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जेेएनयू, एएमयू : प्रचार के लिए... दांव पर देश

अजय पाटिल

जेेएनयू, एएमयू : प्रचार के लिए... दांव पर देश

कौन नायक या नायिका बनना नहीं चाहेगा। एक बेहद सम्माननीय संबोधन है। नायक या नायिका सभी के आदर्श होते हैं। देश के बच्चे युवा इनका अनुकरण करते हैं। उनके जैसा बनना चाहते हैं। इनके प्रत्येक क्रियाकलापों पर बच्चों व युवाओं की नजर होती है। यही कारण है कि इन नायकों की नैतिक जिम्मेदारी है कि ये अपने चाल चलन, आचार व्यवहार में बेहद सचेत रहें। ऐसा कुछ न करें जिससे इनको नायक बनाने वालों को ठेस पहुंचे। चलिये अब चर्चा करते हैं बॉलीवुड की शीर्ष नायिका दीपिका पादुकोन की। उनके जेएनयू के छात्रों के साथ खड़े होने की। क्या उनका यह आचरण एक नायिका जैसा है?

जेएनयू, एएमयू में नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ चल रहा आंदोलन क्या समग्र छात्र आंदोलन है? यह एक विचारणीय प्रश्न है। मैं तो नहीं मानता कि यह एक छात्र आंदोलन है। भारत में करीब 4 करोड़ छात्र स्नातक , स्नातकोत्तर व डॉक्टरेट स्तर की शिक्षा ले रहे हैं। जबकि जेएनयू में मात्र साढ़े आठ हजार छात्र पढ़ते हैं। इनमें से एक छोटा सा हिस्सा ही वामपंथी सियासत की कठपुतली है। क्या ये मुट्ठी भर उपद्रवी देश के चार करोड़ छात्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं?

भारत में करीब 1000 विश्वविद्यालय, 334 निजी विश्वविद्यालय, 126 डीम्ड विश्वविद्यालय, 142 तकनीकी विश्वविद्यालय, 63 कृषि विश्वविद्यालय, 58 चिकित्सा विश्वविद्यालय, 24 कानून विश्वविद्यालय हैं। ( ये सभी करीबी आंकड़े हैं पुष्ट नहीं) इनसे संबंधित कऱीब चालीस हजार महाविद्यालय हैं। फिऱ सिर्फ जेएनयू व एएमयू को ही इस अधिनियम से आपत्ति क्यों?

जेएनयू के तथाकथित छात्र आंदोलन का समर्थन करने से पहले दीपिका को इस तथ्य पर चिंतन करना चाहिए था। दीपिका को देश के चार करोड़ महाविद्यालयीन छात्र अपनी नायिका मानते हैं। क्या उनका यह आचरण उन सभी की भावनाओं से न्याय करता है? क्या कन्हैया कुमार जो कि सर्वमान्य छात्र नेता तो कतई नहीं हैं के पीछे खड़े होने से, उनका समर्थन करने से बाकी छात्रों को ठेस नहीं पहुंची होगी जिन्होने दीपिका को नायिका बनाया। जो एक उम्मीद करते हैं, उनकी नायिका का सार्वजनिक जीवन में आचरण एक नायिका जैसा हो।

दीपिका ने सिद्ध कर दिया कि देश से उन्हें क्या लेना देना। इनके लिए फिल्म का प्रमोशन सबकुछ है। आप कहाँ खड़े हैं, किसके साथ हैं आपको इस बारे में विचार करना चाहिए था। फिल्म का प्रमोशन करने में कोई बुराई नहीं हैं। आपकी वर्तमान फिल्म महिला सशक्तिकरण पर आधारित है। अत: अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए आपको किसी पीडि़त के पीछे खड़े दिखना चाहिए था। पर आपको एक कठपुतली की तरह नचाने वालों को, आपकी पी आर कंपनी को पता था कि इससे आपकी फिल्म को इतनी प्रसिद्धि नहीं मिलती।

क्या दीपिका को देश के छात्रों से वास्तव में कोई हमदर्दी है? क्या वो भविष्य में भी छात्र आंदोलनों में हिस्सा लेती रहेंगी? क्या फिल्मी पर्दे की ये नायिका सड़कों पर होने वाले छात्रों के संघर्षों में भी छात्रों की नायिका बनेंगी? कदापि नहीं। एक औसत समझ रखने वाला व्यक्ति भी इस बात को समझता है। व्यावसायिक हित साधने के लिए देश के किसी संवेदनशील मुद्दे को हथियार बनाना, किसी विवाद को जन्म देकर प्रसिद्धी पाना बॉलीवुड की एक परंपरा बन चुकी है। दीपिका का जेएनयू जाना उसी रणनीति का एक हिस्सा मात्र है।

दीपिका न्यायपालिका से भी बुद्धिमान व त्वरित निकलीं। वामपंथियों को सही ठहरा दिया। आपने उन छात्रों के हितों के बारे में विचार नहीं किया जिनके रजिस्ट्रेशन बाधित किये जा रहे हैं।

पर आपका एकमेव ध्येय तो फि़ल्म का प्रमोशन मात्र था। आप जिस वामपंथ का समर्थन करती दिख रही हैं आपको तो उनकी काली करतूतों के बारे में पता भी नहीं होगा। आप जिस मामले के निष्कर्ष पर पहुंच गईं वो अभी सबजूडिस है। अभी जांच चल रही है। पर सही कौन गलत कौन आपके फैसले ने कर दिया। घायल तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र भी हुए थे पर आपके पूर्वाग्रह ने यह सब नहीं देखने दिया। आज़ादी के नारे भले ही लगते रहे पर वो आपको सुनाई नहीं दिए होंगे। आपको तो बस फिल्म का प्रमोशन दिख रहा था।

देश की जनता भी विचित्र है। आपकी फिल्म को सेकड़ों करोड़ का बिजनेस देगी। यही हुआ था पद्मावत के मामले में भी। संजय लीला भंसाली की इस फिल्म की कुल लागत 215 करोड़ थी और विवाद के बाद इसने व्यवसाय किया कुल 585 करोड़ का।

देश की जनता की इस कमजोरी को ये दीपिकाएँ और उनकी पी आर कंपनी भली भांति जानतीं हैं। इसका भरपूर फायदा उठातीं हैं। जनता की भावनाओं से खेलतीं हैं। और अंत में विजय इनकी ही होती है। बग़ैर किसी खर्चे के फिल्म को प्रसिद्धी।

ये सब चलता रहेगा ये देश की भावनाओं से खेलते रहेंगे। आपकी हमारी भावनाओं को लहूलुहान कर अपने व्यावसायिक हित साधते रहेंगे। क्योंकि इनके लिए राष्ट्रहित से व्यावसायिक हित प्रथम हैं। सर्वोपरि हैं।

(लेखक अंग्रेजी के विख्यात शिक्षक व स्वतंत्र राष्ट्रीय टिप्पणीकार हैं)

Updated : 2020-01-12T05:45:40+05:30
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