कला का संवाद : अपने सुरों के साथ दूसरों के सुरों को भी सुनना सीखें

कला का संवाद : अपने सुरों के साथ दूसरों के सुरों को भी सुनना सीखें
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डॉ. अंजना झा

कला, विशेषकर संगीत और नृत्य, केवल प्रदर्शन नहीं — साधना है। यह वह पवित्र साधना है जिसमें कलाकार अपनी आत्मा को सुर, ताल और भाव के माध्यम से विश्व के साथ जोड़ता है। भारतीय परंपरा में कला का अर्थ केवल “स्वयं को व्यक्त करना” नहीं, बल्कि “सर्व के साथ सामंजस्य स्थापित करना” है।


किन्तु आज के समय में एक विचलन दिखाई दे रहा है। कलाकार और विद्यार्थी अक्सर केवल “अपने स्वर” को ही सुनना चाहते हैं। दूसरों की कला, उनके स्वर या उनके विचारों के प्रति सहनशीलता और सम्मान की भावना कम होती जा रही है। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से तब चिंता का विषय बन जाती है जब यह हमारे संगीत संस्थानों में घर कर जाती है — जहाँ कला के साथ-साथ संस्कार भी दिए जाते हैं।

कला प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग है

गायन, वादन और नृत्य — ये तीनों कलाएँ एक ही ईश्वर के तीन रूप हैं। जब गायक अपने स्वर में नर्तक की गति को महसूस करे, और वादक दोनों के भावों के साथ तादात्म्य स्थापित करे, तब एक दिव्य अनुभव उत्पन्न होता है।

परंतु जब एक कलाकार दूसरे की कला को हीन दृष्टि से देखता है, या सम्मान नहीं देता, तो उस सामंजस्य की डोर टूट जाती है।

कला कभी “प्रतिस्पर्धा” नहीं रही — वह “सह-यात्रा” है।

भारतीय संस्कृति का मर्म — सामंजस्य और आदर

हमारे पूर्वजों ने सिखाया था कि कलाकार का सबसे बड़ा आभूषण उसका विनम्र हृदय होता है। गुरु-शिष्य परंपरा की नींव ही “आदर और आभार” पर रखी गई थी।

पर आज जब युवा पीढ़ी कला को केवल मंच या प्रसिद्धि से जोड़ने लगी है, तब उस “संवेदना” की धारा कमज़ोर होती जा रही है जो हमारी संस्कृति की आत्मा रही है।

यदि हम केवल स्वयं को सुनेंगे और दूसरों के स्वर को दबाएँगे, तो यह भारतीय कला की आत्मा को मूक कर देगा।

विचार का समय

अब समय है कि हम पुनः आत्ममंथन करें —

क्या हम अपनी साधना के साथ-साथ दूसरों की साधना का भी सम्मान कर रहे हैं?

क्या हम संवाद के लिए खुले हैं, या केवल अपनी ध्वनि में ही खोए हैं?

कला तभी फलती है जब उसमें सुनने की विनम्रता और सहयोग की भावना हो। अपने सुरों को सजाइए, उन्हें निखारिए — परंतु दूसरों के सुरों को सुनने का साहस भी रखिए।

समापन विचार

“कला का सौंदर्य केवल तब तक जीवित है,

जब तक उसमें संवाद, सहयोग और सम्मान की ध्वनि गूंजती है।”

(अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कत्थक नृत्यांगना जयपुर घराना "टांप ग्रेड" दूरदर्शन कलाकार ,आई.सी. सी.आर, मिनिस्ट्री ऑफ़ कलर फेस्टिवल ऑफ़ इंडिया एब्रॉड सेल भारत सरकार )

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