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डॉ राधाकृष्णन का शिक्षा के प्रति अमूल्य योगदान

डॉ पल्लवी शर्मा गोयल

डॉ राधाकृष्णन का शिक्षा के प्रति अमूल्य योगदान
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5 सितंबर का दिन सम्पूर्ण भारतवर्ष में , शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। जैसा कि सभी को विदित है कि इस दिन भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति जो कि भविष्य में भारत के द्वितीय राष्ट्रपति बने, का जन्मदिवस होता है। इस महनीय व्यक्तित्व शिक्षा के प्रति अपने अमूल्य योगदान को देखते हुए सम्पूर्ण भारतवर्ष में 5 सितंबर शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। वर्तमान में जब भारत नई शिक्षा नीति 2020 के क्रियान्वयन की दिशा में निरंतर प्रयासरत है तब शिक्षा और शिक्षक दिवस के नए आयामों को पुनर्स्थापित करने की महती आवश्यकता जान पड़ती है।

शिक्षा पढ़ने, लिखने,स्मरण रखने और प्रभावोत्पादक, रुचिपूर्ण ढंग से ज्ञान को नित नई पीढ़ियों तक पहुँचाने की एक ऐसी संस्कृति है जो मनुष्य को न केवल उसके "स्व" से मिलाती है वरन ज्ञान का एक ऐसा नया आयाम मनुष्य के समक्ष प्रस्तुत करती है जो उसे कुछ नया सोचने और क्रियान्वित करने को प्रेरित करता है यहां महत्वपूर्ण यह है कि उस ज्ञान का वर्तमान पीढ़ी से भविष्य की कोपलों को संचारित करने का माध्यम कैसा हो? वर्तमान परिदृश्य में जब कोरोना काल की विसंगतियों का सामना करने के लिए , " ऑन लाइन शिक्षण" एक विकल्प के तौर पर उभरा है तो क्या समय, काल, परिस्थितियों के वशीभूत होकर शिक्षक अथवा गुरु की महत्ता कम हो गई है?

आइए इसे एक नई दृष्टि से समझने का प्रयास करें: लेबनानी-अमेरिकन , दार्शनिक और लेखक ख़लील जिब्रान अपनी विश्वविख्यात कृति ' द प्रोफेट' में शिक्षा , शिक्षक एवम शिष्य की परिकल्पना को लेकर कहते हैं कि "कोई भी व्यक्ति अथवा गुरु किसी अन्य जिज्ञासु के समक्ष उसमें ( शिष्य में) ख़ुद में, परतों में छुपे , दबे ,ढके ज्ञान को उसको स्वयं से परिचित कराने के सिवाय कुछ भी नया नहीं करता।"

अर्थात ज्ञान तो वहां मौज़ूद ही है पर दबा हुआ है, अज्ञानता की परतों में। इसका आशय यह स्पष्ट रूप से मुखर होता है कि शिष्य की जिज्ञासा का निराकरण करने वाला व्यक्ति ही एक अच्छा शिक्षक, गुरु हो सकता है एवम किसी भी युग में गुरु की महत्ता कम नहीं हो सकती है।

अगर हमारी धार्मिक चेतनाओं का अध्ययन करें तो हम पाते हैं कि जब धनुषयज्ञ में श्री राम शिवधनुष भंग करते हैं और परशुरामजी के कोप को अपनी मधुर वाणी से शमित करने का प्रयास करते हैं तो परशुराम जी स्वयं आखिर में अपना धनुषबाण श्री राम को देते हुए कहते हैं...

"राम रमापति कर धनु लेहु..

खेचऊ मोर मिटे संदेहु.."

और जब चाप स्वयं ही श्रीराम के करकमलों में चला जाता है

"सुनत चाप आपहि चलि गयहु..

परसुराम मन बिसमय भयऊ.."

तो यहां परसुराम जी का "विस्मय" उनकी अज्ञानता के प्रकाश में बदल जाने से ही है ।यहां श्री राम उनके गुरु ही हैं।

तुलसी का मानस ऐसे अनेकों उदाहरणों से ओतप्रोत है। और इन तमाम उद्धरणों से यह स्पष्ट होता है कि एक सजग गुरु , उसके स्वयं के ज्ञान के भंडार में अपने शिष्य को प्रवेश नहीं कराता वरन शिष्य को उसके स्वयं के ज्ञान से परिचित करा देता है।

एक खगोलशास्त्री अपनी खगोलविज्ञान की समझ को अपने शिष्यों को बता सकता है पर अपनी स्वयं की समझ अपने शिष्यों को हस्तांतरित नहीं कर सकता। एक संगीतकार सारे ब्रह्मांड में व्याप्त संगीत का गायन कर सकता है पर अपने शिष्यों को वह " कान" नहीं दे सकता जो संगीत की आत्मा को पकड़ सकते हैं और ऐसा इसलिए है कि गुरु अपने दृष्टिकोण को समझने वाले पंखों से अपने शिष्यों को उड़ान नहीं भरवा सकता पर अगर शिष्य में उसके स्वभाव के अनुरुप किसी भी विधा को धारण करने की अंतर्चेतना सुप्त रूप में मौजूद है तो वह अपने दृष्टिकोण से उस सुप्त अन्तर्चेतना को प्रस्फुटित कर अपने शिष्य को अज्ञानता के अंधकार से बाहर ला सकता है।

एक समर्थ गुरु और जिज्ञासु शिष्य की जुगलबंदी, ज्ञान की किसी भी विधा को अपने उत्कृष्ट स्तर पर ले जा सकती है एवम नित्यनूतन रहस्यों को मानवता से रूबरू कराती है। यह संभव हो सकता है कि शिक्षा का दायरा समय समय पर संकीर्ण हो जाय पर नएपन की गुंजाइश सभ्यताओं की शुरुआत से ही अनवरत मौज़ूद है और इसी नएपन को नितनिरन्तर एक जिज्ञासु द्वारा खोजा जाता रहा है जिसमें एक सामर्थ्यवान गुरु निरंतर महती भूमिका निभाता है। भारतवर्ष में इस क्रम में हर 5 सितंबर को मनाया जाने वाला शिक्षक दिवस न केवल योग्य गुरुओं को आदरांजलि है वरन एक योग्य शिष्य अथवा जिज्ञासु की अंतहीन खोज भी है।

(डॉ पल्लवी शर्मा गोयल, सहायक प्राध्यापक, अंग्रेजी, शाशकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयशिवपुरी (मध्यप्रदेश)

Updated : 5 Sep 2022 10:27 AM GMT

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