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तालिबान और तालिबानी सोच

राजेंद्र जोशी

तालिबान और तालिबानी सोच
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तालिबान और तालिबानी सोच।

हलो जो बाइडन सुनो। मैं बोल रहा हूँ भारत से। तुम्हारा और अफगानिस्तान की जनता का शुभ चिंतक। एक बात सुनो ध्यान से सुनो जो भी हवाई जहाज हैलीकॉप्टर लड़ाकू विमान और सबसे महत्वपूर्ण खतरनाक हथियारों का जखीरा मशीन गन राकेट लांचर सहित जो भी सामग्री तुम अफगानिस्तान से भागते समय छोड़ कर चले गये थे। पश्चाताप स्वरूप वह सारी सामग्री अमरुल्लाह सालेह के हवाले कर देते। इससे अफगानिस्तान की जनता की कुछ सहायता भी हो जाती और तुमको प्रायश्चित करने का अवसर भी मिल जाता। काश तुम अमरूल्लाह सालेह की मदद करते तो आज परिणाम कुछ और ही नजर आते। अब भी कुछ संभावना है तो उस जखीरे को पंजशीर घाटी भेजने का प्रबंध करो अथवा जैसे भी हो सालेह के हाथ मजबूत करो। अन्यथा अफगानिस्तान की जनता तुमको कभी क्षमा नहीं करेगी। पूरे अफगानिस्तान में सालेह ही एक अकेला मर्द रह गया है जो पंजशीर घाटी में खुल कर तालिबान को ललकार रहा है। बाकी तो बड़े बड़े तीस मार खां कमांडर गीदड़ों की तरह पीठ दिखा कर भाग खड़े हुए। सबसे अफसोस अशरफ गनी के लिए हो रहा है। जो निहायत ही डरपोक निकला। भागने से पहले सालेह से मिल लिया होता तो अफगानिस्तान को आज ये दिन नहीं देखने पड़ते।

अशरफ गनी तुम तुम्हारी पूरी सत्ता और तुम्हारी फौज इतने दिनों तक अमेरिकियों के पीछे छुप कर देश को बेवकूफ़ बनाते रहे। तुम राष्ट्रपति भवन में बिरयानी खाते रहे। अमेरिका के डालरों से अपनी सफेद कमीज की कालरों पर क्लफ चढ़ाते रहे। जहाँ अमेरिका तालिबान पर बम बरसा रहा था। वहीं तुम तुम्हारे निकम्मे दो कौड़ी के जनरल भाड़े के कमांडर और तुम्हारी गीदड़ सेना महलों कोठियों तंबुओं और बैरकों में आराम फरमाते रहे। पुलाव खाते रहे अलाव तापते रहे। भारत ने वह आलीशान एक हजार करोड़ का राष्ट्रपति भवन तुम्हारे लिए इसलिए नहीं बना कर दिया था कि तुम एक दिन कायरों की तरह भाग कर वह आलीशान भवन निकम्मे जाहिल दो कौड़ी के तालिबान को गिफ्ट कर दोगे। जिनको टायलेट और कीचन का अंतर पता नहीं वो इतने विशाल भवन का क्या करेंगे? उनको तो गुफाओं और सुरंगों में रहने की आदत है। वो यहाँ गधे ऊंट खच्चर बांधेंगे और खुद अफीम के गोले खा कर जाहिलों की तरह पड़े रहेंगे।

अशरफ गनी तुम इतने वर्षों तक ऐश का जीवन जीते रहे और जब देश संकट से घिर गया जब तुम्हारी बहादुरी दिखाने का समय आया तब तुम युद्ध के मैदान में जाने से पहले ही दुम दबा कर भाग खड़े हुए। धिक्कार है तुमको और तुम जैसे पठानों पर। तीन लाख की विशाल फौज अमेरिका द्वारा उपलब्ध कराये गये अत्याधुनिक हथियार गोला बारूद और लड़ाकू जहाजों का बेड़ा। तुमने पल भर में सबका बेड़ा गर्क कर दिया। इससे यह बात साबित होती है कि तुम सरकार बनाकर अफगानिस्तान की जनता की भलाई का ढौंग रचते रहे। तुम पैसा बनाते रहे। अमरीकी ब्रेड पर मक्खन मलाई लगा कर खाते रहे। तुम, तुम्हारे मंत्री, तुम्हारे कंमाडर, तुम्हारी सेना सेना कोयलों पर गोश्त भून कर खाते रहे। सत्ता सुख भोगते रहे। इतने वर्षों तक अमेरिका तुम्हारे लिए ढाल की तरह काम करता रहा। वो आगे रह कर तुम्हारा सुरक्षा कवच बना रहा। तुम आराम फरमाते रहे। तुम्हारी सत्ता और तुम्हारी फौज दोनों ही एक छलावा थी। तुम पैसा बनाते रहे। अमेरिका को लूटते रहे। मौज करते रहे। अमेरिकी सेना तुम्हारी रक्षा करती रही। तुम जनता की चुनी हुई सरकार के प्रतिनिधि के नाम पर भ्रष्टाचार करते रहे। लगता है तुम्हारी सरकार और पूरा तंत्र आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ था। तुम अफगानिस्तान की जनता को बीच मंझधार में छोड़ कर चले जाओगे, वो भी तब जबकि उनको तुम्हारी सबसे अधिक आवश्यकता थी। इसकी किसी ने भी कल्पना नहीं की थी। तुम कायर तो थे ही इस पर किसी को अब कोई शक नहीं रह गया है। लेकिन तुम तो दुम दबा कर भागने वाला गीदड़ निकले।

