जबलपुर में सोमवार को 35 किलोमीटर लंबी संस्कार कांवड़ यात्रा में एक लाख से अधिक श्रद्धालु शामिल हुए। प्रदेश मुखिया डॉ मोहन यादव शामिल हुए। भगवान शिव को अर्पित करने के लिए मां नर्मदा का जल लेकर निकले।
जबलपुर। मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर में 1 लाख से ज़्यादा श्रद्धालुओं ने 35 किलोमीटर लंबी 'संस्कार कांवड़ यात्रा' में हिस्सा लिया। फिर भगवान शिव के लिए नर्मदा का पवित्र जल लेकर चले। सबसे खास बात यह रही कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी इस जुलूस में शामिल हुए।
जबलपुर। मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर में सोमवार को जब कांवड़ियों का सैलाब भगवान शिव के लिए माँ नर्मदा का पवित्र जल लेकर जबलपुर से गुज़रा। तब ढोल-नगाड़ों की थाप के साथ 'बोल बम' के जयकारे गूंज उठे। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव रंझी में 'संस्कार कांवड़ यात्रा' में शामिल हुए। उन्होंने अपने कंधे पर कांवड़ उठाई, डमरू बजाया और श्रद्धालुओं के साथ पैदल चले।
एक एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, 35 किलोमीटर की इस आध्यात्मिक यात्रा में एक लाख से ज़्यादा कांवड़िए शामिल हुए। ड्रोन फुटेज में जबलपुर से गुज़रते श्रद्धालुओं की लंबी कतारें दिखाई दीं; शहर की सड़कें केसरिया रंग, भक्ति और शिव के जयकारों से सराबोर हो गईं। डॉ. यादव ने कांवड़ियों पर फूलों की वर्षा की और फिर दादा गुरु व अन्य श्रद्धालुओं के साथ पैदल यात्रा में शामिल हुए। कई जन-प्रतिनिधियों ने भी इस जुलूस में हिस्सा लिया।
मुख्यमंत्री ने श्रद्धा सैलाब की समुद्र से तुलना
मुख्यमंत्री ने इस जन-समूह की तुलना समुद्र की लहरों से की। उन्होंने कहा कि जहाँ भी नज़र जाती थी, कांवड़िए अपनी साधना, भक्ति और भगवान शिव को जल अर्पित करने के संकल्प के साथ नर्मदा का जल ले जाते हुए दिखाई देते थे। मध्य प्रदेश की 'संस्कारधानी' के तौर पर मशहूर जबलपुर के लिए इस यात्रा की एक अलग पहचान है।
नर्मदा से जुड़ी है जबलपुर की कांवड़ यात्रा
उत्तर भारत के ज़्यादा मशहूर कांवड़ मार्गों के विपरीत, जहाँ श्रद्धालु मुख्य रूप से गंगा का जल लाते हैं। वहीं, जबलपुर की यह तीर्थ-यात्रा अपनी आध्यात्मिक शक्ति नर्मदा नदी से प्राप्त करती है। नदी, श्रद्धालु और शिव के बीच का यही रिश्ता इस यात्रा को स्थानीय पहचान देता है। डॉ. यादव ने कहा कि सावन के पवित्र सोमवार ने श्रद्धालुओं पर माँ नर्मदा का आशीर्वाद बरसाया है। उन्होंने कहा कि कांवड़िए केवल जल नहीं, बल्कि अपनी आस्था और आध्यात्मिक संकल्प को लेकर चल रहे हैं। उन्होंने आगे कहा, "माँ नर्मदा भी जल के रूप में अपने श्रद्धालुओं के साथ यात्रा कर रही हैं।"
सावन और नर्मदा की आस्था का संगम
मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने कई कांवड़ यात्राएँ देखी हैं। लेकिन जबलपुर के जुलूस का पैमाना अद्भुत था। उन्होंने सावन को भगवान शिव को समर्पित महीना बताया और कहा कि सनातन संस्कृति आत्म-अनुशासन सिखाती है और लोगों को जीवन की चुनौतियों का सामना करने की ताकत देती है। जुलूस के दौरान नर्मदा को शिव से जोड़ने वाली पारंपरिक मान्यता भी देखने को मिली। "नर्मदा के कंकड़-कंकड़ में शंकर" - यानी नर्मदा के हर पत्थर में शिव का वास है - यह बात पूरे मध्य प्रदेश में लोगों की आस्था में गहराई से बसी हुई है।
धार्मिक पर्यटन पर सरकार का जोर
डॉ. यादव ने धार्मिक पर्यटन पर राज्य सरकार के फोकस पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि धार्मिक यात्राओं में शामिल होने वाले तीर्थयात्रियों और पूजा-स्थलों पर सुविधाओं को बेहतर बनाया जा रहा है। दादा गुरु का ज़िक्र करते हुए, मुख्यमंत्री ने उनके आध्यात्मिक अनुशासन और नर्मदा के साथ उनके गहरे जुड़ाव के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि संत समाज को याद दिलाते हैं कि जीवन का मकसद भौतिक ज़रूरतों से कहीं ज़्यादा है और भक्ति व अनुशासन ही उस रास्ते की ओर ले जा सकते हैं।
कांवड़ यात्रा में निभाई जाती है कठिन परंपरा
पूरे भारत में कांवड़ यात्राओं में एक सरल लेकिन कठिन परंपरा का पालन किया जाता है। भक्त पवित्र नदी से जल लाते हैं, उसे कंधों पर रखकर लंबी दूरी तय करते हैं और अंत में भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। यह यात्रा ही अपने आप में पूजा बन जाती है, और कई कांवड़िए रास्ते भर कड़े अनुशासन का पालन करते हैं।
35 किलोमीटर तक गूंजते रहे बोल बम के जयकारे
सोमवार को जबलपुर में यह भक्ति 35 किलोमीटर तक फैली हुई थी। कांवड़ियों के साथ-साथ ढोल-नगाड़े बज रहे थे और पूरे रास्ते "बोल बम" के जयकारे गूंज रहे थे। हर कांवड़ का एक ही मकसद था। हर कदम भक्तों को उनके चढ़ावे के और करीब ला रहा था। और जैसे-जैसे जुलूस आगे बढ़ा, माँ नर्मदा अपने भक्तों के कंधों पर सवार होकर भगवान शिव की ओर बढ़ती गईं। इस तरह पैदल यात्रा आस्था के एक रूप में बदल गई।