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भविष्य के लिए सीख : राष्ट्रीय स्तर की स्वास्थ्य, आर्थिक और सामाजिक संकटों के समाधान की पड़ताल

इंडिपेंडेंट कमीशन ऑन डेवलपमेंट ऐंड हेल्थ इन इंडिया (आईसीडीएचआई) ने “कोविड-19 ग्लोबल ऐंड नैशनल रिस्पांस : लेसंस फॉर फ्यूचर” नाम से एक रिपोर्ट तैयार कराई, जिसमें कोविड-19 के कारण पैदा हुई वैश्विक के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर की स्वास्थ्य, आर्थिक और सामाजिक संकटों के समाधान की पड़ताल की गई है।

भविष्य के लिए सीख : राष्ट्रीय स्तर की स्वास्थ्य, आर्थिक और सामाजिक संकटों के समाधान की पड़ताल
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कोविड-19 महामारी 2020 की पहली तिमाही में पूरी दुनिया में फैल गई, जिससे वैश्विक जैव-सामाजिक-आर्थिक अव्यवस्था सामने आई। इस महामारी ने बेशुमार सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक असर डाला, लोगों को व्यक्तिगत स्तर पर, समाजों में और राज्यों के स्तर पर असंख्य चुनौतियां सामने आईं। इंडिपेंडेंट कमीशन ऑन डेवलपमेंट ऐंड हेल्थ इन इंडिया (आईसीडीएचआई) ने "कोविड-19 ग्लोबल ऐंड नैशनल रिस्पांस : लेसंस फॉर फ्यूचर" नाम से एक रिपोर्ट तैयार कराई, जिसमें कोविड-19 के कारण पैदा हुई वैश्विक के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर की स्वास्थ्य, आर्थिक और सामाजिक संकटों के समाधान की पड़ताल की गई है। यह रिपोर्ट विश्व के जाने माने पेशेवरों और शोधार्थियों के एक समूह ने तैयार की और इसमें कोविड-19 की गंभीर हकीकत से मुकाबला करने के लिए अनुभव से सीखने की कवायद की गई है।

इस रिपोर्ट में महामारी को दो प्रमुख भागों के माध्यम से प्रकाश डाला गया है- वैश्विक और राष्ट्रीय प्रतिक्रिया। वैश्विक प्रतिक्रिया में एक देश से दूसरे देश के बीच तुलनात्मक अध्ययन, रोकथाम और प्रबंधन की रणनीति, पूरी दुनिया से कोविड-19 की कहानियों का एक केलिडोस्कोप, डब्ल्यूएचओ सहित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका और उनकी प्रतिक्रिया, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर महामारी का असर, सामाजिक परिणाम, लोकतंत्र को खतरे, टेस्टिंग की वैश्विक स्थिति और दुनिया भर में दवाओं व टीकों का विकास शामिल है।

रिपोर्ट के दूसरे आधे हिस्से में अपने गृह देश भारत में महामारी के किस्सों को समाहित किया गया है। राष्ट्रीय़ प्रतिक्रिया समग्र स्थितिजन्य विश्लेशण से शुरू होता है और उसके बाद महामारी को लेकर सरकार की प्रतिक्रिया, आईएमसीआर, आईडीएसपी, एनडीएमए और अर्ध सैनिक बलों जैसे संगठनों की कोविड-19 के रोकथाम में निभाई गई भूमिका, भारत में टेस्टिंग की स्थिति, आयुर्वेद की भूमिका, भारत की अर्थव्यवस्था पर असर, मानसिक स्वास्थ्य संकट, सीखने के परिणामों पर असर, कोविड-19 और मादक द्रव्यों के सेवन में सह संबंध, कोविड-19 के दौरान अपनाई गई टेलीमेडिसिन की समीक्षा, समुदाय आधारित जमीनी तैयारियों की जरूरत और राज्यों की कुछ झलकियां इसमें शामिल की गई हैं। कुल मिलाकर रिपोर्ट में कोविड-19 की गंभीर हकीकतों को देखते हुए अनुभवों से मिली सीख को पकड़ने की कवायद की गई है।