एक हिंदी फिल्म का मशहूर डायलॉग क्या वह सिर्फ गढ़ा गया था। वास्तविकता तो कुछ और ही नजर आती है। डायलॉग था पठान कभी पीठ नहीं दिखाता। जबकि पठान ने न केवल पीठ ही दिखाई है बल्कि वह भागा भी है और मारा भी जा रहा है। ऐसे कई झूठ और भी गढ़े गये हैं जो इतिहास में पढ़ाये भी जा रहे हैं और हम में से अधिक तर उन झूठों को सच मान बैठे हैं। हमें पढ़ाया गया हिंदू कायर थे और आपस में ही लड़ते रहते थे। जबकि इतिहास में मुगलों की शान में कसीदे गढ़े गये हैं। वास्तविकता कुछ और है जब तालिबान आज इक्कीसवीं सदी में भी इतने डरावने घिनौने गंदे और बद सूरत हैं तो आज से सदियों पूर्व वो कंगाल देशों के अति कंगाल चोर डाकू लुटेरे कैसे रहे होंगे? जो सोने की चिड़िया को लूटने आये थे। आप स्वयं अंदाज लगा सकते हैं।

निकट भविष्य में जब भी नई शिक्षा नीती लागू की जाने वाली है? वैसे इस पर अधिक विलंब नहीं किया जाना चाहिए। शिक्षा नीति लागू करने के साथ साथ भारत का वास्तविक और सही इतिहास का पुनर्लेखन भी किया जाना चाहिए। इतिहास के नाम पर जो मन गढ़ंत बकवास झूठे किस्से बच्चों को पढ़ाये जा रहे हैं। इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। आक्रांताओं, बाहरी आक्रमणकारियों, डाकुओं लुटेरों का महिमा मंडन किया जा रहा है। उनको हीरो के तौर पर प्रस्तुत किया गया है। जबकि जो वास्तविक हीरो हैं उनको नजर अंदाज किया गया है। इतिहास की पुस्तकों में बच्चों को अपने अतीत पर गौरव करने जैसा कुछ भी नहीं है। मुगलों का गुणगान और हिंदू राजाओं के अपमान के सिवाय। नये पाठ्यक्रम में हमारे देश के हजारों वर्षों के गौरवशाली इतिहास को सुव्यवस्थित और विस्तृत रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

जिससे हमारे देश के युवाओं को हमारे महान देश के गौरव गाथा पर अभिमान हो सके। अन्यथा अब तक जो पढ़ रहे हैं उससे टुकड़े टुकड़े गैंग तो संतुष्ट हैं ही। पूरे अफगानिस्तान में एक ही पठान का बच्चा निकला अमरुल्लाह सालेह। जो अफगानिस्तान छोड़ कर नहीं भागे बल्कि अभी भी मैदान में डटे हुए हैं। तालिबान के साथ दो दो हाथ करने को तैयार हैं। बाकी तो सब वही निकले ताली बजाने वाले हक्के बक्के छक्के भगोड़े कहीं के। सालेह की वीरता के पराक्रम से अफगानिस्तान की जनता के मन में भी तालिबान के विरुद्ध प्रदर्शन करने का थोड़ा साहस पैदा हुआ है। यदि तुम और तुम्हारी कायर सेना आज होती तो बात कुछ और होती। अफगानिस्तान की जनता का उत्साह दुगना होता। जिससे तुमको भी लड़ने की शक्ति मिलती। खैर जो होना था हो चुका। जो खोना था वह भी खो चुका है।

हाँ तो मिस्टर प्रेसीडेंट युनाइटेड स्टेट आॅफ अमरीका सुनो उन जंगली जाहिल तालिबानियों का उन जहाजों से भला क्या काम? वो एअर पोर्ट पर पड़े पड़े खड़े जंग खा जायेंगे। आदिम युग में जी रहे उन निकम्मे तालिबानियों को जहाज उड़ाने तो आते नहीं। वो किसी ट्रक ड्राइवर का अपहरण कर कहीं उसको जहाज चलाने के लिए न कह दें। उन्होंने उस ट्रक ड्राइवर की बात तो सुननी है नहीं। बेचारा बेकसूर मुफ्त में मारा जायेगा। इनका क्या ये तो कहीं भी कूद जायेंगे। बीहड़ों में जंगलों में कहीं भी। सारा अफगानिस्तान इनके बाप का जो है। जनता का तो कुछ है नहीं।

