अटूट आस्था के 1000 वर्ष: आशा का अनंत नाद सोमनाथ…

अटूट आस्था के 1000 वर्ष: आशा का अनंत नाद सोमनाथ…
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ये शब्द सुनते ही हमारे मन और हृदय में गर्व और आस्था की भावना भर जाती है। भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात में, प्रभास पाटन नामक स्थान पर स्थित सोमनाथ, भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतीकरण है।

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् में भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है। ज्योतिर्लिंगों का वर्णन इस पंक्ति से शुरू होता है-

‘सौराष्ट्रे सोमनाथं च…’ अर्थात् ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है। यह इस पवित्र धाम की सभ्यतागत और आध्यात्मिक महत्ता का प्रतीक है।

शास्त्रों में यह भी कहा गया है- ‘सोमलिङ्गं नरो दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।

लभते फलं मनोवाञ्छितं मृतः स्वर्गमवाप्नुयात्॥’

अर्थात् सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। मन की पुण्य कामनाएं पूर्ण होती हैं और मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग को प्राप्त होती है।

दुर्भाग्यवश, यही सोमनाथ-जो करोड़ों लोगों की श्रद्धा और प्रार्थनाओं का केंद्र था—विदेशी आक्रमणकारियों का निशाना बना, जिनका उद्देश्य केवल विध्वंस था।

वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने इस मंदिर पर आक्रमण कर इसे ध्वस्त कर दिया था। यह आक्रमण आस्था और सभ्यता के एक महान प्रतीक को नष्ट करने का हिंसक और बर्बर प्रयास था।

सोमनाथ पर हमला मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में शामिल है। फिर भी, एक हजार वर्ष बाद आज भी यह मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा है। 1026 के बाद समय-समय पर इसे उसके वैभव के साथ पुनः निर्मित करने के प्रयास होते रहे। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1951 में साकार हुआ।

संयोग से वर्ष 2026, सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूर्ण होने का भी वर्ष है। 11 मई 1951 को मंदिर का पुनर्निर्माण सम्पन्न हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ यह समारोह ऐतिहासिक था, जब मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोले गए।

1026 में हुए पहले आक्रमण, वहां के लोगों के साथ की गई क्रूरता और विध्वंस का वर्णन अनेक ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है। जब इन्हें पढ़ा जाता है तो हृदय कांप उठता है। हर पंक्ति में अमानवीयता के निशान मिलते हैं। यह ऐसा दुःख है, जिसकी पीड़ा इतने समय बाद भी महसूस होती है।

हम कल्पना कर सकते हैं कि उस दौर में इसका भारत और लोगों के मनोबल पर कितना गहरा प्रभाव पड़ा होगा। सोमनाथ मंदिर का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत व्यापक था। यह बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित करता था और एक ऐसे समाज की प्रेरणा था, जिसकी आर्थिक क्षमता भी सशक्त थी। हमारे समुद्री व्यापारी और नाविक इसके वैभव की कथाएं दूर-दूर तक ले जाते थे।

सोमनाथ पर आक्रमण और फिर गुलामी के लंबे कालखंड के बावजूद, आज मैं पूरे विश्वास और गर्व के साथ कहना चाहता हूं कि सोमनाथ की गाथा विध्वंस की कहानी नहीं है। यह पिछले 1000 वर्षों से भारत माता की करोड़ों संतानों के स्वाभिमान और अटूट आस्था की गाथा है।

1026 में शुरू हुई मध्यकालीन बर्बरता ने आगे चलकर बार-बार सोमनाथ पर आक्रमण को प्रेरित किया। यह हमारी संस्कृति और आत्मा को गुलाम बनाने का प्रयास था। लेकिन हर बार हमारे पास ऐसे महान पुरुष और महिलाएं थीं, जिन्होंने इसकी रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। और हर बार, पीढ़ी दर पीढ़ी, हमारी सभ्यता ने स्वयं को संभाला, मंदिर को फिर से खड़ा किया और उसे पुनः जीवंत किया।