रिपोर्ट में विशेष उल्लेख किया गया है कि उभरते हुए स्वास्थ्य आपात की निगरानी और बहुत पहले इसकी सूचना देने के लिए एक मजबूत वैश्विक मौसम स्टेशन की जरूरत है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन से उम्मीद की जाती है कि उसकी मजबूत वैश्विक मौजूदगी से स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया मिल सकेगी। बहरहाल हाल के वर्षों में यह उस तरपह की अति सक्रिय प्रतिक्रिया नहीं दे सका है, चाहे व इबोला का मसला हो, या हाल के कोविड-19 के संकट का मामला। इसकी वजह से इस संगठन विश्वसनीयता प्रभावित हुई है। भविष्य की महामारी के जोखिम का मुकाबला करने के लिए बेहतरीन तरीके से तैयार रहना अहम है। इसके लिए पूर्व चेतावनी व्यवस्था, यात्रा के लिए साझा प्रोटोकॉल और सीमा पर नियंत्रण प्रतिबंध के मामले में वैश्विक तालमेल वाली व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही आपातकालीन तैयारियों के लिए एक आम सहमति वाला वैश्विक ढांचा होना चाहिए। आईएलओ, ओईसीडी जैसी पहल के माध्यम से स्वास्थ्य कर्मियों की वैश्विक कमी की समस्या का समाधान करने की कोशिश बढ़ाने की जरूरत बताई गई है और डब्ल्यूएचओ स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत इस पर काम कर रहा है।

भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में पूर्व सचिव और एशिया और प्रशांत क्षेत्र के यूएन सेक्रेटरी जनरल के विशेष दूत जे वी आर प्रसाद राव ने कहा, "कोविड-19 के उपचार के लिए विभिन्न देशों की कवायदों के कारण कई दवाएं और उपचार के कई तरीके सामने आए या आ रहे हैं। डब्ल्यूएचओ को आगे आकर तेजी से संबंधित दवाओं को सामने लाना चाहिए था, जिनका क्लीनिकल परीक्षण हो सकता था और उनका इस्तेमाल उपचार के लिए होता। प्रक्रिया का पालन बहुत समयसाध्य है, जिससे जीवन रक्षक दवाएं बनाने में मदद नहीं मिल पाती, जिनकी गंभीर मामलों के लिए उपलब्धता हो सकती है और इनसे मृत्यु दर कम किया जा सकता है।"

आगे रिपोर्ट में प्रमुख सरकारी संगठनों को मजबूत करने पर बल दिया गया है। एनसीडीसी, आईसीएमआर सहित प्रमुख भारतीय संगठन लगातार तमाम कवायदें कर रहे हैं जिससे कि अप्रत्याशित रूप से आई महामारी की चुनौतियों का समाधान निकल सके। बहरहाल इससे बेहतर करने की बहुत ज्यादा संभावनाएं हैं। आपदा प्रबंधन ढांचे का अधिकतम उपयोग करने, बीमारी के नियंत्रण और प्रभावी तरीके से प्रबंधन में एनसीडीसी की भूमिका व दायित्वों को मजबूत करने, केंद्र, राज्य व जिला स्तर पर निगरानी इकाइयों को मजबूत करने, पर्य़ाप्त वित्तीय और मानव संसाधनों के साथ आईडीएसपी को मजबूत करने के साथ इसे वैधानिक दर्जा देने, पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों में स्वास्थ्य एवं मेडिकल आपातकाल की स्थिति के बारे में बुनियादी प्रशिक्षण को शामिल करने और मौजूदा शोध संस्थानों में महामारी केंद्रित शोध को समर्थन देने जैसे काम किए जाने की जरूरत है।