ऐसा ही कुछ अपने आपको बुद्धिजीवी समझने वाले तथाकथित फुके हुए कारतूस नुमा शायर वर्षों से हमारे देश में महफिलों में इनके बाप का भी हिन्दुस्तान था कह कह कर खूब वाहवाही लूटते रहे हैं। जब वो शायर नुमा गिद्ध देश विरोधी लाइन बार बार रिपीट कर रहा होता है। तब उसकी हरकतों पर श्रोताओं के रूप में बैठे हुए भाड़े के टट्टू खूब तालियां पीटते हैं। तब ये दोयम दर्जे के जुगाड़ बाज गालिब और मीर को अपना चचा समझने वाले टटपुंज्ये तथाकथित शायर अपने आपको देश से भी बड़ा समझने लगते हैं। अफगानिस्तान वाली स्थिति बार बार कुछ तालिबान प्रेमी गैंग वर्षों से भारत में भी पैदा करना चाहते हैं। लेकिन अभी तक वो अपनी इस नापाक हरकत में कामयाब नहीं हो पाये हैं। बड़ी सफाई से ये चतुर सियार के मामा गंगा जमुनी तहजीब के नाम पर देश की जनता को बेवकूफ़ बनाते आ रहे हैं। लेकिन उनको आज तक सफलता नहीं मिल पाई है। वो अक्सर शेर भी सुनाते रहते हैं कि हस्ती मिटती नहीं हमारी जबकि उनकी हसरत और पूरी मंशा भारत की हस्ती मिटाने की ही रहती है।

नाम तो बहुत सारे हैं जो आप सब को भी मालूम ही हैं। क्या करोगे इन गलीचों के नाम जानकर ? एक ही नाम काफी है। बकौल मुन्नवर राणा और तालिबान प्रेमी गैंग ये तालिबानी आतंकी नहीं हैं। तालिबानी लड़ाके सताये हुए बदनसीब बेचारे हैं। पहले इनके बाप दादाओं को रूसियों ने सताया और बाद में इनके अमेरिकी आकाओं ने इन पर अत्याचार किए। अब उनकी औलादें बेकसूर आजादी के दीवाने अफगानिस्तान की निर्दोष जनता पर क्रूर अत्याचार कर अपने ऊपर हुए अत्याचारों का बदला ले रहे हैं। ये तालिबान तो आजादी के लिए सत्याग्रह कर रहे हैं। आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। कौन सी आजादी? किस बात की आजादी? किसके लिए आजादी? किससे आजादी? पता नहीं? आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं तो खून तो बहेगा और जब सामने कोई दुश्मन है नहीं तो किसी को तो मारना ही है। तो अपनी जनता को ही मार रहे हैं। क्योंकि ये तालिबान हैं। अल्लाह के बंदे हैं। इस्लाम में विश्वास रखते हैं। शरीयत के मानने वाले हैं। शरीयत के अनुसार न्याय करते हैं। तो अन्याय का तो सवाल ही नहीं पैदा होता है। इनको खामखा बदनाम किया जा रहा है।

जब अफगानिस्तान की अपनी ही सेना जिनसे इन्होंने लड़ना था वो कायरों की तरह मैदान छोड़ कर भाग गए। तब ये बेचारे लड़ें भी तो किससे लड़ें और लड़ना तो है। क्योंकि ये लड़ाके हैं। तालिबान हैं। भारतीय मूर्ख बुद्धिजीवियों (दिवालिया मानसिकता के पागलों) के अनुसार तालिबान आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। माना कि इनका सत्याग्रह का तरीका कुछ भिन्न है तो क्या हुआ? ये अपनी ही जनता का खून बहाने में विश्वास रखते हैं। अपने ही लोगों पर अत्याचार करने में बहादुरी समझते हैं। लेकिन ये अत्यंत विनम्र स्वभाव के, दयालु प्रवृत्ति के क्षमा शील, धर्म में विश्वास रखने वाले अहिंसा वादी लोग हैं। ये हिंसा में रत्ती भर भी विश्वास नहीं रखते। जो ये करते हैं वह हिंसा नहीं है। वास्तव में आपका देखने का दृष्टिकोण गलत है। सरेआम पत्थरों से मारना, महिलाओं पर कोड़े बरसाना, बच्चों को जमीन पर पटक कर मारना, किसी को भी चौराहे पर फांसी पर लटकाना ये तो मुक्ति देने का उनका एक प्रिय तरीका है। यह हिंसा थोड़े ही है। वह सब जो अफगानिस्तान में आप देख रहे हैं उसको आप विशुद्ध मनोरंजन के तौर पर भी तो ले सकते हैं।

क्योंकि इनको मारने वाला तो कोई है नहीं। तो उसकी कमी ये फ्रीडम फाइटर अपने ही लोगों पर अत्याचार कर, महिलाओं पर कोड़े बरसा कर,बच्चों पर क्रूरता करके, निर्दोष लोगों को चौराहे पर सरेआम फांसी देकर , खूनी तांडव खेल कर पूरा कर लेते हैं।

