वैश्विक: अमेरिकी नीतियां तीसरे विश्व युद्ध की नींव?

वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने खुले तौर पर घोषणा कर दी है कि ब्रिक्स संगठन के सक्रिय सदस्य देशों भारत, रूस, ब्राजील एवं चीन सहित कुछ अन्य देशों पर 500 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाया जा सकता है। इस संदर्भ में उन्होंने एक प्रस्ताव पर अपने हस्ताक्षर करते हुए उसे अमेरिकी संसद में पारित कराने हेतु भेज दिया है। दरअसल, अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट में कुछ याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा विभिन्न देशों से अमेरिका में होने वाले उत्पादों के आयात पर लगाए गए टैरिफ को चुनौती दी गई है।
घोषित तौर पर ट्रम्प का कहना है कि भारत और चीन द्वारा अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले उत्पादों पर टैरिफ इसलिए लगाया जा रहा है, क्योंकि ये दोनों देश रूस से भारी मात्रा में कच्चे तेल का आयात कर रहे हैं और इस संबंध में ट्रम्प द्वारा दी जा रही चेतावनियों की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। परंतु वास्तव में ट्रम्प ब्रिक्स संगठन के सदस्य देशों, विशेष रूप से भारत, रूस, ब्राजील एवं चीन से काफी परेशान हैं, क्योंकि ये देश अमेरिकी डॉलर को चुनौती देते हुए नजर आ रहे हैं। साथ ही, ये देश अपने विदेशी व्यापार के भुगतान को अमेरिकी डॉलर के स्थान पर अपनी-अपनी मुद्राओं में करने को प्रोत्साहित कर रहे हैं।
ब्रिक्स संगठन के सदस्य देशों के बीच होने वाले व्यापार के भुगतान के निपटान हेतु ब्रिक्स मुद्रा की परिकल्पना से निश्चित ही वैश्विक स्तर पर डी-डॉलराइजेशन की प्रक्रिया तेज होगी। इससे अमेरिका की चौधराहट पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। अतः ट्रम्प इन चारों देशों से अत्यधिक नाराज हैं और उन्हें सबक सिखाना चाहते हैं। परंतु अब ट्रम्प को वैश्विक स्तर पर हो रहे विभिन्न घटनाक्रमों को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।
भारत, रूस, ब्राजील एवं चीन आज विश्व के शक्तिशाली देशों की सूची में शामिल हैं। ये देश वेनेजुएला जैसे छोटे देश नहीं हैं, जिन पर ट्रम्प अपनी सत्ता और चौधराहट आसानी से जता सकें। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उनकी पत्नी सहित ट्रम्प की सेना द्वारा रात्रि में सोते समय गिरफ्तार कर अमेरिका ले जाया गया। इसके बाद ट्रम्प द्वारा यह बयान दिया गया कि वेनेजुएला स्थित तेल के कुओं से कच्चे तेल के भंडार अब अमेरिकी कंपनियों द्वारा निकाले जाएंगे और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचे जाएंगे, तथा इस व्यापार से होने वाले लाभ पर अमेरिका एवं वेनेजुएला दोनों का अधिकार होगा। यह एक संप्रभु राष्ट्र के अधिकारों का सीधा-सीधा हनन है।
वास्तव में अमेरिका की नजर वेनेजुएला में मौजूद कच्चे तेल एवं मूल्यवान खनिज संसाधनों पर है, जिन्हें वह अपने कब्जे में लेना चाहता है। इसी कारण वेनेजुएला के राष्ट्रपति को गिरफ्तार कर अमेरिका लाया गया और उन पर मुकदमा चलाया जा रहा है। इसी प्रकार अब ग्रीनलैंड नामक द्वीप, जिस पर वर्तमान में डेनमार्क का अधिकार है, को भी अमेरिका अपने कब्जे में लेना चाहता है। अमेरिका के पास पहले से ही ग्रीनलैंड में एक सैन्य अड्डा ‘पिटुफिक स्पेस बेस’ मौजूद है, लेकिन ट्रम्प पूरा द्वीप ही अमेरिकी नियंत्रण में लाने की मंशा रखते हैं।
इसके तुरंत बाद ट्रम्प ने वेनेजुएला के पश्चिमी पड़ोसी देश कोलंबिया को भी चेतावनी दी है, जहां तेल के विशाल भंडार हैं तथा सोना, चांदी, पन्ना, प्लेटिनम और कोयले की भारी मात्रा में खदानें मौजूद हैं। ट्रम्प ने कहा कि सरकार विरोधी प्रदर्शनों पर इतनी सख्ती नहीं की जानी चाहिए कि प्रदर्शनकारियों की मौत हो जाए, अन्यथा अमेरिका को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है।
मेक्सिको पर भी अमेरिका की टेढ़ी नजर पड़ चुकी है। अमेरिका का मानना है कि मेक्सिको से अमेरिका में ड्रग्स और अवैध अप्रवासियों का आना लगातार जारी है। अमेरिका का कहना है कि यदि मेक्सिको प्रशासन इसे रोकने में विफल रहता है, तो अमेरिका को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2025 में अपने दूसरे कार्यकाल के पहले दिन ही ट्रम्प ने ‘गल्फ ऑफ मेक्सिको’ का नाम बदलकर ‘गल्फ ऑफ अमेरिका’ करने के लिए एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। इससे पहले, वर्ष 2016 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान भी ट्रम्प ने मेक्सिको के साथ दक्षिणी सीमा पर दीवार बनाने की घोषणा की थी।
क्यूबा के वेनेजुएला के साथ घनिष्ठ संबंध रहे हैं। वेनेजुएला द्वारा कथित तौर पर क्यूबा को लगभग 30 प्रतिशत तेल की आपूर्ति की जाती रही है, जिसके बदले में क्यूबा वेनेजुएला को डॉक्टर एवं चिकित्साकर्मी उपलब्ध कराता रहा है। क्यूबा, फ्लोरिडा (अमेरिका) से मात्र 90 मील दक्षिण में स्थित एक द्वीप है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद तेल आपूर्ति बाधित होने से क्यूबा गंभीर संकट में फंस गया है और अब उसे अमेरिका पर निर्भर होना पड़ रहा है।
वैश्विक स्तर पर आर्थिक सत्ता का केंद्र अब पश्चिम से हटकर पूर्व की ओर स्थानांतरित होता दिखाई दे रहा है और ट्रम्प अपने क्रियाकलापों से इस प्रक्रिया को और गति देते नजर आ रहे हैं। आज ब्रिक्स के सदस्य देशों में लगभग 325 करोड़ नागरिक निवास करते हैं, जो विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 40 प्रतिशत है। इसके साथ ही, वैश्विक अर्थव्यवस्था में इन देशों की हिस्सेदारी लगभग 39 प्रतिशत है, जबकि जी-7 देशों का योगदान लगभग 29 प्रतिशत ही है।
ऐसे में विश्व के किसी भी शक्तिशाली देश के लिए ब्रिक्स के सदस्य देशों की अनदेखी करना अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने के समान है। अमेरिका केवल अपने दम पर कितने दिन चल सकता है, यह एक बड़ा प्रश्न है, क्योंकि आज भी वह अनेक उत्पादों के लिए अन्य देशों पर पूरी तरह निर्भर है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जब विभिन्न देश विभिन्न कारणों से एक-दूसरे पर निर्भर हैं, ऐसे में अमेरिका द्वारा कई शक्तिशाली देशों के साथ अपने संबंधों को खराब करना न केवल उसके अपने हितों के विपरीत है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है। अमेरिकी और वैश्विक अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए यह बात अमेरिकी नागरिकों को भी समझनी होगी।