भारत में हेल्थकेयर व्यवस्था अभी विकसित हो रही है और अपर्याप्त मानव संसाधन, खराब बुनियादी सेवा और सेवा की गुणवत्ता जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। यह कमी ग्रामीण हेल्थकेयर व्यवस्था में साफ नजर आती है। मौजूदा स्वास्थ्य संकट में यह अंतर और ज्यादा नजर आ रहा है। दूरस्थ इलाकों से आवाजाही की कमी है, जिससे दूरस्थ इलाकों के लोगों को समय पर चिकित्सा सेवाएं मुहैया नहीं हो पाती हैं। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर), नई दिल्ली के शोधार्थियों द्वारा किए गए हाल के एक सर्वे के मुताबिक ग्रामीण भारत में हर तीन चिकित्सकों में से दो चिकित्सक अनौपचारिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता होते हैं, जिनके पास दवाओं की आधुनिक व्यवस्था की कोई योग्यता नहीं होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट "द हेल्थ वर्कफोर्स इन इंडिया" के मुताबिक देश में 57.3 प्रतिशत एलोपैथिक डॉक्टरों के पास कोई मेडिकल योग्यता नहीं है।

भारत में विकास और स्वास्थ्य पर बने स्वतंत्र आयोग के समन्वयक आलोक मुखोपाध्याय के मुताबिक, "विभिन्न वजहों से, जैसे कि मानव व वित्तीय संसाधनों की कमी, मरीजों की भीड़ आदि के कारण स्वास्थ्य सेवा प्रदाता काम के बोझ के तले दबे रहते हैं और बमुश्किल ही उन्हें हेल्थ प्रमोशन, बीमारियों के रोकथाम और प्रबंधन और जोखिम के बारे में जानकारी देने का वक्त मिलता है। कम्युनिटी और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच एक कड़ी छूट जाती है। इस हकीकत को ध्यान में रखते हुए यह स्वाभाविक हो गया है कि हमें आईएएस की तर्ज पर एक सार्वजनिक स्वास्थ्य कैडर विकसित करने की जरूरत है। इसमें हर हेल्थकेयर सिस्टम में सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ शामिल किए जाएं, जिनकी जिम्मेदारी प्रोमोशन और रक्षात्मक पहलुओं पर नजर रखना हो।"

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि जहां शहरी इलाकों में तृतीयक देखभाल और निजी हेल्थकेयर की सुविधाएं मौजूद हैं, वहीं वहां प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल तक सीमित पहुंच है। खासकर शहरी झुग्गियों में रहने वालों के लिए कोई खास व्यवस्था नहीं है। यह एक अवसर है कि हम राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन को मजबूत करें और इस पर फिर से विचार करें, जिसकी क्षमता का दोहन पर्याप्त रूप से नहीं किया गया है। सरकार को छोटे और मझोले शहरों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं संबंधी बुनियादी ढांचा बनाने और मजबूत करने की जरूरत है, जिसे स्वास्थ्य व्यवस्था के सभी तीन स्तंभों (प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक) के स्तर पर मौजूदा सरकारी योजनाओं जैसे एनयूएचएम, आय़ुष्मान भारत और हेल्थ ऐंड वेलनेस सेंटरों (एचडब्ल्यूसी) के माध्यम से लागू किया जा सके।

मौजूदा संकट एक मजबूत कानूनी ढांचे/सुधार के सृजन की जरूरत पर जोर दे रहा है, जिसे प्राचीन महामारी रोग अधिनियम, 1897 की जगह लागू किया जा सके। इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य आपासकाल से प्रभावी तरीके से निपटने में मदद मिल ससेगी, जब महामारी कोविड-19 के स्तर की हो। इस स्थित में मसौदा राष्ट्यी स्वास्थ्य विधेयक (2009) उम्मीद की एक किरण है, जिसमें स्वास्थ्य और स्वास्थ्य देखभाल के सभी पहलुओं पर जोर दिया गया है, जिसमें "सबके लिए स्वास्थ्य" के लक्ष्य के मुताबिक विभिन्न तत्व शामिल हैं। यह भी अहम है कि सरकार को स्वास्थ्य का अधिकार देना चाहिए और इसे जीवन के मूल अधिकार के अटूट हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।

