गीता को जानें – कर्म करने के दो साधन- शरीर और मन

गीता को जानें – कर्म करने के दो साधन- शरीर और मन
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ओमप्रकाश श्रीवास्तव

अभी तक हमने देखा कि कर्म किए बिना एक क्षण भी नहीं जिया जा सकता। हर परिस्थिति में कर्म करना ही पड़ेगा। कर्म निरपेक्ष होता है। वह न तो अच्छा होता है, न बुरा। अग्नि का जलाना निरपेक्ष है। जब यह रसोई में जलकर भोजन पकाती है, तब अच्छी लगती है और जब घर को जला देती है, तब खराब मानी जाती है। परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि उसका उपयोग कैसे किया गया। जिस भावना से प्रेरित होकर कर्म किया जाता है, उसी के अनुरूप उसमें गुण-दोष आ जाते हैं और वह चित्त पर अच्छे या बुरे संस्कार बनाकर अंतःकरण में विचलन पैदा करता है। हमारा लक्ष्य इन संस्कारों और विचलनों से बचना तथा अंतःकरण की समता बनाए रखना है।

अब प्रश्न यह है कि इन नियमों के बीच वह कौन-सा तरीका है, जिससे कर्म भी होते रहें और अंतःकरण की समता भी बनी रहे, चित्त पर कोई संस्कार भी न बने। इसका उत्तर देने से पहले भगवान उस त्रुटि के प्रति चेतावनी देते हैं, जो निष्कर्मता प्राप्त करने के नाम पर साधारणतः की जाती है।

भगवान कहते हैं- “जो कर्मेन्द्रियों को बलपूर्वक रोककर मन से इन्द्रियों के विषयों का चिंतन करता हुआ बैठा रहता है, वह विमूढ़ पुरुष मिथ्याचारी कहलाता है।” (गीता 3.6)

कर्म केवल शारीरिक ही नहीं, अपितु मानसिक भी होते हैं। कर्मेन्द्रियों को बलपूर्वक रोक लेने से कर्म से छुटकारा नहीं मिल सकता, क्योंकि तब भी ज्ञानेन्द्रियाँ सक्रिय रहती हैं। इसलिए कोई यह न समझे कि वह शारीरिक रूप से कर्म नहीं करेगा, पर मन में निरंतर चिंतन करता रहेगा और निष्कर्मता को प्राप्त हो जाएगा। ऐसा करने पर वह बाहर से कर्म न करता हुआ दिखाई देता है, परंतु वास्तव में कर्मरहित नहीं होता।

अंदर चल रहे मानसिक कर्म स्वयं ही जाने जा सकते हैं; अन्य व्यक्ति उन्हें नहीं जान सकता। जो व्यक्ति ऐसा करते हुए अपने को कर्मरहित मानना चाहता है, उसे भगवान ‘मिथ्याचारी’ कह रहे हैं। उसे ‘विमूढ़’ (मूर्ख) भी कहा गया है, क्योंकि इस प्रकार वह स्वयं को ही धोखा दे रहा होता है। शारीरिक और मानसिक दोनों कर्मों के चित्त पर संस्कार बनते हैं। दोनों में मानसिक कर्म अधिक शक्तिशाली और घातक होते हैं, क्योंकि समाज के नियमों, मर्यादाओं और लोकलाज के कारण कई निषिद्ध शारीरिक कर्म हम नहीं कर पाते, परंतु मानसिक कर्मों पर ऐसा कोई बंधन नहीं होता। मन में तो हम चोरी, क्रोध, व्यभिचार आदि सब कुछ कर सकते हैं।

मन का स्वभाव है कि वह एक ही विचार को बार-बार दोहराता है। इससे निरंतर शक्ति का क्षय होता है और अंतःकरण विक्षेपित हो जाता है। विचारों के अनुसार स्वभाव बनता है और स्वभाव के अनुसार कर्म होने लगते हैं। इसलिए मानसिक कर्मों के प्रति अधिक सावधानी रखना आवश्यक है। जब कर्मयोग के माध्यम से चित्त की शुद्धि होती है, तो इस प्रकार के नकारात्मक मानसिक कर्म स्वतः समाप्त होने लगते हैं। यह भगवान की चेतावनी है कि कर्म-त्याग के धोखे में मिथ्याचारी न बनें।

इन्द्रियों का नियमन तभी संभव है, जब हम अपने आपको शरीर, मन और बुद्धि अर्थात स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर से अलग सत्ता के रूप में समझें। सामान्यतः हमारे जीवन में कर्मों का उद्देश्य सुख प्राप्त करना या जीवन में अनुकूलता बनाए रखना ही होता है, अतः इन्द्रियों का नियमन कठिन हो जाता है। जब हम अपने को संसार से अलग परमात्मा का अंश मान लेते हैं, तो इन्द्रिय-संयम सहज हो जाता है।

