चर्च से जुड़ी ऐतिहासिक सच्चाई: नाराजगी में दोहरा मानदंड

सभी पाठकों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। समय एक जीवंत ताने-बाने की तरह है, जहां अतीत, वर्तमान और भविष्य एक-दूसरे से निरंतर संवाद करते रहते हैं। मेरा आज का कॉलम अनायास ही पिछले लेख की निरंतरता बन गया है, जहां 2025 की चर्चाएं, आशंकाएं और अपेक्षाएं नए वर्ष में प्रवेश कर रही हैं।
पिछले सप्ताह प्रकाशित मेरे लेख पर व्यक्तिगत प्रतिक्रिया देते हुए मेरी एक आईएएस मित्र, जो मुख्य सचिव पद से सेवानिवृत्त हो चुकी हैं, ने अपने प्रशिक्षण काल की एक स्मृति मुझसे साझा की। उनके अनुसार, अकादमी में दिसंबर के दिनों ईसा मसीह के जन्म से संबंधित ‘क्रिसमस कैरल’ गाना एक सहज सांस्कृतिक गतिविधि थी। उनकी शिकायत यह थी कि मैंने विश्व हिंदू परिषद के उस रुख का उल्लेख नहीं किया, जिसमें वे क्रिसमस आयोजनों का विरोध करते हैं। निसंदेह, उनकी सद्भावना सराहनीय है, लेकिन यह एक गहरे सांस्कृतिक असंतुलन की ओर भी संकेत करती है।
मजहबी बंधनों से परे जिस संस्थागत तत्परता और उत्साह का प्रदर्शन क्रिसमस पर होता है, क्या वही वातावरण कृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, हनुमान जयंती या सिख गुरुओं के गुरुपर्वों पर भी देखने को मिलता है? क्या सरकारी या अर्द्ध-सरकारी संस्थानों में भजन या शबद कीर्तन भी उसी सहजता से होते हैं, जैसी क्रिसमस कैरल गाने में दिखाई देती है? अक्सर इसका उत्तर ‘नहीं’ में ही मिलता है। यही विरोधाभास भारत में पंथनिरपेक्षता की व्यवहारिक समझ की दरारों को उजागर करता है।
मैं ऐसे प्रश्न उठाकर क्रिसमस या ईसाई आस्था का विरोध नहीं कर रहा हूं। असल मुद्दा सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सभ्यतागत आत्मबोध का है। जब बहुसंख्यक समाज का एक वर्ग अपने ही मजहबी-सांस्कृतिक प्रतीकों को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने में संकोच करता है, तो इसकी जड़ें उस मानसिक औपनिवेशवाद में मिलती हैं, जिसमें अपनी पहचान, संस्कृति और परंपरा के प्रति उदासीनता और हीनभावना का भाव निहित होता है। सच्चा ‘सह-अस्तित्व’ तभी संभव है, जब सभी परंपराओं को समान सम्मान और स्थान मिले।
हाल ही में देश के कुछ हिस्सों में क्रिसमस आयोजनों को निशाना बनाने की चिंताजनक घटनाएं सामने आई हैं। छत्तीसगढ़ के रायपुर स्थित एक मॉल में बनाए गए सांता क्लॉज की प्रतिमा तोड़ दी गई। असम के नलबाड़ी में कुछ लोगों ने क्रिसमस कार्यक्रमों में बाधा डाली। ओडिशा में विक्रेताओं के साथ बदसलूकी हुई, और मध्यप्रदेश, दिल्ली आदि में भी टकराव के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए।
हिंदू परंपराओं के नाम पर की गई किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ या धमकी पूरी तरह निंदनीय है। यह उस कालजयी सभ्यता के मूल स्वभाव के विरुद्ध है, जिसमें सह-अस्तित्व और बहुलतावाद का दर्शन अंतर्निहित है। समग्र हिंदू समाज के साथ-साथ ईसाई पादरियों के एक वर्ग और स्वयंभू साम्प्रदायिक उदारवादियों को भी आत्मचिंतन करना चाहिए। केवल इन घटनाओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक ले जाना और भारत व हिंदू समाज को असहिष्णु एवं उत्पीड़क बताना चयनात्मक आक्रोश का उदाहरण है।
जब अलग-थलग घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है और दुनिया के अन्य हिस्सों में मजहबी स्वतंत्रता पर कहीं अधिक गंभीर हमलों पर चुप्पी साध ली जाती है, तो इससे सौहार्द नहीं, बल्कि अविश्वास पैदा होता है।