कोविड-19 महामारी के दौर में टेलीमेड़िसिन और वर्चुअल केयर मरीजों की देखभाल का एक महत्त्वपूर्ण साधन बनकर उभरा है, जब स्वास्थ्यकर्मियों और मरीजों को सुरक्षित रखना है। इस तरह से यह जरूरी है कि टेलीमेडिसिन को एक समान रूप से उच्च नैतिक मानदंडों के अनुरूप लागू किया जाए जिससे सभी व्यक्तियों की गरिमा बनाए रखने के साथ शिक्षा, भाषा, भौगोलिक क्षेत्र, भौतिक एवं मानसिक सक्षमता, उम्र, लिंग इत्यादि स्वास्थ्य देखभाल की राह में बाधा न बनने पाए।

हार्वर्ड स्कूल आफ पब्लिक हेल्थ में वैश्विक स्वास्थ्य एवं जनसंख्या विभाग के प्रोफेसर विक्रम पटेल ने कहा, "अगर हम महामारी के कठिन चरण के आगे की स्थिति देखें तो विश्व को एक आर्थिक मंदी से निपटने की जरूरत होगी, जो किसी अन्य चीज की तुलना में सबसे अहम है। आर्थिक मंदी के असर के रूप में मानसिक स्वास्थ्य देखभाव का बोझ बढ़ने, देशों में असमानता की खाईं चौड़ी होने, महामारी के भविष्य की लहर के बारे में अनिश्चितता और शारीरिक दूरी की नीतियां जारी रहने की संभावना नजर आ रही है। गरीबी, असमानता और कमजोर मानसिक स्वास्थ्य के बीच मजबूत संबंध को देखते हुए यह आश्चर्यजनक नहीं है।"

यह हकीकत है कि महामारी के बाद राजकोषीय स्थिति थोड़ी अनिश्चित होगी, पर यह अहम है कि हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली को मजबूत किया जाए। इस दिशा में काम करने के लिए व्यापक स्वास्थ्य व्यय को देखते हुए संसाधन जुटाने और संसाधन का रास्ता तैयार करने के लिए चिह्नित कर (या निर्धारित कर) पेश किया जा सकता है। चिह्नित कर के माध्यम से एकत्र किए गए राजस्व का व्यय केवल तैयार की गई योजनाओं के लिए किया जाए और इस तरह से यह सुनिश्चित किया जाए कि लोगों के धन को सार्वजनिक कल्याण में इस्तेमाल किया गया है। कड़ी जवाबदेही और इसके साथ चातुर्यपूर्ण वित्तीय योजना और प्रबंधन के माध्यम से इन करों को भारत की अर्थव्यवस्था में समायोजित किया जा सकता है।

इंडिपेंडेंट कमीशन ऑन डेवलपमेंट ऐंड हेल्थ इन इंडिया (आईसीडीएचआई) के बारे में इंडिपेंडेंट कमीशन ऑन डेवलपमेंट ऐंड हेल्थ इन इंडिया (आईसीडीएचआई) की स्थापना 1995 में की गई। इस कमीशन में स्वास्थ्य एवं विकास क्षेत्रों की जानी-मानी हस्तियां शामिल हैं। कमीशन का मकसद नीतिगत शोध एवं विश्लेषण, गहराई से सर्वे कराकर, चिह्नित समूह से चर्चा, जन सुनवाई और विकास कर्मचारियों, नीति निर्माताओं और और लोगों के साथ गोलमेज सम्मेलन के माध्यम से देश के विकास विकास व स्वास्थ्य की स्थितियों का आकलन करना है। यह कमीशन प्रधानमंत्री कार्यालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, योजना आयोग, गैरसरकारी संगठनों, जमीनी स्तर पर पंचायतीराज संस्थानों व अन्य संबंधित मंचों के साथ मिलकर बहुत नजदीकी से काम करता है।





(लेखक शाश्वत तिवारी, वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं)

Updated : 22 May 2021 8:04 AM GMT
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