

हर कुछ दशकों में, जब वैश्विक अस्थिरता बढ़ती है, तब एक परिचित शब्द सुनाई देने लगता है विश्व व्यवस्था (वर्ल्ड ऑर्डर)। हालिया दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कुछ तल्ख बयानों और हैरानी भरे कदमों के बाद यह शब्दावली फिर चर्चा में है। अब इसे ‘नई विश्व व्यवस्था’ के रूप में पेश किया जा रहा है। लेकिन इतिहास साक्षी है कि ऐसी कोई स्थायी वैश्विक व्यवस्था कभी नहीं रही। न पहले इसका कोई वजूद था, न आज है और न ही यह निकट भविष्य में बनने वाली है। यह विचार सुनने में भले आकर्षक लगे, लेकिन वास्तविक शक्ति-संतुलन की कठोर सच्चाइयों से दूर एक कोरी कल्पना है।
असल दुनिया में हमेशा एक ही बात का वजन रहा हैशक्तिशाली का कमजोर पर प्रभुत्व। इसे अक्सर कानून, नैतिकता, सभ्यता और मानवाधिकार की ओट में ढक दिया जाता है।
बीते 20 जनवरी को ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच पर एआई-निर्मित एक विवादित तस्वीर साझा की। उसमें उन्होंने कनाडा, ग्रीनलैंड और वेनेजुएला को अमेरिकी क्षेत्र के रूप में दिखाया। यह तस्वीर अमेरिकी राष्ट्रपति के कार्यालय की पृष्ठभूमि में थी, जिसमें शीर्ष यूरोपीय नेता भी मौजूद थे। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा यह पोस्ट कोई शरारत भरी हरकत नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक सोचा-समझा और गूढ़ राजनीतिक संदेश था।
इससे कुछ दिन पहले, 8 जनवरी को ट्रंप ने ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ को दिए साक्षात्कार में कहा था “मुझे किसी अंतरराष्ट्रीय कानून की जरूरत नहीं, मेरी शक्ति की सीमा सिर्फ मेरी नैतिकता है।यह संकेत इतिहास के संदर्भ में विडंबनाओं से भरा है, क्योंकि अमेरिका खुद साम्राज्यवादी नियंत्रण के खिलाफ विद्रोह से पैदा हुआ देश है। वह पहले ही अमेरिकी महाद्वीप पर बाहरी अधिकार की भयावह क्रूरता को झेल चुका है। 1492 में इतालवी नाविक क्रिस्टोफर कोलंबस ने स्पेन के ईसाई राजा के लिए अमेरिका की ‘खोज’ की। लंबी समुद्री यात्रा के बाद जब कोलंबस वहां पहुंचा, तो जिन मूल निवासियों ने उसका स्वागत किया, उन्हें और उनकी ‘पैगन’ संस्कृति-सभ्यता को मजहब के नाम पर मिटा दिया गया। आज वे अमेरिकी संग्रहालयों में महज प्रदर्शनी की वस्तु बनकर रह गए हैं।
सदियों बाद संभवतः पहली बार यूरोप खुद अपने द्वारा स्थापित साम्राज्यवादी हनक को महसूस कर रहा है। ट्रंप की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं की आलोचना उसी यूरोपीय महाद्वीप से हो रही है, जिसका इतिहास आक्रमण, औपनिवेशिक शोषण और नस्लीय भेदभाव से भरा पड़ा है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच के मंच से ट्रंप को घेरते हुए कहा था “यह नए साम्राज्यों का समय नहीं है।”
विडंबना यह है कि यही फ्रांस आज भी कैरेबियाई क्षेत्र से लेकर हिंद महासागर तक कई क्षेत्रों में अपना प्रशासन चलाता है। नाम भले बदल गए हों, लेकिन शासन का नजरिया अब भी संरक्षणवादी ही है। इसी कारण फ्रांस के पास दुनिया में सबसे अधिक 12–13 टाइम जोन हैं। अल्जीरिया में फ्रांसीसी शासन के खिलाफ चले स्वतंत्रता संग्राम (1954–62) में करीब 15 लाख लोग मारे गए थे।