गत 25 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली स्थित कैथेड्रल चर्च में आयोजित क्रिसमस कार्यक्रम में शामिल हुए। वहां प्रेम, शांति और करुणा पर उनका वक्तव्य भारत की सभ्यतागत परंपरा के अनुरूप था। हालिया वर्षों में इस्टर, कैथोलिक बिशप सम्मेलन और प्रधानमंत्री आवास पर आयोजित क्रिसमस कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी इस निरंतरता को दर्शाती है। जिस समावेशी भारतीय सभ्यता ने सदियों पहले अपने-अपने देशों में मजहबी यातनाओं के शिकार यहूदियों, पारसियों, सीरियाई ईसाइयों और मुस्लिम व्यापारियों को शरण दी, वहां क्रिसमस के प्रति वैरभाव रखना—जिसकी प्रासंगिकता पर मध्यकाल तक सवाल उठ चुके थे-दुखद है।
इस विषय का एक और परिप्रेक्ष्य भी है, जिसे जानना आवश्यक है। हालिया वर्षों में बढ़ते जिहादी खतरों के कारण यूरोप के कई ईसाई-बहुल देशों-फ्रांस, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया सहित-में क्रिसमस और नववर्ष समारोह सीमित कर दिए गए हैं या कड़ी सुरक्षा में आयोजित किए जा रहे हैं। भारत में सदियों की जिहादी हिंसा और वैचारिक टकराव के बावजूद ऐसी स्थिति नहीं है।
भारत में ईसाइयत का आगमन तीन चरणों में हुआ। पहला चरण 52 ईस्वी में सेंट थॉमस से जुड़ा माना जाता है, जिनसे केरल के सीरियाई ईसाई समुदाय का उदय हुआ। दूसरा चरण हिंसक रहा, जो 1498 में वास्को द गामा के आगमन और पुर्तगाली साम्राज्यवाद के साथ शुरू हुआ। 16वीं शताब्दी के मध्य में फ्रांसिस जेवियर की क्रूरता और ‘गोवा इनक्विजिशन’ के दौरान मंदिरों का ध्वंस, जबरन मतांतरण और सामाजिक दमन हुआ। वैटिकन के निर्देश न मानने पर सीरियाई ईसाइयों को भी प्रताड़ित किया गया।
इतिहासकारों के अनुसार, गोवा में जहां कभी मंदिर हुआ करते थे, वहां चर्च बना दिए गए। हिंदू पुरोहितों को निष्कासित किया गया और स्थानीय तीज-त्योहारों पर रोक लगा दी गई। ब्रिटिश आक्रमण के पश्चात चर्च और औपनिवेशिक सत्ता के गठजोड़ ने इस प्रक्रिया को और अधिक कुटिलता से आगे बढ़ाया। 1857 के विद्रोह में नव-मतांतरित ईसाइयों का अंग्रेजों के साथ खड़ा होना और कालांतर में चर्चों को अकूत संपत्तियां मिलना-इस ऐतिहासिक सच्चाई की याद दिलाता है। यहां तक कि 1919 के भयावह जलियांवाला बाग नरसंहार पर भी चर्च के समर्थन के प्रमाण मिलते हैं।
यह स्वीकार्य है कि अतीत में उलझे रहना समाधान नहीं है, लेकिन एक ईमानदार स्वीकारोक्ति और प्रायश्चित आवश्यक है। रोमन कैथोलिक चर्च ने कनाडा, फ्रांस और आयरलैंड जैसे देशों में अपने मजहब-प्रेरित ऐतिहासिक दुराचारों और पादरियों द्वारा लाखों बच्चों व महिलाओं के यौन शोषण पर सार्वजनिक रूप से कई बार माफी मांगी है। प्रश्न यह है कि क्या नैतिक मानदंड सभी पर समान रूप से लागू होंगे?
जो विकृत समूह हिंदू समाज से हर घटना पर सामूहिक माफी की मांग करता है, क्या वे वैटिकन और चर्च से भारत में मध्यकालीन और औपनिवेशिक अत्याचारों के लिए क्षमा-याचना तथा आज भी जारी आक्रामक मतांतरण गतिविधियों पर विराम की मांग करने को तैयार हैं? किसी सभ्यता का भविष्य चयनात्मक आक्रोश से नहीं, बल्कि निष्पक्ष आत्ममंथन से सुरक्षित होता है। भारत का चिर-परिचित, अनादिकालीन बहुलतावाद तभी अक्षुण्ण रहेगा, जब सभी ऐतिहासिक अपराधों की निंदा बिना पक्षपात के की जाए और उन्हें न्याय की कसौटी पर कसा जाए। क्या ऐसा संभव है?
