महाराष्ट्र निकाय चुनावः ओवैसी की AIMIM ने सपा के किले में लगाई सेंध,क्या UP में भी बिगाड़ेगी खेल?

नई दिल्लीः महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि देश की मुस्लिम राजनीति अब पुराने ढर्रे पर नहीं चल रही। जिन इलाकों में दशकों से कांग्रेस, सपा या एनसीपी का वर्चस्व माना जाता था, वहां इस बार असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने सबको चौंका दिया। यहां के 12 शहरों में 126 सीटें एआईएमआईएम ने जीती हैं। इसके बाद अब सवाल सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी गूंज उत्तर प्रदेश तक सुनाई देने लगी है।
महाराष्ट्र में बदला मुस्लिम राजनीति का मूड
महाराष्ट्र की 29 नगर महापालिकाओं में से 12 में AIMIM की जीत ने यह साफ कर दिया कि ओवैसी अब केवल हैदराबाद या मराठवाड़ा तक सीमित नेता नहीं रहे। 126 पार्षदों की जीत के साथ AIMIM ने विदर्भ, उत्तर महाराष्ट्र और मुंबई तक अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है।खास बात यह रही कि संभाजीनगर (औरंगाबाद) में पार्टी मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी, जबकि मालेगांव जैसे मुस्लिम बहुल शहर में उसने किंगमेकर की भूमिका हासिल कर ली।
संभाजीनगर से मालेगांव तक AIMIM का दबदबा
संभाजीनगर महानगरपालिका में 33 पार्षदों की जीत ने ओवैसी की रणनीति को मजबूती दी। मालेगांव में 21, नांदेड़ में 14, अमरावती में 12 और धुले में 10 सीटें जीतकर AIMIM ने यह संदेश दिया कि मुस्लिम मतदाता अब विकल्प तलाश रहा है। यह सिर्फ आंकड़ों की जीत नहीं थी, बल्कि यह उस नाराजगी का संकेत भी था, जो पारंपरिक ‘सेक्युलर’ दलों के प्रति मुस्लिम समाज में पनप रही है।
मुंबई में सपा का किला कैसे ढहा
मुंबई के बीएमसी चुनाव इस बार सपा बनाम AIMIM की सीधी लड़ाई बन गए। गोवंडी, मानखुर्द और शिवाजीनगर जैसे इलाकों में, जहां कभी अबू आसिम आजमी का मजबूत गढ़ माना जाता था, वहां AIMIM ने बाजी मार ली। आठ सीटों पर AIMIM की जीत और सपा का सिर्फ दो सीटों पर सिमटना इस बात का संकेत है कि मुस्लिम वोट अब एकतरफा नहीं रहा।
आक्रामक राजनीति या नया विकल्प?
ओवैसी की सीधी और आक्रामक भाषा ने खासकर युवा मुस्लिम मतदाताओं को प्रभावित किया। ‘मुस्लिम लीडरशिप को आगे लाने’ का उनका दावा उन लोगों को पसंद आया, जो खुद को लंबे समय से सिर्फ वोट बैंक समझे जाने से नाराज थे।
बिहार के बाद महाराष्ट्र, अब नजर यूपी पर
सीमांचल से लेकर मराठवाड़ा तक AIMIM की सफलता ने ओवैसी का आत्मविश्वास बढ़ाया है। यही वजह है कि अब उनका फोकस उत्तर प्रदेश पर है। पश्चिमी यूपी, जहां 30 से 50 फीसदी तक मुस्लिम आबादी है, ओवैसी की रणनीति का केंद्र बन सकता है।
यूपी में राह आसान नहीं
हालांकि यूपी की सियासत महाराष्ट्र और बिहार से अलग है। 2022 के विधानसभा चुनावों में 100 सीटों पर उम्मीदवार उतारने के बावजूद AIMIM खाता नहीं खोल सकी थी। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यूपी में ओवैसी के पास न तो मजबूत संगठन है और न ही कोई बड़ा स्थानीय चेहरा। वहीं, उनके समर्थकों का तर्क है कि मुस्लिम समाज अब अपनी अलग राजनीतिक पहचान चाहता है।
क्या यूपी में बदलेगा सियासी समीकरण?
महाराष्ट्र के नतीजों ने यह जरूर दिखाया है कि मुस्लिम राजनीति अब प्रयोग के दौर में है। अगर ओवैसी इस प्रयोग को यूपी में जमीन पर उतार पाए, तो सपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। लेकिन फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि यूपी में AIMIM वही असर दिखा पाएगी, जो उसने महाराष्ट्र में किया है।
