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आदि शंकराचार्य रचित विवेकचूड़ामणि में मिलता है वेदों का सार

डाॅ ऋतु पाण्डेय शर्मा

आदि शंकराचार्य रचित विवेकचूड़ामणि में मिलता है वेदों का सार
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अत: परंपरागत ब्रह्म सदद्वितीयं
विशुद्ध विज्ञानघनं निरंजनम्।
निरन्तरानन्दरसस्वरूपम् ।।
निरस्तमायाकृतसर्वभेदं
नित्यं सुखं निष्कलमप्रमेयम्।।अरूपव्यक्तमनाख्यमव्ययं
जयोति: स्वयं किंचिदिदं चकाअस्ति।।

वेबडेस्क। आदि शंकराचार्य रचित विवेकचूड़ामणि में वेदों का सार मिलता है। अद्वैत दर्शन की सुन्दरतम मीमांसा इसमें की गई है। इसकी रचना उन्होंने अपने बाल्यकाल में ही कर ली थी। जीव और ब्रह्म (रचनाकार) दोनों एक ही हैं और इस "एकात्म" दर्शन का प्रचार-प्रसार उन्होंने अपने छोटे- से जीवनकाल में किया। इस सूत्र में आदि शंकराचार्य ने ब्रह्म की अभिव्यक्ति बीस विशेषणों से की है। जो आँखों से परे है जो दृश्य और दृष्टा में व्याप्त है अर्थात शाश्वत है वही ब्रह्म है।

डाॅ ऋतु पाण्डेय शर्मा

1. परं- सर्वातीत। देह और मन को प्रकाशित करने वाला तत्व वही है अर्थात चैतन्य।

2. सत्- जो भूत- वर्तमान- भविष्य में एक-सा बना रहता हो।

3. अद्वितीयम्- यही अंतिम शाश्वत सत्य है। जिसकी सत्ता के विपरीत बाधित करने वाला कोई दूसरा नहीं। जो एक ही हो; अद्वय ।

4. विशुद्धं- जिसमें कोई विकार नहीं। यह अवस्था विधायक है। पवित्र और शुद्धतम को बताने वाली।

5. विज्ञानघनं- घनीभूत ज्ञान। अर्थात ज्ञान का भी परम् ज्ञान। जो वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति बदलने पर भी बदलता नहीं। जिस एक को जान लेने से सब जान लिया जाए।

6. निरंजन- जिसपर कोई दाग नहीं। कामना, लालसा या वासना से जो परे हो। आत्म इन सबसे परे है।

7. प्रशांत- शांति की उच्चतम अवस्था। जहां हर प्रकार के विक्षेप और हलचल का शमन हो गया हो।

8. आदि-अंत-विहीनं- जिसका न आरंभ हो न ही अंत। जो नित्य और शाश्वत हो, जिसका विस्तार अनंत और असीम हो। निश्चित ही जन्म और मरण से भी परे।

9. अक्रियं- जो कर्ता और कर्म से परे हो। मन की अक्रिय अवस्था जिसमें वह क्रिया होकर साक्षी मात्र हो जाए।

10. निरंतर आनंदमय स्वरूपम्- मन की वह अवस्था जब वह अपने स्वभाव में या 'स्व' में स्थित हो तब जो आनंद होता है वह निरपेक्ष होता है। अर्थात 'सच्चिदानंद'।

निरस्त मायाकृत सर्वभेदनम्- जो सभी प्रकार के भेदाभेद, द्वैत से परे हो। संसार 'लीला' के मूल भाव को जानने वाला। परमसत्ता को जानने वाला।

11. नित्यं- वही जिसका कभी नाश न हो। जो देशकाल, समय, व्यक्ति, वस्तु से बाधित न हो। इनके न होने पर भी जो बना रहता हो।

12. सुखं- जो आनंदमय हो। भावना नहीं भाव और आनंद रस को सदा प्रकाशित करने वाला।

13.निष्कलं- जिसे कभी खण्डित न किया जा सके। अखण्ड और असीम।

14. अप्रमेय- जिसे मापा न जा सके। जैसे सत्य, प्रेम अपरिमेय हैं, जिन्हें अभिव्यक्त करने के लिए भाषा सीमित है फिर भी जिसे समझाया न जा सके। जिसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। अतुलनीय, अनिर्वचनीय।

16. अरूपं- रूप कारणजन्य है लेकिन रूप के पीछे की शक्ति का अपना कोई रूप नहीं, न ही कोई आकार। इसलिए ब्रह्म को निराकार कहा जाता है।

17. अव्यक्तं- जिसे व्यक्त न किया जा सके। परिभाषित न किया जा सके। मन, बुद्धि, अहंकार द्वारा जाना न जाए।

18. अनाख्यां- जिसका कोई रूप और आकार नहीं उसका नाम कैसे हो सकता है। तभी यह मन या बुद्धि का विषय नहीं। नाम रहित।

19. अव्ययम्- जिसे घटाया न जा सके। जो अपरिवर्तनशील और नित्य हो।

20. ज्योतिस्वरूप- स्वयं प्रकाशित। जिसका अपने ही प्रकाश से सारा ब्रह्मांड प्रकाशित हो। जिसके लिए किसी माध्यम की आवश्यकता न हो।

इन विशेषणों की अंतिम समिधा के रूप में यह कहना उपयुक्त होगा-

"तत्वमसि" ब्रह्म और जीव एक ही हैं। वह तुम ही हो।

Updated : 2022-05-06T12:40:21+05:30
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स्वदेश वेब डेस्क

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