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ग्वालियर में स्थित माँ शीतला के दरबार में कभी डकैत झुकाते थे सिर, ये है पौराणिक कथा ...

ग्वालियर में स्थित माँ शीतला के दरबार में कभी डकैत झुकाते थे सिर, ये है पौराणिक कथा ...
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वेबडस्क। ग्रीष्म नवरात्रि 13 अप्रैल से आरंभ हो रही है, जोकि 21 अप्रैल तक चलेगी। मान्यता है की जो भकत नवरात्र पूरे मन से माँ दुर्गा के नवरूपों की आराधना करता है, उसकी सभी मनोकामना पूर्ण होती है। इन दिनों देवी के शक्तिपीठों एवं विभिन्न मंदिरों में पूजन का विशेष महत्व है। ऐसा ही एक मंदिर माँ शीतला का ग्वालियर जिले में है। जिसके विषय में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित है।

ये मंदिर ग्वालियर जिले के बाहर वन क्षेत्र में स्थित है। एक समय इस जंगल में कई शेर रहते थे, जिनसे लोगों की जान का खतरा था। इसके बावजूद माता के भक्त प्रतिदिन यहां आकर पूजा -अर्चना करते थे। इसी प्रकार जब ग्वालियर -चंबल क्षेत्र के बीहड़ों में जब डकैतों का आतंक था। उस समय भी कई डकैत यहां आकर माँ के चरणों में शीश नवाते थे और मनोकामना करते थे। बताया जाता है की डकैतों पर माँ ऐसा प्रभाव था की वह इस क्षेत्र में नाही लाभ डकैती डालते और नाही किसी को परेशान करते थे।

ये है पौराणिक कथा -

शीतला माता के मंदिर की स्थापना को लेकर एक पौराणिक कथा इस क्षेत्र में बेहद प्रचलित है। जिसके अनुसार माँ शीतला भक्त गजाधर इस मंदिर के समीप स्थित गाँव सांतऊ में रहते थे। वह माँ के अनन्य भक्त थे। वे प्रतिदिन गोहद में स्थित एक देवी मंदिर में माँ दुर्गा का दूध से अभिषेक लरते थे , जब वह वहां से वापिस अपने गाँव जाने लगे तो माँ ने ने एक कन्या के रूप में उनको दर्शन दिए और साथ ले चलने के लिए कहा। .गजाधर ने माता से कहा कि उनके पास कोई साधन नहीं है वह उन्हें अपने साथ कैसे ले जाएं। इस पर माता ने कहा की वह जब भी उसे याद करेगा, वे उसके सामने प्रकट हो जाएंगी।

पहाड़ी पर हुई विराजित -

गजाधर ने अपने गांव सांतउ आने के बाद माँ को याद किया तो देवी प्रकट हो गईं और गजाधर से मंदिर बनवाने के लिए कहा। इस पर गजाधर ने माँ से कहा की वह जहाँ विराजेंगी, वहीँ मंदिर बनवा देगा। उसकी बात सुन माँ पास के जंगल में स्थित पहाड़ी पर विराजित हो गई। तब से महंत गजाधर के वंशज इस मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं।

नंगेपांव आते है भक्त -

आज माँ शीतला की महिमा इस क्षेत्र के साथ पूरे प्रदेश में फ़ैल गई है। नवरात्रि के दिनों में दूर-दूर से उनके भक्त बिना जूते चप्पल पैदल चलकर दर्शन करने पहुंचते हैं।



Updated : 2021-04-11T19:36:43+05:30
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स्वदेश वेब डेस्क

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