ब्रिक्स बनाम डॉलर- अमेरिकी चुनौती या सिर्फ सपना

यूनिट और डी डॉलराइजेशन की बातें अच्छी लगती है। लेकिन 70 साल की ताकत को हराने के लिए सिर्फ घोषणाएं काफी नहीं। डॉलर की ताकत को चुनौती मिलना शुरू हो गई है, ब्रिक्स देश कहते है कि वे नई मुद्रा बनाएंगे, स्विफ्ट को खत्म करेंगे, और अमेरिका के वित्तीय वर्चस्व को तोड़ देंगे। पिछले साल डॉलर की कीमत 10 फीसदी गिर गई है। सोने की कीमत 6,000 डॉलर प्रति औंस पार कर गई है। ये आंकड़े बड़े दिखते हैं। सवाल आज यह है की ब्रिक्स में शामिल देश डॉलर के वर्चस्व को खत्म कर देंगे? यह पहली बार नहीं है जब उभरते देशों ने मौजूदा व्यवस्था को उखाड़ने की बड़ी योजनाएं बनाई है। इतिहास में ऐसे कई प्रयास हुए हैं जैसे सोवियत संघ का रूवल, यूरो का सपना, जापान का येन और चीन का युआन।
लेकिन ये सब राजनीतिक, आर्थिक, सैन्य शक्ति और एक दूसरे के बीच अविश्वास को लेकर विफल हो गए। और उन्होंने यह भी नहीं सम्क्षश था कि जिस ताकत के खिलाफ वे लड़ रहे थे, वह कितनी गहरी थी क्योंकि डॉलर की ताकत सिर्फ पैसे की बात नहीं है। यह 70 साल पुरानी एक ऐसी व्यवस्था है जो दुनिया की हर संस्था, व्यापार, यहां तक कि लोगों की सोच में भी घुस चुकी है। इसके विकल्प सोचना मुश्किल सा लगता है। लेकिन ब्रिक्स देश इसे बदलना चाह रहे हैं लेकिन सफल होंगे या नहीं, यह बिल्कुल अलग बात है.
डॉलर की ताकत कितनी गहरी है-जब हम डॉलर की ताकत की बात करते हैं, तो लोग अक्सर सिर्फ आंकड़े देखते हैं। जैसे कि दुनिया के 90% लेनदेन डॉलर में देते हैं। देशों के केंद्रीय बैंकों के 56% भंडार डॉलर में हैं। लेकिन असली ताकत इन आंकड़ों में नहीं है। असली ताकत उस पूरी व्यवस्था में है जो अमेरिका ने बनाई है। अमेरिका ने सिर्फ एक मुद्रा नहीं बनाई उसने पूरा ढांचा बनाया है जओ डॉलर को जरूरी बना देता है क्योंकि आईएमएफ और विश्व बैंक तय करते हैं कि देश कैसी आर्थिक नीतियां अपनाएं। स्विफ्ट कंट्रोल करता है कि अंतरराष्ट्रीय भुगतान कैसे होंगे।
अमेरिकी रेटिंग एजेंसियां तय करती हैं कि कौन सा देश कर्ज लेने लायक है। यह एक ऐसी ताकत है जो चुपचाप काम करती है और जोर-जबरदस्ती नहीं करती, बल्कि उसकी जगह पूरे खेल के नियम ही ऐसे बनाती है कि सभी को वही करना पड़ता है जो अमेरिका चाहता है। आप अंतरराष्ट्रीय व्यापार कर सकते हैं, लेकिन डॉलर चाहिए। आप विदेशी निवेश ला सकते हैं. लेकिन अमेरिकी संस्थाओं से मंजूरी बाहिए। और अगर अमेरिका नाराज हो गया, तो वह आपको पूरी व्यवस्था से बाहर कर सकता है जैस्य रूप्स, ईरान औरउत्तर कोरिया के साथ हुआ।
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि यह खुद को जरूरी दिखाने में सफल रही। 70 साल में एक पूरी पौड़ी यह मानते हुए बड़ी हुई है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए एक मुख्य मुद्रा जरूरी है, और वह सिर्फ डॉलर हो सकती है। यह सिर्फ पैसे की निर्भरता नहीं है यह सोच की निर्भरता है। जब एक व्यवस्था इतनी गहराई से बैठ जाए कि लोग विकल्प सोच भी नहीं सकते, तो वह सिर्फ ताकत नहीं रहती, विचारधारा बन जाती है।