यूरोप की बेचैनी दावोस से पहले ही दिखने लगी थी। जर्मनी के वित्त मंत्री ने चेतावनी दी कि वे ट्रंप के दबाव के आगे नहीं झुकेंगे। वहीं फ्रांसीसी वित्त मंत्री के अनुसार, 250 साल पुराने सहयोगी अब शुल्क को हथियार बना रहे हैं। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने तो विश्व व्यवस्था को “एक सुखद भ्रम का अंत” तक कह दिया।
सच यह है कि तथाकथित ‘विश्व व्यवस्था’ कभी कोई सार्वभौमिक नैतिक समझौता नहीं रही। यह हमेशा नियम बनाने वालों के हित में गढ़ी गई शक्तिशालियों की व्यवस्था रही है। इसलिए पश्चिमी दुनिया के मुंह से नैतिकता की बातें अक्सर छलावे जैसी लगती हैं।
16वीं शताब्दी में पुर्तगाली वास्को डी गामा और स्पेनवासी जेसुइट मिशनरी फ्रांसिस जेवियर के भारत आगमन का घोषित उद्देश्य स्थानीय पूजा-पद्धतियों को समाप्त कर ईसाइयत का विस्तार करना था। इस प्रक्रिया में हिंदुओं, मुसलमानों और स्थानीय ईसाइयों पर जो उत्पीड़न हुआ, उसका इतिहास बेहद नृशंस है। गोवा इनक्विजिशन इसका भयावह उदाहरण है, जिसमें असंख्य लोगों की जीभ काटी गई और चमड़ी उधेड़ी गई। इन घटनाओं का उल्लेख कई प्रमाणिक लेखकों के साथ संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर के साहित्य में भी मिलता है।
वैटिकन और कैथोलिक चर्च ने दुनिया के कुछ हिस्सों, कनाडा सहित, में अपने अपराधों पर खेद जताया है, जो अधिकतर छवि सुधार का प्रयास भर रहा।
यदि यूरोप का अतीत कलंकित रहा है, तो अमेरिका का इतिहास रणनीतिक भूलों से भरा है। उसी ने चीन के साम्राज्यवादी उदय का रास्ता खोला। 1999 में व्यापार समझौते और 2001 में विश्व व्यापार संगठन में प्रवेश दिलाकर अमेरिका ने चीन को वैश्विक उत्पादन का केंद्र बना दिया। उस समय चीन की जीडीपी 1.2 ट्रिलियन डॉलर थी, जबकि अमेरिका की 10.3 ट्रिलियन डॉलर। आज चीन 19.5 ट्रिलियन डॉलर के साथ अमेरिका के बेहद करीब पहुंच चुका है।
चीन का तिब्बत पर कब्जा है, भारत सहित कई देशों के साथ उसके सीमा और समुद्री विवाद हैं और उसकी कर्ज कूटनीति ने श्रीलंका जैसे देशों को संकट में डाल दिया है। अमेरिका दशकों से अपनी ताकत दिखाता रहा है वियतनाम, इराक, अफगानिस्तान और वेनेजुएला इसके उदाहरण हैं। 1980 के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ जिन मुजाहिद्दीनों को अमेरिका ने खड़ा किया, बाद में उन्हीं से तालिबान के रूप में उसे लड़ना पड़ा। अंततः दो दशक बाद वही अमेरिका उन्हीं तालिबान से समझौता कर अपने हथियार छोड़कर लौट गया।
फिर भी अमेरिका में लोकतंत्र है, चुनाव हैं और अदालतें हैं, इसलिए वहां सुधार की संभावना बनी रहती है। चीन में ऐसा नहीं है। वहां सत्ता अत्यधिक केंद्रीकृत है और विरोध-असहमति की कोई जगह नहीं। यही कारण है कि चीन का उदय अधिक चिंताजनक है।
शक्ति-संतुलन के इस कठोर खेल में भारत के लिए संदेश बिल्कुल स्पष्ट हैसहयोग करें, लेकिन समर्पण नहीं। किसी भ्रम में न रहें। कूटनीतिक चाशनी में डूबे शब्दों पर तुरंत भरोसा न करें। अंतरराष्ट्रीय राजनीति भावनाओं से नहीं, हितों और ताकत से चलती है। दुनिया किसी ‘नई विश्व व्यवस्था’ की ओर नहीं बढ़ रही, बल्कि उसी पुरानी कठोर सच्चाई की ओर लौट रही है, जहां कमजोर की नैतिकता उपदेश लगती है और शक्तिशाली की नैतिकता नियम बन जाती है।
