पाकिस्तानी हिंदू नागरिकों नागरिकता के बाद घर क्यों नहीं? सुप्रीम कोर्ट का केंद्र से सवाल

नई दिल्ली। देश की राजधानी स्थिति सुप्रीम कोर्ट ने केद्र सरकार से सख्त सवाल किए हैं। दिल्ली के मजनू का टीला इलाके में रह रहे पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थियों को लेकर केंद्र सरकार से सख्त सवाल पूछे हैं। अदालत ने कहा है कि जब आपने इन लोगों को भारत की नागरिकता दे दी है, तो इन्हें रहने के लिए पक्का घर क्यों नहीं दिया गया?
दरअसल, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान केंद्र से साफ शब्दों में कहा कि नागरिकता मिलने के बाद भी इन परिवारों को आवास से वंचित रखना उचित नहीं है। कोर्ट ने निर्देश दिए कि इन नागरिकों के पुनर्वास और आवास की व्यवस्था को लेकर सरकार 'उच्चतम स्तर चर्चा की जाए' और कोई व्यावहारिक समाधान निकाले।
250 परिवारों को मिल चुकी है नागरिकता
अदालत को बताया गया कि मजनू का टीला में रहने वाले ऐसे करीब 250 परिवार हैं, जो पाकिस्तान से भारत आए थे और अब सभी को भारतीय नागरिकता मिल चुकी है। इनमें से अधिकांश परिवार अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं।
केंद्र सरकार को मिला चार हफ्ते का समय
केंद्र सरकार की ओर से पेश अधिकारियों ने मामले में जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्तों का समय मांगा, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई तक मजनू का टीला क्षेत्र से इन शरणार्थियों को हटाने पर रोक लगाने वाला अंतरिम आदेश प्रभावी रहेगा।
हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौती
इस मामले में लंबी कानूनी प्रक्रिया चल रही है। इससे पहले 30 मई 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट ने शरणार्थियों की याचिका खारिज करते हुए उन्हें मजनू का टीला से हटाने की अनुमति दे दी थी। हाईकोर्ट के इसी फैसले को चुनौती देते हुए शरणार्थी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। इसके बाद 29 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने शरणार्थियों को हटाने की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी और केंद्र सरकार तथा डीडीए को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
एससी का केंद्र से सवाल
शरणार्थियों की ओर से पेश सीनियर वकील विष्णु शंकर जैन ने हाईकोर्ट के आदेश पर एक-पक्षीय अंतरिम रोक की मांग की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। अब अदालत का फोकस इस सवाल पर है कि जब केंद्र सरकार इन लोगों को वैध भारतीय नागरिक मान चुकी है, तो फिर उन्हें बुनियादी सुविधाएं, खासकर आवास, क्यों नहीं उपलब्ध कराई गईं।कोर्ट ने साफ किया कि इस मुद्दे को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया मानकर नहीं टाला जा सकता, बल्कि इसे मानवीय दृष्टिकोण से देखते हुए ठोस समाधान निकाला जाना चाहिए।