बारह साल की बच्चियों को पचास साल के घिनौने बदसूरत तालिबानी उठा कर ले जाते हैं। तो भला कौन सा पाप करते हैं? वो तो उसके साथ शादी? छी - घृणा आती है ऐसी सोच को सही ठहराने वाले भारत में रहने वाले इनके हमदर्द, लिबरल गैंग के फूफे चाचे ताऊ मामे मौसे और तालिबान के बापों के दोगले साले और कुछ सालियों पर। बेशर्म बे गैरत दो कौड़ी के गंदी सूरत लेकर आ जाते हैं सुबह सुबह टीवी पर। हमने तो इसीलिए टीवी देखना भी बंद कर दिया है। ये दोगले भारत में रह कर शरीयत की वकालत करते हैं। दीन - ए-इल्लाही, मुस्तफा के निजाम की बात करते हैं। खुलेआम वो भी नेशनल टीवी चैनलों पर जो कि इनकी दृष्टि में हराम है। ऐसे लोकतंत्र का भी क्या लाभ जो अपनी रक्षा भी न कर सके?

क्योंकि टीवी खेल गाना बजाना गीत संगीत सुनना देखना हराम है और सिनेमा - तो तीन बार तौबा तौबा। नाचना तो सीधे दोजख में जाना जैसा। फिर जनता का मनोरंजन कैसे होगा? उसके लिए सबसे अच्छा और सस्ता एक ही साधन रह जाता है किसी निर्दोष पर कोई झूठा आरोप लगाया जाय और फिर उसको चौराहे पर फांसी पर लटका कर पत्थरों से मार मार कर हत्या की जाय। इससे दो बातें एक साथ हो जाती हैं। एक तो लोगों के मन में इनके प्रति भय घर कर जायेगा और दूसरा मुफ्त में जनता का मनोरंजन भी हो जायेगा। बहाओ निर्दोषों का खून वो भी अपनी ही बिरादरी के भाई बहनों का। अरे हराम खोरों तुम्हारी इन नापाक हरकतों से कौन सा खुदा खुश होता होगा? मुझे तो तुम जैसे गधों और तुम्हारे अत्याचारों पर तुम्हारी तरफदारी करना या तुम्हारे कुकृत्यों पर मौन रहने वाले गिरे हुए खच्चरों की बुद्धि पर तरस आता है।

तालिबान वैसे भी शरीयत पर चलने वाले शरीफ लोग अल्लाह के बंदे हैं। उनको आधुनिक लक्जरी वस्तुओं से क्या काम? उनके लिए तो ये सारी चीजें वैसे भी हराम हैं। इनको एक ही वस्तु से प्रेम है और वो है इनके अब्बा जान की ईजाद की हुई 14 सौ वर्ष पूर्व बनाई गई एलएमजी मशीन गन और AK 47 राइफल। 21वीं सदी में भी जब ये इतने जाहिल और जंगली हैं। तो 14 सौ वर्ष पूर्व इनकी स्थिति क्या रही होगी? कयास लगाया जा सकता है। तब भी इन्होंने AK 47 और राकेट लांचर बना दिये थे। मेरे कहने का आशय आप समझ ही गये होंगे? आज भी इनके बस की बात एक सुई बनाना भी नहीं है। शायद धागा डालना सीख गये होंगे। क्योंकि इनकी बदबूदार गंदी पतलूनों के फटे आसन भला कौन सिलेगा? लेकिन निर्दोष लोगों का खून बहाने के लिए इनको आधुनिक हथियार ak 47 चाहिए और वो उनको मिलते हैं आपसे। इस बार तो मुफ्त में ही बहुत बड़ा खजाना उनके हाथ लग गया है।

और हाँ जब तुम्हारे बहादुर सैनिक अफगानिस्तान से तालिबानियों के डर से भाग रहे थे? तब तुम अपने सारे हथियार भी तालिबानियों को गिफ्ट छोड़ कर चले गये। सही तो है। पहले भी तो उनको हथियार आप ही उपलब्ध करवाते थे। आप के ही हथियारों से अब ये निरंकुश तालिबान आप पर भी आक्रमण करेंगे। आपने ये सब जानबूझकर कर किया या आपको तालिबान के डर से जल्दबाजी में भागना पड़ा? आज जबकि अफगानिस्तान में आपके परोक्ष सहयोग से तालिबान ने अवैध नियंत्रण कर ही लिया है। तब उसका अफगानिस्तान के सभी संसाधनों सहित सत्ता पर भी नियंत्रण हो ही गया है। चालबाज चीन ने सरकार बनाने से पहले ही उसको मान्यता भी दे दी है। देर सबेर आप जैसे देश भी उसको स्वीकार कर ही लेंगे। उनको बड़े पैमाने पर और हथियारों की आवश्यकता पड़ेगी। अत्याधुनिक हथियार तालिबान को आपने पहले ही से दिए हुए हैं। भारी संख्या में हथियार आप छोड़ कर आ गये हैं और आगे डिमांड के अनुसार आपूर्ति भी तो आपको ही करनी होगी।

