भारतीय आक्रामकता के चलते चीन ने घुटने टेक दिए थे

राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ करते राहुल गांधी
गलतबयानी के आदी नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक बार फिर संसद में गलत बयान देकर देश की सीमाई सुरक्षा से खिलवाड़ किया है। राहुल गांधी को यह तक ठीक से ज्ञात नहीं है कि जिस भूमि विवाद को लेकर वे संसद में बयान दे रहे हैं, वह डोकलाम नहीं बल्कि गलवान घाटी में चीन के साथ हुए सैनिक टकराव का मामला है।
दरअसल, राहुल गांधी यह जताना चाहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मुद्दे पर चीन के सामने झुक गए हैं और चीन ने भारत की जमीन पर कब्जा कर लिया है। यही नहीं, इस विषय में राहुल यह तक कह चुके हैं कि चीनी सेना ने भारतीय सैनिकों को पीटा था। इस कथन को लेकर शीर्ष न्यायालय उन्हें फटकार भी लगा चुका है। इसके बावजूद उन्हें राष्ट्रीय अस्मिता से खेलने और सैनिकों का अपमान करने में कोई संकोच नहीं होता।
जबकि सच्चाई यह है कि भारतीय आक्रामकता के सामने चीन को घुटने टेकने पड़े थे और वह अपनी सेना की वापसी के लिए मजबूर हुआ था। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लोकसभा में चर्चा के दौरान उस समय जोरदार हंगामा हुआ, जब राहुल गांधी ने पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल नरवणे की एक अप्रकाशित किताब का हवाला देते हुए भारत-चीन विवाद पर सतही बयान दिया।
रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और गृहमंत्री अमित शाह ने इस बयान का कड़ा विरोध करते हुए सदन को गुमराह करने का आरोप लगाया। राजनाथ सिंह ने कहा कि अप्रकाशित किताब या अप्रमाणित सामग्री का हवाला नहीं दिया जा सकता। इस तरह के उद्धरण सदन में भ्रम फैलाते हैं। अमित शाह ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि राहुल गांधी किसी मैगजीन की रिपोर्ट के आधार पर गलत तथ्य प्रस्तुत कर रहे हैं।
राहुल गांधी का कहना था कि मोदी सरकार ने चीनी सेना द्वारा भारतीय भूमि पर कब्जे के विरोध में पर्याप्त साहस नहीं दिखाया। जबकि हकीकत यह है कि चीन को भारतीय सेना के कड़े रुख का सामना करना पड़ा, जिसके चलते उसे बातचीत के जरिये समझौते के लिए मजबूर होना पड़ा। इसी कारण गलवान ही नहीं, बल्कि लद्दाख के कुछ अन्य क्षेत्रों में भी यथास्थिति बहाल हुई। जनरल नरवणे भी इस संबंध में कई बार वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर चुके हैं।
भारतीय सैनिकों की आक्रामकता के चलते चीन ने पैंगोंग झील के उत्तरी और दक्षिणी छोर से न केवल अपनी सेना को पीछे हटाया, बल्कि यह भी स्वीकार किया कि गलवान घाटी में भारत और चीन की सेनाओं के बीच हुई झड़प में उसके पांच सैनिक मारे गए। हालांकि रूस की खुफिया एजेंसियों और अन्य स्रोतों के अनुसार चीन के 45 से 70 सैनिकों के मारे जाने की जानकारी सामने आई थी।
इन सैनिकों के शव ले जाने के लिए चीनी सेना ने कई वाहनों का इंतजाम किया था और उनके अंतिम संस्कार के वीडियो भी सामने आए थे। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के एक कमांडर समेत अन्य सैनिकों के मारे जाने की पुष्टि चीन सरकार के प्रमुख समाचार पत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने भी की थी। इन्हें चीन के केंद्रीय सैन्य आयोग द्वारा वीरता पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था।
15 जून 2020 को घटी इस घटना में भारतीय सेना की बिहार रेजिमेंट के कर्नल संतोष बाबू को बलिदान देना पड़ा था। उन्हें भारत सरकार ने मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया था। भारतीय सेना के ‘स्नो लेपर्ड’ ऑपरेशन के चलते दोनों देशों के बीच देपसांग, हॉट स्प्रिंग्स और गोगरा क्षेत्रों से सेनाओं को पीछे हटाने पर वरिष्ठ कमांडर स्तर की बातचीत के बाद सहमति बनी थी।
भारतीय नेतृत्व की आक्रामकता और आत्मनिर्भरता की ठोस व निर्णायक राजनीति के चलते यह संभव हो पाया। चीनी अधिकारियों को यह घोषणा करनी पड़ी कि चीन अपनी सेना पीछे हटाने को राजी हो गया है। इसके अगले दिन रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में स्पष्ट किया था कि दोनों देशों की सेनाओं की वापसी के समझौते के तहत भारत को एक इंच भी जमीन नहीं गंवानी पड़ी है।इस समझौते में तीन शर्तें तय की गई थीं। पहली, दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का सम्मान करेंगे। दूसरी, कोई भी देश एलएसी की स्थिति को एकतरफा बदलने की कोशिश नहीं करेगा। तीसरी, दोनों देश पूर्व में हुए सभी समझौतों का पालन करेंगे।
यह समझौता इस बात का प्रमाण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के कड़े तेवरों के चलते चीन की अकड़ कमजोर पड़ी। यह पहली बार था जब चीन ने लिखित रूप में सैन्य वापसी की शर्तों को स्वीकार किया। उस समय रक्षा मंत्रालय ने पैंगोंग झील क्षेत्र से सैनिकों की वापसी को लेकर स्पष्ट किया था कि भारतीय भूभाग फिंगर-4 तक ही नहीं, बल्कि भारत के मानचित्र के अनुसार फिंगर-8 तक है।
पूर्वी लद्दाख में राष्ट्रीय हितों और भूमि की रक्षा इसलिए संभव हो पाई, क्योंकि सरकार ने सेना को खुली छूट दी थी। सेना ने अपने 20 जवानों का बलिदान देकर राष्ट्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता सिद्ध की। शायद इसी कारण रक्षा मंत्रालय को कहना पड़ा था कि सैन्य बलों के बलिदान से प्राप्त उपलब्धियों पर सवाल उठाने वाले वास्तव में इन वीर सैनिकों का अपमान कर रहे हैं।
भारत के मानचित्र में वह 43 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र भी शामिल है, जो 1962 से चीन के अवैध कब्जे में है। इसी कारण राजनाथ सिंह ने संसद में कहा था कि भारतीय दृष्टिकोण से एलएसी फिंगर-8 तक है, जिसमें चीन के कब्जे वाला इलाका भी शामिल है।इसके बावजूद राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सड़क से लेकर संसद तक अनर्गल बयान देते रहते हैं। उनका यह कहना कि फिंगर-3 से फिंगर-4 तक की जमीन चीन को सौंप दी गई है, न केवल तथ्यहीन है बल्कि सेना का मनोबल तोड़ने वाला भी है।
लोकतंत्र में सवाल उठाना गलत नहीं है, लेकिन सवाल तथ्यहीन और संदर्भहीन नहीं होने चाहिए। राहुल गांधी को यह भी याद रखना चाहिए कि 1962 में चीन ने भारत की जो जमीन हड़पी थी, उस समय केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार थी। लोकतंत्र में सवाल उठाना बुरी बात नहीं है, लेकिन सवाल बेतुके और सम्यहीन नहीं होने चाहिए?