ब्रिक्स की बड़ी योजनाएं:ब्रिक्स देश इसी सोच को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। अक्टूबर 2025 में उन्होंने 'यूनिट', नाम की एक नई डिजिटल मुद्रा बनाई जो सोने पर आधारित है और डॉलर को टक्कर देने के लिए है। 11 देशों ने मिलकर स्विफ्ट के विकल्प के रूप में एक नई भुगतान व्यवस्था बनाई। रूस और चीन ने कहा कि अब वे अपने 90% व्यापार अपनी ही मुद्राओं में करेंगे। चीन अब अपने विदेशी व्यापार का एक तिहाई युआन में कर रहा है 2022 में यह 20% था। ये छोटी-मोटी बातें नहीं हैं। आंकड़े एक कहानी बताते हैं। ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार में डॉलर की हिस्सेदारी पिछले साल 65% से गिरकर 35% हो गई है। रूस और चीन ने अपने 244 अरब डॉलर के व्यापार का 90% स्थल और युआन में किया।
सोने की कीमत 6,000 डॉलर प्रति औस से ऊपर जाना बताता है कि निवेशक डॉलर से दूर जा रहे हैं। यहां तक कि जेपी मॉर्गन जैसे बड़े बैंक कहते हैं कि डॉलर 2026 के मध्य तक 3% और गिरेगा। दशकों में पाहली बार, डॉलर का एकाधिकार कमजोर दिख रहा है। लेकिन घोषणाएं करना एक बात है, उन्हें पूरा करना बिल्कुल दूसरी बात। 70 साल पुरानी व्यवस्था को चुनौती देना बहुत मुश्किल है। ब्रिक्स देशों के अपने गंभीर झगड़े हैं जैसे की चीन और भारत एक दूसरे को प्रतिद्वंद्वी मानते हैं। भारत को डर है कि अगर ब्रिक्स मुद्रा बनी, तो चीन उस पर हावी हो जाएगा क्योंकि चीन की
अर्थव्यवस्था ब्रिक्स की कुल अर्थव्यवस्था का 70% से ज्यादा है। भारत डॅॉलर के वर्चस्व की जगह युआन का वर्चस्व नहीं बाहता। रूस की अर्थव्यवस्था युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों से बुरी तरह कमजोर हो गई है और वह चीन पर निर्भर हो गया है। ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका आर्थिक रूप से छोटे हैं।
ब्रिक्स देश इस बात में एकजुट हैं कि वे अमेरिकी वर्चस्व नहीं चाहते लेकिन वे इस बात में एकमत नहीं हैं कि क्या चाहते हैं। इतनी टूटी-फूटी नींव पर मजबूत विकल्प बनाना आसान नहीं होगा। अमेरिका के आक्रामक तरीकों से ब्रिक्स को मजबूती दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका ने ही ब्रिक्स को मजबूत करने में मदद की है। जब वाशिंगटन ने आर्थिक प्रतिबंधों को हथियार बनाया, जब उसने रूप्स को स्विफ्ट से काट दिया, जब उसने ईरान के साथ व्यापार करने वालों को धमकाया तब उसने दुनिया को एक साफ संदेश दियाः अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था पर भरोसा करना खतरनाक है।
चीन ने सोचा कल अमेरिका हमारे साथ भी ऐसा कर सकता है। भारत ने समझा- हमें अपनी शक्ति के लिए विकल्प चाहिए। यहां तक कि यूरोप में शामिल देश भी असहज हो गए। जैसा कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने कहर, हम ॉलर से नहीं लड़ रहे। लेकिन अगर वे हमें इसका इस्तेमाल नहीं करने देंगे, तो हम दूसरे रास्ते खोजेंगे।'