वैसे भी तालिबानियों को हथियार चलाना सिखाया किसने है? तुमने ही तो। अब जबकि उनके पास हथियारों का जखीरा मौजूद है तो उनको गोला बारूद भी तो तुम ही उपलब्ध करावोगे। चलो एक बात बताओ। अनपढ़ जाहिल तालिबानी जो बेकसूरों का खून बहाने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं जानते उनके पास इतने अत्याधुनिक हथियार आते कहाँ से हैं? वो घिनौने तालिबान गुफाओं बीहड़ों सुरंगों में रह रहे थे? लेकिन विलासिता पूर्ण जीवन जी रहे थे। आखिर कैसे? उनके खाने पीने, हथियारों और गोला बारूद की आपूर्ति कहाँ से हो रही थी? उनकी सहायता कौन कर रहा था? उनके पास सीमित संसाधन होने के बावजूद भी वे जीत रहे थे और आप आधुनिक शस्त्र साज सामग्री संसाधनों से लैस होने पर भी हारते चले गये।

अफगानिस्तान में आप विगत दो दशकों से कर क्या रहे थे? तालिबान की कुल संख्या सतर हजार बताई जाती है। जबकी तुम्हारे पास अत्याधुनिक हथियारों जहाओं से लैस एअर फोर्स कमांडो और आधुनिक युद्ध संसाधनों से सुसज्जित लाखों इन्फैंट्री के जवान थे। तीन लाख से अधिक अफगानी सेना भी सीधे आपके ही नियंत्रण में थी। फिर भी आप हार गये? भाग गये? खरबों महाशंख डाॅलर आपने इतने वर्षों में पानी की तरह बहा दिये। उससे आपको कुछ लाभ तो हुआ नहीं। उल्टा आपको बीच में ही रण छोड़ कर जाना पड़ा। लेकिन आपके पैसों पर पल कर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में दर्जनों आतंकवादी गुट जेहादी आत्मघाती ग्रुप कुकुरमुत्तों की तरह उग आये। जो बढ़ते बढ़ते कैक्टस के जंगलों में परिवर्तित हो गये। उन आतंकी गुटों से सबसे अधिक नुकसान भारत को उठाना पड़ा और आज तक भी उठा रहे है। वाह मेरे शेर क्या वीरता दिखाई? अनर्णीत युद्ध को बीच में ही छोड़ कर भाग गए वह भी आधी रात को। जो इक्कतीस अगस्त का समय तालिबान से मिमयाते हुए आपने मांगा था उसके समाप्त होने के भी एक दिन पहले। जाते जाते अपने एक दर्जन सैनिकों को भी मरवा दिया। आपके मन में तालिबान का इतना खौफ भर गया कि आपको रात के अंधेरे में चुपचाप भागना पड़ा। वाह रे विश्व विजेता महा शक्तिशाली देश, महाशक्ति अमेरिका। कहाँ के महाशक्ति? सही कहा अमरुल्लाह सालेह ने सुपर पावर एक ही वार में मिनी पावर बन गया।

तुम तो आका थे। अचानक काका कैसे बन गये? काका को तो भतीजा कभी कभी मजाक में सुना भी देता है। हड़का भी देता है। लेकिन आका तो गुलाम को आदेश देता है। आका के आदेश पर जिन बोतल से निकल कर, अपने आका के शत्रुओं का काम तमाम कर, अपने मालिक की सारी मुरादें पूरी कर, फिर से बोतल में बंद हो जाता है। आपके केस में उल्टा कैसे हो गया? कहीं ऐसा तो नहीं गुलाम को आप बोतल में बंद कर ढक्कन लगाना भूल गये? या आपने गुलाम को पूरी तरह से आजाद कर लिया हमेशा के लिए। लेकिन आपने ऐसा क्यों किया? ये बात समझ से परे है।

