आपातकाल की आपबीती: जेल गए पति, छूटा साथ और मासूम सवाल

आपातकाल का आतंक केवल जेलों तक सीमित नहीं था। उसका असर घरों की देहरी पर, बच्चों की आंखों में और स्त्रियों के मौन साहस में भी दिखाई देता था। जब पति जेल में हो और समाज भय के कारण मुंह मोड़ ले, तब परिवार को संभालना किसी सत्याग्रह से कम नहीं होता। ग्वालियर की डॉ. संगीता गोखले की यह आपबीती उसी अदृश्य संघर्ष की कहानी है, जिसने लोकतंत्र की रक्षा में परिवारों को भी सहभागी बना दिया।
ग्वालियर। आपातकाल का दौर भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे भयावह अध्याय रहा है। कांग्रेस सरकार की तानाशाही के विरुद्ध आवाज उठाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंस दिया गया। भय का ऐसा वातावरण था कि जेल की कोठरी का दरवाजा कब और किसके लिए खुलेगा, यह आशंका केवल स्वयंसेवकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनके परिवारों के जीवन में भी स्थायी भय बनकर उतर आई।
इसी दौर में संघनिष्ठ कार्यकर्ता सुधाकर गोखले ने महाराज बाड़ा पर सत्याग्रह कर तानाशाही को चुनौती दी। परिणामस्वरूप 25 जनवरी 1976 को उनकी गिरफ्तारी हुई। शिंदे की छावनी स्थित कमल सिंह का बाग निवासी 80 वर्षीय डॉ. संगीता गोखले आज भी उस समय को याद कर भावुक हो उठती हैं। वे बताती हैं कि सरकार के डर से परिजन, रिश्तेदार और पड़ोसी दूरी बनाने लगे थे। लोग खुलकर बात करने से कतराते थे। कई बार कोई मिलने आता भी तो बहुत धीमी आवाज में बात करता था, यह देखते हुए कि कहीं कोई सुन न ले।
डॉ. संगीता गोखले बताती हैं कि पति की शिंदे की छावनी में किराने की दुकान थी, उसी से घर चलता था। तीन छोटे बच्चे थे, जिनकी उम्र तब पांच, छह और सात वर्ष थी। पति के जेल जाने के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। मजबूरी में उन्हें सुबह और शाम दो-दो घंटे दुकान खोलनी पड़ी। दुकान संचालन में वरिष्ठ स्वयंसेवक राजाभाऊ नेवासकर ने उनका बहुत सहयोग किया।
उस समय बच्चे घर पर अकेले रहते थे। यह चिंता हर पल मन को व्याकुल रखती थी। बच्चे अपने पिता को बहुत याद करते थे। एक दिन पांच वर्षीय बेटे समीर ने मासूमियत से पूछ लिया, “पापा जेल क्यों गए? जरूर कोई गलत काम किया होगा।” यह सुनते ही डॉ. संगीता की आंखों से आंसू छलक पड़े। उन्होंने बेटे को समझाया, “बेटा, तुम्हारे पापा ने कोई गलत काम नहीं किया है। वे देश में लोकतंत्र बचाने के लिए तानाशाही का विरोध कर रहे हैं, इसलिए उन्हें जेल जाना पड़ा।”
इस कठिन समय में डॉ. संगीता गोखले ने अद्भुत धैर्य और साहस का परिचय दिया। तीन बच्चों का पालन-पोषण और दुकान संभालने के साथ ही वे पेशी पर आने वाले मीसाबंदियों का स्वागत करने कोर्ट भी जाती थीं। वे मीसाबंदियों का तिलक कर अभिनंदन करतीं और “भारत माता की जय” का उद्घोष करतीं। उनके स्वर के साथ वहां उपस्थित मीसाबंदी और आमजन भी जयकारे लगाते थे। उस भयावह वातावरण में यह दृश्य साहस का प्रतीक बन जाता था।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ग्वालियर विभाग के व्यवस्था प्रमुख रहे सुधाकर गोखले 39 दिन जेल में रहे। जेल से लौटने के बाद भी उन्होंने मीसाबंदियों और उनके परिवारों की सहायता जारी रखी। पार्वतीबाई गोखले उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, जीवाजीगंज के प्राचार्य गोपालराव टेम्बे सहित कई मीसाबंदियों के परिजनों को उन्होंने किराने का सामान उधार दिया, ताकि संकट की घड़ी में किसी का चूल्हा न बुझे।
विश्व हिंदू परिषद मातृशक्ति, पूर्वी उत्तर प्रदेश की पालक रहीं डॉ. संगीता गोखले कहती हैं कि संघ कार्य ईश्वरीय कार्य है। जब हम नेक कार्य में सहभागी बने, तो उसका फल भी मिला। आज उनके सभी बच्चे सक्षम और संस्कारवान हैं। पुत्र डॉ. समीर गोखले चिकित्सक हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, लश्कर जिला में विवेकानंद नगर के संघचालक हैं। दोनों बेटियां डॉ. सुवर्णा आचवल और श्रीमती स्वल्पा पेडणेकर राष्ट्र सेविका समिति की मुख्य शिक्षिका रही हैं। पौत्र सोहम अध्ययनरत है और संघ शिक्षा वर्ग का प्राथमिक वर्ग कर चुका है। पौत्री गार्गी भी संघ के कार्यक्रमों में भाग लेती हैं।
यह कहानी केवल आपातकाल के अत्याचारों की गवाही नहीं है, बल्कि उस अदम्य साहस और संस्कारों का प्रमाण है, जिसने एक पूरे परिवार को भय, अभाव और तानाशाही के बीच भी राष्ट्रसेवा के पथ पर अडिग बनाए रखा।