महमूद गजनवी लूटकर चला गया, लेकिन सोमनाथ के प्रति हमारी भावना को हमसे नहीं छीन सका। सोमनाथ से जुड़ी हमारी आस्था और विश्वास और प्रबल हुआ। उसकी चेतना लाखों श्रद्धालुओं के भीतर सांस लेती रही।

1026 के एक हजार वर्ष बाद, आज 2026 में भी सोमनाथ मंदिर दुनिया को संदेश दे रहा है कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले समाप्त हो जाते हैं, जबकि सोमनाथ हमारे विश्वास का सुदृढ़ आधार बनकर आज भी खड़ा है। वह आज भी हमारी प्रेरणा और शक्ति का स्रोत है।

यह हमारा सौभाग्य है कि हमने उस धरती पर जन्म लिया, जिसने देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूति को जन्म दिया। उन्होंने यह सुनिश्चित करने का पुण्य प्रयास किया कि श्रद्धालु सोमनाथ में पूजा कर सकें।

1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद भी सोमनाथ आए थे। यह अनुभव उन्हें भीतर तक आंदोलित कर गया। 1897 में चेन्नई में दिए गए एक व्याख्यान में उन्होंने कहा.

“दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर और गुजरात का सोमनाथ जैसे मंदिर आपको जीवन के अनगिनत पाठ सिखाएंगे। ये आपको किसी भी संख्या में पढ़ी गई पुस्तकों से अधिक हमारी सभ्यता की गहरी समझ देंगे।

इन मंदिरों पर सैकड़ों आक्रमणों के निशान हैं और सैकड़ों बार इनका पुनर्जागरण हुआ है। ये बार-बार नष्ट किए गए और हर बार अपने ही खंडहरों से पहले की तरह सशक्त होकर खड़े हुए। यही राष्ट्रीय मन है, यही राष्ट्रीय जीवनधारा है।”

आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल ने संभाला। 1947 में दीवाली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया और उन्होंने पुनर्निर्माण की घोषणा की। 11 मई 1951 को मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए।

तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित थे। सरदार पटेल उस ऐतिहासिक दिन को देखने के लिए जीवित नहीं थे, लेकिन उनका सपना साकार हुआ।

सोमनाथ मंदिर का उल्लेख के.एम. मुंशी के योगदान के बिना अधूरा है। उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ: द इटरनल श्राइन’ अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।

जैसा कि मुंशी जी के शीर्षक से स्पष्ट है, हम ऐसी सभ्यता हैं जो आत्मा और विचारों की अमरता में विश्वास रखती है—

‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः।’

सोमनाथ का भौतिक स्वरूप नष्ट हुआ, पर उसकी चेतना अमर रही। इन्हीं विचारों ने हमें हर कालखंड में उठ खड़े होने की शक्ति दी।

आज भारत पर दुनिया की आशा और विश्वास की दृष्टि है। हमारी संस्कृति, योग, आयुर्वेद और नवाचार वैश्विक प्रभाव डाल रहे हैं।

अनादि काल से सोमनाथ जीवन के हर क्षेत्र के लोगों को जोड़ता आया है। आज भी दादा सोमनाथ के दर्शन से मन में ठहराव आता है, आत्मा को भीतर तक छूने वाला अनुभव होता है।

1026 के आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद भी सोमनाथ का समुद्र उसी तेजस्विता से गर्जना करता है। अतीत के आक्रमणकारी इतिहास के फुटनोट बन चुके हैं, जबकि सोमनाथ आज भी आशा का अनंत नाद है।

अगर हजार साल पहले खंडित हुआ सोमनाथ पुनः अपने वैभव में खड़ा हो सकता है, तो हम भी एक समृद्ध भारत का पुनर्निर्माण कर सकते हैं।

जय सोमनाथ।

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