तुमको यह बात भली भांति मालूम होते हुए भी कि तालिबान के पीछे तुम्हारे पालतू पाकिस्तान का ही हाथ है। तब भी तुम अनजान बने हुए हो। तुम आतंकवाद मिटाने के नाम पर पाकिस्तान को हर साल अरबों खरबों डालर देते रहे। पाकिस्तान डालरों के बदले तुम्हारी आँखों में धूल झोंक कर अपनी धरती पर तालिबान सहित दर्जनों आतंकी संगठनों को पनपाता रहा। गोस्त खिला खिला कर मोटा बनाता रहा। भारत ने कितनी ही बार तुमको पाकिस्तान की काली करतूतों से आगाह भी किया। लेकिन तुम्हारे कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। तुमने भारत की बातों पर कभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। तुम्हारे सबसे बड़े शत्रु ओसामा बिन लादेन को तुम्हारे टुकड़ों पर पलने वाला तुम्हारा प्यारा मित्र पाकिस्तान सालों तक तुमसे छिपाता रहा। तुम दुनिया भर में ओसामा को ढूंढते रहे। दर दर भटकते रहे। पाकिस्तान तुमसे लुकाछिपी का खेल खेलता रहा। अंत में वो मिला कहाँ? पाकिस्तान में ही न। ओसामा को पाकिस्तान में मारने के बाद भी तुम्हारी आँखें नहीं खुली। तुम उस पर जरूरत से ज्यादा विश्वास करते रहे। इतना सब होने के बावजूद आज भी तुम उसकी सहायता कर रहे हो। हमारी बात मान लो। हम जो कह रहे हैं वह बात सोलह आने सच है यह जान लो। पाकिस्तान तुम्हारी आस्तीन में पलता हुआ जहरीला सांप है। वह तुमको नींद में कितनी ही बार डंस चुका है। फिर भी तुमको विश्वास ही नहीं होता है। क्योंकि जैसे ही तुम उठते हो उससे पहले ही वह चुपके से तुम्हारी आस्तीन में छिप जाता है। तुम कमरे में इधर उधर चारपाई के नीचे देखते हो और फिर लंबी तान कर सो जाते हो। तुम सोचते हो उसको तो तुम दूध पिलाते हो। वह तुम्हारा पालतू सांप है। वह थोड़े ही तुमको काट सकता है और इसी बात का वह लाभ उठा रहा है। यह बात समझ लो सांप कभी पालतू नहीं होता वह अवसर मिलते ही डंसेगा जरूर। हम तो ईश्वर से प्रार्थना ही कर सकते हैं और वही कर रहे हैं। हमारे ईश्वर तो कर्म करने के लिए कहते हैं और कर्म तुम कर नहीं रहे हो। तब फल कैसे प्राप्त होगा?

कुकर्म करने के परिणाम भी तो विपरीत ही आयेंगे। जो कि तुम भुगत रहे हो। दो दशक पहले जब आप पूरे दल बल के साथ अफगानिस्तान आये थे तब आप सदा के लिए यहाँ बसने के लिए तो आये नहीं थे। ये बात सबको मालूम थी। लेकिन एक दिन आप ऐसे जाओगे इसका किसी को भी अंदाजा नहीं था। क्योंकि आपका दल बल के साथ अफगानिस्तान में आना और अफगानिस्तान की जनता के साथ छल करके उनको मंझधार में छोड़ कर यूं चले जाना ये बात किसी को भी समझ नहीं आ रही है। आज आप अफगानिस्तान में आने के अपने निर्णय पर खुद ही प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं। धन्य हैं आप और आपकी फारेन पालिसी। आप विकसित देश हैं। आप विश्व में सबसे बड़े लोकतंत्र में से एक हैं। विश्व में आपके नाम का डंका बजता है। आपका जल थल नभ में बोलबाला है। लेकिन अफगानिस्तान आपके गले की हड्डी कैसे बन गया? जिसे आप बिना निगले बिना उगले पानी का घूंट पीने को विवश हो गये।

हमारे देश में भी काफी बड़ी संख्या में तालिबान के समर्थक और तालिबान का खुलेआम महिमा मंडन करने वाले मजहब के नाम पर खुल कर देश के लोकतंत्रिक मूल्यों पर कुठाराघात करने वाले तालिबान मौजूद हैं। इन पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में इनका न सिर्फ मनोबल बढ़ेगा बल्कि इन जैसी कट्टर मानसिकता वाले खतरनाक भेड़िये खुलेआम सिर उठायेंगे। ऐसी विकृत मानसिकता, घृणा फैलाने वाली, देश में उन्माद पैदा करने वाली सोच कैक्टस के जंगल में परिवर्तित हो उससे पहले ही उसका सफाया किया जाना आवश्यक है।

अफगानिस्तान में तो दशकों से उथल पुथल का दौर रहा है। वह एक कबीलियाई देश है। वहाँ राष्ट्र के तौर पर कभी भी पूर्ण रूप से शांति और स्थिरता नहीं रही है। लेकिन हमारे देश को लौह पुरुष सरदार पटेल की दृढ़ इच्छा शक्ति और राष्ट्र भक्ति ने उनके अखंड भारत के सपने को न केवल साकार किया बल्कि उनके प्रयासों से आज भारत एक विशाल राष्ट्र के रूप में गर्व के साथ खड़ा है। सरदार पटेल के पुरुषार्थ से बने अखंड भारत को विश्व पटल पर अग्रिम पंक्ति में खड़ा देखने के लिए सरकार को ऐसी राष्ट्र विरोधी सोच रखने वाली शक्तियों से कठोरता के साथ निबटने की आवश्यकता है। जो समय समय पर देश की एकता अखंडता को चुनौती देते रहते हैं।