शारीरिक और मानसिक दोनों कर्मों के चित्त पर संस्कार बनते हैं। दोनों में मानसिक कर्म अधिक शक्तिशाली और घातक होते हैं, क्योंकि समाज के नियमों, मर्यादाओं और लोकलाज के कारण कई निषिद्ध शारीरिक कर्म हम नहीं कर पाते, परंतु मानसिक कर्मों पर ऐसा कोई बंधन नहीं होता।

उदाहरण के लिए, जब हम किसी बड़े समारोह में जाते हैं, तो मार्ग की असुविधाएँ अधिक कष्ट देती हैं। परंतु जब तीर्थयात्रा पर जाते हैं, तो स्वयं को साधक मानते हैं और लक्ष्य के महत्व के कारण कठिनाइयों में विचलित नहीं होते। ऐसा लगता है यह तीर्थयात्रा है, मुझे इन कठिनाइयों को सहते हुए आगे बढ़ना है। इन्द्रियाँ अच्छा भोजन माँगती हैं, परंतु यात्रा में जो मिला, उसी में संतोष करना पड़ता है। इस प्रकार इन्द्रियों पर हमारा नियंत्रण स्थापित होता है।

आसक्ति कर्म में और कर्मफल में दोनों में हो सकती है। कर्मफल अनिवार्यतः मिलेगा, दोष कर्म करने में नहीं, बल्कि इन दोनों में आसक्ति में है। कर्म का त्याग नहीं करना है, बल्कि उनमें आसक्ति का त्याग करना है। राग-द्वेष का त्याग करना है। कर्म लोककल्याण के लिए करना, भगवान की प्रसन्नता के लिए करना और प्राप्त फल को भगवान को अर्पित करना इससे आसक्ति छूटती है।

एक ओर संसार में निरंतर कर्म चलते रहते हैं, तो दूसरी ओर यह कहा जाता है कि कर्म का त्याग ही ज्ञान और मुक्ति का मार्ग है। इन दो विरोधी बातों में भगवान ने समन्वय किया है और कर्मयोग की राह दिखाई है, जिसमें कर्म भी होगा, चित्त समता में भी रहेगा और मुक्ति भी प्राप्त होगी।

अपने को मन और इन्द्रियों से पृथक मानना आवश्यक है। तभी शरीर, इन्द्रियों और मन से कर्म करते हुए भी भीतर समता और शांति की प्राप्ति होगी। इस अवस्था की प्राप्ति के लिए पहले निष्काम कर्म करना होता है। बाद में यह भाव श्वास-प्रश्वास की तरह सहज हो जाता है। कर्मयोग की अवस्था पर पहुँचा व्यक्ति प्रकृति के गुणों द्वारा कर्म करने के लिए बाध्य नहीं होता। वह प्रकृति की क्रियाओं को साक्षी भाव से देखता है और वैसे ही कर्म करता है, जैसे परमात्मा करता है।

पूर्व श्लोक में भगवान ने इन्द्रियों से कर्म न करते हुए उनका मानसिक चिंतन करके स्वयं को कर्मरहित मानने वाले को मिथ्याचारी और विमूढ़ कहा। अब इसी बात को सकारात्मक रूप से बताते हुए कर्म-त्याग का वास्तविक स्वरूप समझाते हैं.

“परंतु हे अर्जुन! जो मन से इन्द्रियों का संयम करके, अनासक्त होकर, कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है।” (गीता 3.7)

इस श्लोक में कर्म करने और जीवन जीने की सही कला संहित है। मन से इन्द्रियों के नियंत्रण का अर्थ यह नहीं कि इन्द्रियाँ दबाई जाएँ, बल्कि स्थिर बुद्धि से प्रेरित मन के निर्देशानुसार इन्द्रियाँ कार्य करें। शरीर रूपी रथ को इन्द्रिय रूपी घोड़े स्वेच्छा से नहीं चलाते, अपितु बुद्धि रूपी सारथी उन्हें मन रूपी लगाम से नियंत्रित करता है।

यहाँ ‘नियमन’ का अर्थ है शास्त्र की मर्यादा के अनुसार अनुशासन में रहना और इन्द्रियों को निषिद्ध विषयों में न जाने देना। ‘अनासक्त’ का तात्पर्य है न कर्म में आसक्ति, न कर्मफल में। कर्म का त्याग नहीं करना है, बल्कि कर्म और उसके फल में जो आसक्ति है, उसका त्याग करना है।

जब मन श्रेष्ठ लक्ष्य की ओर प्रेरित होगा, तभी इन्द्रियों का नियंत्रण संभव होगा। इससे शक्ति का संयोग होता है और वह शक्ति श्रेष्ठ लक्ष्य की ओर प्रवाहित होती है। यह श्रेष्ठ लक्ष्य है निष्काम कर्म करना। निष्काम कर्म से नए संस्कार नहीं बनते और पूर्व वासनाओं के संस्कार क्रमशः समाप्त होने लगते हैं।

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