अफगानिस्तान के बहाने भारत में भी नक्सली सोच देश विरोधी मानसिकता रखने वाले राष्ट्र द्रोही तत्वों के विरुद्ध एक स्वच्छता अभियान चलाये जाने की अति आवश्यकता है। अफगानिस्तान में तालिबान के आतंकी गतिविधियों पर भारत में एक वर्ग खुल कर तालीबान का समर्थन कर रहा है। यह बात किसी से छिपी नहीं है। ये मात्र तालिबानी सोच ही नहीं रखते बल्कि इनकी गंदी नापाक सोच अखंड भारत को खंड खंड करने के अपने मंसूबे पूरे करना चाहते हैं। लोकतंत्र के नाम पर कुछ भी बोलने की आजादी की इनको अब और छूट नहीं दी जानी चाहिए। इनकी गंदी मानसिकता के विचारों से प्रभावित होकर एक वर्ग खुल कर राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में लगा हुआ है। इनके राष्ट्र विरोधी वक्तव्य आग में घी डालने का काम करते हैं। ये तथाकथित सैक्यूलर छद्म वेश धारी भेड़ की खाल में भेड़िये हैं।

ये मौके की तलाश में रहते हैं। शाहीन बाग, दिल्ली के दंगों सहित आज तक देश में जितने भी दंगे हुए हैं उनमें इन्हीं भेड़ियों का हाथ होता है। समय रहते इन पर नियंत्रण करना आवश्यक हो गया है। हमारे देश के ये तथाकथित सैक्यूलर बदजात गंदी नाली के कीड़े अफगानिस्तान में तालिबान के तांडव पर एक बार फिर से अचानक कुलबुलाने लगे हैं। इनके ऊपर शक्तिशाली कीटनाशक का छिड़काव करना आवश्यक हो गया है। अन्यथा ये कीड़े गंदी नालियों से होते हुए हमारी फसलों को भी बर्बाद कर सकते हैं। गलियों गलियों में, मारे मारे फिरने वाले ये खुजली वाले आवारा कुकुर तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जा होने के बाद कुछ ज्यादा ही भोंकने लगे हैं। इनकी संख्या अचानक से बढ़ गयी है। यह सही वक्त है इनकी नसबंदी कर इनकी आवादी पर नियंत्रण लगाने का। इनका तालिबान प्रेम कुछ ज्यादा ही उमड़ रहा है। फिर भी ये बेशर्म यहाँ डर डर कर जी रहे हैं। इनके अब्बा जान के चचा जान वहाँ अफगानिस्तान में इनके लिए दस्तरखान सजा कर बैठे हैं। जाओ देख कर आओ कैसे अफगानिस्तान की जनता पर ये शैतान की औलादें फूल बरसा रहे हैं। तुमको तो ऐसा ही लगता है तालिबान ने अफगानिस्तान की जनता पर गुलाब की पंखुड़ियाँ बरसा कर अफगानिस्तान को जन्नत बनाने के इरादे से काबुल पर तालिबानी झंडा फहराया है। वर्ना उनको क्या पड़ी थी? वो तो शांति से अपने अपने बीबी बच्चों को पाल रहे थे। बल्कि फकीरी का जीवन जी रहे थे। उन्होंने तो अफगानिस्तान पर कब्जा करके अफगानिस्तान की जनता पर उपकार किया है। अरे मनुष्य जैसे दिखने वाले शैतानों तुम्हारे दिमाग में क्या कचरा भरा हुआ है? जो तुम ऐसे खूंखार दरिदे राक्षसों का गुणगान कर रहे हो। उस तालिबान का जिसने असंख्य निर्दोष नागरिकों का खून बहाया है। उनकी रक्त रंजित पृष्ठ भूमि को एक झटके में कैसे कोई भूल सकता है?

इसी तालिबान के गुंडों ने बामियान में सदियों से गर्व से खड़ी भगवान बुद्ध की विशाल मूर्ति को देखते ही देखते पल भर धराशायी कर दिया। अन्य छोटी बड़ी दर्जनों मूर्तियों और पुरातत्व की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण अवशेषों की एक पूरी की पूरी विरासत को इन दरिंदों ने पलक झपकते ही नेस्तनाबूद कर दिया। ऐसी धरोहरें किसी भी राष्ट्र का गौरव होती हैं। लेकिन ऐसे जाहिलों के लिए धरोहर का महत्व क्या और विरासत के मायने क्या? उस पूरी सांस्कृतिक धरोहर को गढ़ने में दशकों लगे होंगे और इन पिशाचों ने एक पल में उस अतीत के गौरवशाली वैभव को मटियामेट कर दिया।ऐसा करते हुए इनको तनिक भी लज्जा नहीं आई। ऐसा करते हुए इनके हाथ जरा भी कांपे नहीं। अपनी नापाक हरकतों पर पर्दा डालने के बजाय पूरी बेशर्मी के साथ गंदी सूरतों पर भद्दी हंसी हंसते हुए टीवी पर उसका सीधा प्रसारण दिखाया जा रहा था।

इसी तालिबान ने अपने राष्ट्रपति नजीबुल्लाह को खुलेआम चौराहे पर फांसी पर लटका दिया था। जबकि उनका आत्म समर्पण इस आधार पर हुआ था कि तालिबान उनकी जान को बख्श देंगे। लेकिन वो अपनी सारी शर्तें भूल गये। दरअसल शर्तें नियम कानून का पालन करना तो सभ्य समाज के लिए आवश्यक है। इन जैसे राक्षसों के लिए भला कायदे कानून क्या मायने रखते हैं? इसी तालिबान ने तब भी बेकसूर औरतों पर कोड़े बरसाये थे आज भी बरसा रहा है। युवाओं को सरेआम पत्थरों से मार मार कर हत्या की थी और आज भी वही सब कर रहे हैं और आगे जैसे जैसे उनकी शक्ति बढ़ती जायेगी निर्दोष जनता पर उनका जुल्म और भी बढ़ता चला जायेगा।

पंजशीर घाटी में नार्दन अलायंस के लड़ाके मसूद और सालेह के नेतृत्व में तालिबान के साथ संघर्ष कर रहे हैं। यह लड़ाई वह आगे कब तक जारी पायेंगे? उस स्थिति में जबकि उनके पास लंबी लड़ाई जारी रखने के लिए सीमित संसाधन उपलब्ध हैं। समय बीतने के साथ ही उनके पास मौजूद गोला बारूद और खाद्य सामग्री की भी कमी हो जायेगी। क्योंकि घाटी के रास्ते तालिबान ने बंद कर दिये हैं और बिजली भी काट दी गयी है। घाटी में आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई भी बंद हो गई है। बिना बाहरी राष्ट्रों की सहायता के पंजशीर की स्वायत्तता बनाये रखना नार्दन अलायंस के लिए असंभव होगा। दूसरी ओर तालिबान को अभी तक जो समाचार प्राप्त हो रहे हैं उसके अनुसार भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। उसके पाँच सौ से अधिक आतंकी नार्दन अलायंस ने ढेर कर दिए हैं। लेकिन यह स्थिति आगे कितने दिनों तक बनी रहेगी कहना कठिन है। नार्दन अलायंस के लड़ाकों को जो सफलता मिल रही है इसमें उनका साहस आत्म विश्वास जुझारू पन सफल नेतृत्व आसानी से हार न मानने की उनकी प्रवृत्ति के अतिरिक्त सबसे प्रमुख कारण है घाटी की भौगोलिक स्थिति। पंजशीर की सभी ऊंची चोटियों पर लड़ाकों का नियंत्रण है। शत्रु को नीचे घाटी से ऊपर की ओर बढ़ना है और ऊपर पंजशीर के लड़ाके घात लगा कर बैठे हैं।

एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि समय बीतने के साथ साथ नार्दन अलायंस के संसाधन और शक्ति क्षीण पड़ती जायेगी। जबकि उसके विपरीत तालिबान समय गुजरने के साथ और शक्तिशाली बनता जायेगा। सरकार गठन के बाद उसकी आवश्यकता पूर्ति के संसाधन बढ़ते चले जायेंगे। यह तालिबान बीस वर्ष पुरानी सोच वाला वाला वही खूंखार तालिबान तो है। लेकिन इस बार उसकी क्रूरता की शक्ति को और भी तेज धार मिल गयी है। अमेरिका द्वारा छोड़े गये घातक हथियारों के जखीरे से उसकी शक्ति कई गुना और बढ़ गई है। नुकसान उठा रहा बौखलाया हुआ तालिबान पंजशीर को अपने नियंत्रण में करने के लिए कुछ भी कर सकता है। पंजशीर के लिए वह रात दिन जमीन आसमान एक किये हुए है। तालिबान आज भारी टैंकों राकेट लांचरो और मोर्टारों के अतिरिक्त हवाई हमले करने में भी सक्षम है। इस स्थिति में पंजशीर की लड़ाई और कितने दिन चलेगी और उसका परिणाम क्या निकलेगा? कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन तालिबान का पलड़ा भारी है इसमें कोई संदेह नहीं है।

सुना था जो कायर होता है वह युद्ध भूमि से पीठ दिखा कर भागता है। यह कहावत तुमने चरितार्थ कर दी मिस्टर - जो। तुम भी कायर ही निकले। तुम भी अफगानिस्तान से तालिबान के भय से पीठ दिखा कर ही तो भागे हो। तुम्हारे निकम्मे पन अफगानिस्तान की अब्दुल गनी की नकारा सरकार और गद्दार अफगान फौज की कायरता के कारण अधें तालिबान के हाथ मुफ्त में बटेर लग गई है। अफगानिस्तान की निर्दोष जनता बटेर बन गयी है बेचारी। जो आज पिंजड़े में तड़प तड़प कर अपनी जान देने को विवश है।

तुम्हारे हथियारों से तुम पर ही होगा वार

सावधान अमेरिका हो जाओ तैयार

और ताकतवर हो गया है तालिबान

पाकर तुम्हारे नये आधुनिक हथियार।


Updated : 5 Sep 2021 3:17 PM GMT
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